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भाषावाद,क्षेत्रवाद,पार्टीवाद ने राष्ट्रवाद को किया कमजोर

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कमला कान्त दूबे

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दिनारा – भारत को राजनैतिक स्वतंत्रता मिली तो उसके अच्छे परिणाम सामने आये।जहां पिन भी बाहर से बनकर आती थी,वहां हवाई जहाज,पानी के जहाज,मिसाइलें,अन्तरिक्षीय उपग्रह आदि बनाना और सफलतापूर्वक प्रयुक्त करना संभव हो रहा है।भारत विश्व का सबसे बड़ा और सफल गणतंत्र बनने का गौरव भी प्राप्त कर चुका है।इतने सबके बावजूद कुछ कुचक्री ताकतें भारत को वर्गभेद में बांटकर,संकीर्ण स्वार्थभरे सम्मोहन पैदा करने में सफल होती रही हैं।इन्हीं के कारण जातिभेद का विष स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद और बढ़ गया है भाषावाद,क्षेत्रवाद,पार्टीवाद ने राष्ट्रवाद को कमजोर किया है।इसी कारण विघ्नसंतोषी बाहरी शक्तियों को प्रत्यक्ष आक्रमण और अप्रत्यक्ष सैंधमारी करने का अवसर मिल जाता है।उनको निरस्त करने की प्रर्याप्त सामर्थ्य होते हुए भी आन्तरिक बिखराव के कारण उसमें सफलता नहीं मिल पाती।लेकिन भारत की अस्मिता को जब कोई मार्मिक चोट लगती है,तो राष्ट्रवादी भाव,अन्य संकीर्ण भेदभावों को दबाकर उभर जाता है।राष्ट्र एकमत,एकजुट होकर अनीति का प्रतिकार करने,अपने गौरव की रक्षा करने के लिए तत्पर हो जाता है।इन दिनों भी राष्ट्रनिष्ठा का एक जीवन्त उभार आया हुआ है।कहावत है कि जब लोहा गर्म है,तभी उसे वाञ्छित आकार देना सरल होता है।ऐसे समय में हर व्यक्ति और संगठन राष्ट्र के हित के लिए कुछ कारगर कदम उठाने के लिए,कुछ त्याग-बलिदान करने के लिए उत्साहित हो उठता है। सामान्य रुप से यह उत्साह शत्रु पक्ष को चुनौती देने वाले नारों तथा अपने पक्ष का मनोबल बढ़ाने वाले उत्सवों में व्यक्त होकर ही रह जाता है।यदि इसे सही दिशा दी जा सके तो यह व्यक्ति और समाज को कमजोर करने वाली दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन तथा राष्ट्र को सशक्त बनाने वाली सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन में लगकर राष्ट्र को गरिमा प्रदान करने वाले नये आयामों को विकसित कर सकता है।

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