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रुहानियत को संवारना ही रोजे का मतलब : तौकीर

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मोतिहारी। मासूम रजा: मुकद्दस रमजान महीने का दूसरे जुमा की नमाज बड़ी ही अकीदत के साथ अदा की गयी। रमजान महीने के जुमा की नमाज सभी मस्जिद में अदा की गयी। नमाज बलुआ मस्जिद, रघुनाथपुर, अगरवा, जमा मस्जिद, बरियारपुर मस्जिद सहित कई मस्जिदों में नमाज अदा की गयी। इस अवसर पर देश के मशहूर शायर तौकीर रजा इलाहाबादी ने कहा कि माह-ए-रमजान के 30 रोजे सिर्फ भूख और प्यास को संभालने का नाम नहीं है, बल्कि तमाम बुराइयों और गलत बातों से खुद को बचाए रखने का संदेश भी देते हैं। वहीं श्री इलाहाबादी ने कहा कि रमजान का मतलब एक ऐसा महीना, जिसमें इंसान अपने नफ्स यानी सोच को पाक करें। इंसान जिन चीजों के पीछे भागता है, उनके पीछे भागना छोड़ सके। सीधी जुबान में खुद पर कंट्रोल रखना सीखें। हमारी तमाम इंद्रियों पर हमारी लगाम हो। इससे बड़ी बात कि इंसान सीख सके कि उनसे किसी का दिल नहीं दुखाना है। रुहानियत को संवारना ही रोजे का मतलब हैं। मुबारक माह रमजान में गुरुवार को दसवें रोजे के साथ पहला अशरा पूरा हो गया और ग्याहरवें रमजान से मगफिरत यानि रोजेदारों के लिए गुनाह से माफी मांगने वाला दूसरा अशरा शुरू होगा। ग्याहरवें रमजान के मौके पर मुबारक माह का दूसरा जुमा भी है।
अब रमजान माह में सहरी के लिए जगाने वाले नहीं आते
करीब 15-20 साल पहले रमजान माह शुरू होते ही शहर के मुस्लिम मोहल्लों में एक अलग ही रौनक देखने को मिलती थी। अलग-अलग मोहल्लों में सहरी के दौरान जगाने के लिए अलग से टीम होती थी, जो घर-घर जाकर लोगों को जगाया करती थी। सहरी करने के बाद मोहल्ले के पुरुष एक साथ फज्र की नमाज पढ़ने जाया करते थे। आखिरी रमजान पर सभी परिवार पैसे एकत्र कर सहरी जगाने वालों को दिया करते थे। आज के आधुनिक दौर में अब सहरी के दौरान जगाने आने वाले लोगों की जगह मोबाइल ने ली है। मोबाइल में सहरी से पहले का अलार्म लगाकर सो जाते हैं और अलार्म बजते ही उठकर सहरी कर रोजा रखते हैं।

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