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चीन के बौद्ध धर्मावलंबियों ने किया गृद्धकूट पर्वत पर विशेष पूजा-अर्चना

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राजगीर। भगवान बुद्ध के अतिप्रिय तपस्थली गृद्धकूट पर्वत पर बुद्ध पूर्णिमा के पावन दिन शनिवार को चीन से पहुंचे 13 सदस्यीय धमार्लंबियों के दल ने विशेष पूजा अर्चना की। दल का नेतृत्व कर रहे मि बाओ चांग ने बताया कि भगवान बुद्ध के चरण चिह्नों से राजगीर का कण कण लबरेज रहा है। वहीं रत्नागिरी पर्वत के निकट स्थित गृद्धकूट पर्वत, भगवान बुद्ध की सबसे प्रिय साधना केन्द्र के रूप में विश्वप्रसिद्ध है। जहां वे ज्ञान प्राप्ति के पूर्व और ज्ञान प्राप्ति के पश्चात भी यहां तपस्या में लीन रहते थे। उन्होंने यहीं से पुंडरीक सुत सहित अनेक उपदेश को प्रसारित किया था। इस क्रम में भगवान बुद्ध उपदेशों के संग्रहण से सजी एक पुस्तक का भी विमोचन किया। इस दौरान बौद्ध रीति रिवाज से किए गए पूजा अर्चना के दौरान अपने साथ चीन से लाए बुद्ध की एक हाथ उठाए मुद्रा की मूर्ति को बिठाया तथा पूरे गृद्धकूट पर्वत के भगवान बुद्ध के विराजमान रहने वाले स्थान को गेंदे के फूल से बनी लड़ियों से सजाया और मंत्रोच्चारण के बीच खीर के प्रसाद का भोग लगाकर मूर्ति की परिक्रमा की। इस क्रम में उन्होंने आगे 18 मई के बुद्ध पूर्णिमा के महत्त्व पर प्रकाश डाला। कहा कि आज से करीब 502 साल पहले के ही दिन समसप्तक राजयोग पड़ा था। अब ये संयोग अब 205 साल बाद 2 जून 2224 में आएगा। इस पूजा अर्चना के बाद वे बिठाये गये मूर्ति को विधिवत अपने साथ चीन लेकर वापस चले गए। वहीं अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ धीरेन्द्र उपाध्याय बताते हैं कि वैशाख शुक्ल पूर्णिमा का हिंदू धर्म और बौद्ध धर्म में काफी महत्व है इसकी वजह यह है कि बौद्ध ग्रंथों के अनुसार महात्मा बुद्ध का जन्म वैशाख पूर्णिमा को हुआ था। महात्मा बुद्ध का जन्म इस पूर्णिमा को होने की वजह इसे बुद्ध पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। ऐसी भी मान्यता है कि इसी पूर्णिमा के दिन महत्मा बुद्ध को गया के बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। महात्मा बुद्ध ने बुध पूर्णिमा के दिन ही कुशीनगर में महाप्रयाण यानी देह त्याग किया।

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