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इसलिए 21 जून को माना गया अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस

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( आचार्य डाॅ. लोकेशमुनि) नई दिल्ली, 19.जून.2019: अनादिकाल से भारतभूमि योग भूमि के रूप में विख्यात रही है। यहां का कण-कण, अणु-अणु न जाने कितने योगियों की योग-साधना से आप्लावित हुआ है। योगियों की गहन योग-साधना के परमाणुओं से अभिषिक्त यह माटी धन्य है और धन्य है यहां की हवाएं, जो योग-साधना के शिखर पुरुषों की साक्षी हैं। संसार के प्रथम ग्रंथ ऋग्वेद में कई स्थानों पर यौगिक क्रियाओं के विषय में उल्लेख मिलता है। भगवान शंकर के बाद वैदिक ऋषि-मुनियों से ही योग का प्रारम्भ माना जाता है। इसके पश्चात पतंजली ने इसे सुव्यवस्थित रूप दिया। कभी भगवान महावीर, बुद्ध एवं आद्य शंकराचार्य की साधना ने इस माटी को कृतकृत्य किया था। इस महान् भूमि ने योग की गंगा को समूची दुनिया में प्रवाहित करके मानवता का महान् उपकार किया है।

आचार्य डाॅ. लोकेशमुनि का कहना है कि किसी भी व्यक्ति की जीवन-पद्धति, जीवन के प्रति दृष्टिकोण, जीवन जीने की शैली-ये सब उसके विचार और व्यवहार से ही संचालित होते हैं। आधुनिकता की अंधी दौड़ में, एक-दूसरे के साथ कदमताल से चलने की कोशिश में मनुष्य अपने वास्तविक रहन-सहन, खान-पान, बोलचाल तथा जीने के सारे तौर-तरीके भूल रहा है। यही कारण है, वह असमय में ही भांति-भांति के मानसिक/भावनात्मक दबावों के शिकार हो रहा है। मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाने से शारीरिक व्याधियां भी अपना प्रभाव जमाना चालू कर देती है। जितनी आर्थिक संपन्नता बढ़ी है, सुविधादायी संसाधनों का विकास हुआ है, जीवन उतना ही अधिक बोझिल बना है। तनावों/दबावों के अंतहीन सिलसिले में मानवीय विकास की जड़ों को हिला कर रख दिया है। योग ही एक माध्यम है जो जीवन के असन्तुलन को नियोजित कर जीवन में शांति, स्वस्थता, संतुलन एवं खुशहाली का माहौल निर्मित करता है। आज योगिक विज्ञान जितना महत्वपूर्ण हो उठा है, इससे पहले यह कभी इतना महत्वपूर्ण नहीं रहा।

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आज हमारे पास विज्ञान और तकनीक के तमाम साधन मौजूद हैं, जो दुनिया के विध्वंस का कारण भी बन सकते हैं। ऐसे में यह बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है कि हमारे भीतर जीवन के प्रति जागरूकता और ऐसा भाव बना रहे कि हम हर दूसरे प्राणी को अपना ही अंश महसूस कर सकें, वरना अपने सुख और भलाई के पीछे की हमारी दौड़ सब कुछ बर्बाद कर सकती है। इन्हीं भावों के साथ अहिंसा विश्व भारती विश्व में योग को स्थापित करने एवं अहिंसक समाज रचना के संकल्प को आकार देने के लिये प्रयत्नशील है।इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि इस आधुनिक युग में हम प्रकृति से दूर होते जा रहे हैं। हमारे रहन-सहन, बोल-चाल और खान-पान बिल्कुल ही बनावटी हो चुकी है। हमारी जिंदगी मशीनों पर पूरी तरह से निर्भर हो चुकी है। हमे एहसास भी नहीं है लेकिन हम इस दुनिया की ओर तेजी से आगे बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में योग ही वह कारगर उपाय है जो हमें बनावटी दुनिया से मुक्त करके प्रकृति और आध्यात्म की दुनिया की ओर ले जाती है, प्रकृतिस्थ बनाता है। अगर लोगों ने अपने जीवन का, जीवन में योग का महत्व समझ लिया और उसे महसूस कर लिया तो दुनिया में व्यापक बदलाव आ जाएगा। जीवन के प्रति अपने नजरिये में विस्तार लाने, व्यापकता लाने में ही मानव-जाति की सभी समस्याओं का समाधान है।

 

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