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नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की बैठक में बोले मुख्यमंत्री बंद हों केंद्र प्रायोजित योजनाएं

बिहार के लिए मांगा विशेष दर्जा

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वित्तीय पैटर्न से राज्यों के आर्थिक हितों पर बढ़ रहा दबाव

गैर रैयतों को भी किसान सम्मान योजना का मिले लाभ

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एमडीएम रसोइयों का भी मानदेय बढ़ाये केंद्र

राज्य आपदा कोष में बिहार की हिस्सेदारी बढ़े
पटना/वरीय संवाददाता
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पुन: बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग करते हुए कहा कि केंद्र प्रायोजित योजनाओं के क्रियान्वयन से राज्यों की आर्थिक सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। उन्होंने केंद्र प्रायोजित योजनाओं को बंद करने और प्राथमिकता वाली योजनाओं का क्रियान्वयन केंद्र से करने की मांग की। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शनिवार को दिल्ली में नीति आयोग की गवर्निंग काउंसिल की पांचवीं बैठक को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने बिहार के विकास से जुड़े मुद्दों को तार्किक तरीके से नीति आयोग के समक्ष रखा। बाढ़-सूखा और सामाजिक पेंशन की योजनाओं के क्रियान्वयन पर होने वाले खर्चों से भी अवगत कराते हुए बिहार के हितों की रक्षा के लिए अतिरिक्त सहायता की मांग की। उन्होंने कहा कि केंद्रीय करों से राज्यों को मिलने वाली वित्तीय सहायता की राशि बढ़ा दी गयी लेकिन केंद्र प्रायोजित योजनाओं की संख्या बढ़ती ही चली गयी। केंद्रीय योजनाओं में मैचिंग शेयर के कारण राज्यों पर आर्थिक दबाव बढ़ता जा रहा है। केंद्र प्रायोजित 21 योजनाओं में राज्य और केंद्र सरकार का शेयर 60:40 का है। कई केंद्र प्रायोजित योजनाओं में राज्य और केंद्र की हिस्सेदारी बराबर-बराबर की है। राज्य सरकारों को अपने राजस्व संसाधन का बड़ा हिस्सा केंद्र प्रायोजित योजनाओं पर खर्च करना पड़ रहा है। इससे राज्यों को अपनी प्राथमिकता की योजनाओं को पूरा करने में भी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। इसके कारण राज्य सरकारें जनहित की आवश्यकताओं के अनुरूप योजनाओं के क्रियान्वयन पर राशि खर्च नहीं कर पा रही है। मुख्यमंत्री ने दावा किया कि केंद्र प्रायोजित योजनाओं के क्रियान्वयन पर बिहार सरकार को वित्तीय वर्ष 2018-19 में 21396 करोड़ रुपये खर्च करना पड़ा है। केंद्र प्रायोजित योजनाओं को बंद कर प्राथमिकता के आधार पर केंद्रीय योजनाओं का क्रियान्वयन होना चाहिए। मुख्यमंत्री ने बिहार जैसे पिछड़े राज्यों को विकसित राज्यों की श्रेणी में लाने के लिए विशेष दर्जे की मांग की। तत्कालीन रघुराम राजन कमेटी की अनुशंसाओं की ओर भी पीएम का ध्यान आकृष्ट किया। कहा कि दस सर्वाधिक पिछड़े राज्यों में बिहार भी शामिल था। पिछड़े राज्यों के विकास के लिए केंद्र सरकार अतिरिक्त सहायता भी मुहैया करा सकती है। उन्होंने कहा कि बिहार शिक्षा, स्वास्थ्य, ऊर्जा सेक्टर और प्रति व्यक्ति आय में भी राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे है। बिजली सेक्टर में 13 वर्षों में तरजीह देने के बाद भी प्रति व्यक्ति बिजली उपयोग में बिहार राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे है। स्वास्थ्य सेक्टर में सुधार के लिए राज्य सरकार ने कई पहल की है। स्वास्थ्य सुधार कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी गयी। इससे शिशु-मातृ मृत्यु दर में कमी आयी है लेकिन राज्य सरकार को हालात में सुधार के लिए अपने खजाने से भारी-भरकम राशि खर्च करनी पड़ी है। मुख्यमंत्री ने राज्य सरकार की ड्रीम प्रोजेक्ट में शुमार सात निश्चय की योजनाओं के समयसीमा में क्रियान्वयन और खर्च का ब्योरा विस्तार से दिया। नारी सशक्तीकरण सहित सामाजिक सुधार की चलाई जा रही अन्य योजनाओं पर होने वाले खर्च की भी जानकारी दी। एनएच निर्माण पर अपने राज्य सरकार के फंड से खर्च की गयी राशि की प्रतिपूर्ति की भी मांग की। वहीं बिहार पुनर्गठन विधेयक 2000 का हवाला देते हुए विशेष सहायता जारी रखने की मांग की। मुख्यमंत्री ने कहा कि इंदिरा गांधी राष्ट्रीय वृद्धवस्था पेंशन योजना के तहत राज्य में पेंशनधारियों की संख्या 45 लाख है जबकि केंद्र मात्र लगभग 30 पेंशनधारियों के लिए राशि मुहैया करायी जा रही है। शिक्षकों के वेतन देने के मामले में भी राज्य सरकार को केंद्र से अपेक्षित राशि मुहैया नहीं करायी जा रही है। शिक्षकों के वेतन के लिए राशि में केंद्रीय कटौती के कारा राज्य सरकार के खजाने पर सात हजार करोड़ करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ा है। उन्होंने राज्य आपदा कोष और अनुग्रह राशि में भी राज्यों की आवश्यकता के अनुरूप केंद्रीय सहायता की मांग की। स्पेशल प्लान की शेष राशि 911 करोड़ रुपये उपलब्ध कराने की ओर भी ध्यान दिलाया। मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री किसान सम्मान योजना में गैर रैयतों को भी शामिल करने और अनुदान मुहैया कराने की मांग की। साथ ही आंगनबाड़ी कर्मियों की तरह एमडीएम रसोइये का मानदेय बढ़ाने और इसका वहन केंद्र सरकार से करने की मांग की।

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