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पढ़िए कैसे- हेसातू और डहू के ग्रामीणों ने खुद बदली किस्मत

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हेसातू और डहू के ग्रामीणों ने खुद बदली किस्मत

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गौतम चौधरी
रांची : सामुहिक आर्थिक प्रबंधन व सहकारी खेती ने महज 23 वर्षों में हेसातू और डहू गांव की तस्वीर बदल दी है। राजधानी रांची से मात्र 18 किलोमीटर की दूरी पर स्थित ओरमांझाी प्रखंड के ये दोनों गांव 1994 से पहले आम गांवों की तरह ही बेहद बदहाल स्थिति में थे। 1994 में यहां सुखोमाजरी, पंचकूला, हरियाणा मॉडल के प्रणेता पद्मश्री प्रशुराम मिश्रा हेसातू आए। ग्रामीणों को एकत्र किया और चक्रीय विकास की संकल्पना समझायी। इसके बाद वह लगातार गांव आते रहे और देखते ही देखते गांव की तस्वीर बदल गयी। आज इस दोनों गावों के लोगों के पास पक्का मकान है, स्कूटर-मोटरसाइकिल के साथ ही कई ग्रामीणों के पास चार चक्के वाली गाड़ी है। ग्रामीणों के बच्चे रांची, दिल्ली और चंडीगढ़ में पढ़ते हैं। सबसे बड़ी बात है कि यह सारा परिवर्तन बिना सरकारी सहयोग से ग्रामीणों ने खुद अपनी मेहनत से किया है।

विकास का मॉडल : ग्रामीणों ने स्वयं सहायता समूह बनाकर इसके माध्यम से लगभग 400 एकड़ जमीन में पौधे लगाए हैं। ग्रामीण इसे निजी जंगल भी कहते हैं। यही नहीं ग्रामीण अपने हुनर से बड़े पैमाने पर लाह का उत्पादन करते हैं। इस लाह से कई प्रकार के प्रोडक्ट तैयार किए जाते हैं। ग्रामीण सब्जी की सामूहिक खेती करते हैं। एक गोशाला भी विकसित किया है। इसके अलावा बांस की खेती और बांस के प्रोडक्ट तैयार किए जाते हैं। इसको बेचने के लिए ग्रामीणों ने बेहतर बाजार भी विकसित किया है। अपने प्रोडक्ट को किस प्रकार बाजार पहुंचाया जा सकता है, यह इस गांव से सीखा जा सकता है। ग्रामीण सामूहिक तरीके से अपने उत्पाद को बाजार पहुंचाते हैं। इस पूरी योजना के प्रबंधक और चक्रीय विकास संस्थान के न्यासी देवेन्द्र नाथ ठाकुर ने बताया कि सामूहिक ग्रामीण आर्थिक प्रबंधन से हम साल में कम से कम 50 लाख रुपये आमदनी करते हैं। उन्होंने बताया कि इस आमदनी को हमलोग आपस में बांट लेते हैं। ठाकुर बताते हैं कि हमारे साथ कुल 640 परिवार जुड़े हुये हैं। उन्होंने बताया कि हम प्रति माह आमदनी आपस में बांटते हैं। हमलोगों ने एक गोशाला भी विकसित किया है। यह गोशाला भी सामूहिक प्रयास से बना है। गोशाला से हमें दूध और खेती के लिए कंपोस्ट प्राप्त होता है। हमारे सभी सदस्यों को महीने में कम से कम 8 से लेकर 10 हजार तक की अतिरिक्त आमदनी होती है। हमारे यहां के लोग दिल्ली, पंजाब, हरियाणा या दक्षिण भारत के राज्यों में कमाने नहीं जाते हैं।

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