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नकारा जा रहा लोकतंत्र का इतिहास- डॉ. महेंद्र सिंह

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शायद ही कभी किसी देश में ऐसा हुआ हो कि पचपन साल पहले दिवंगत हुए किसी नेता के सिर पर मौजूदा सरकार की नाकामियों का ठीकरा फोड़ा जाए, मगर मोदी के राज में यह भी मुमकिन हो गया। नेहरू तब हमलों के घेरे में हैं जब खास तौर पर नई पीढ़ी को उनके बारे में किताबों, अखबारों या व्हाट्सएप के बहके हुए संदेशों के जरिए ही पता चलता है। बात नेहरू की ही नहीं, नेहरू के बहाने अपनी आजादी और लोकतंत्र के इतिहास से हमारे संबंधों की भी है।आजादी के दो दशक पहले पैदा हुई मेरी पीढ़ी नेहरू को लेकर हो रही गलतबयानियों पर भौंचक्की होकर रह जाती है। देश का युवा नेहरू के बारे में अपनी राय बनाने के लिए स्वतंत्र है, मगर वह तथ्यों को तोड़ने-मरोड़ने या किसी बनाई हुई कहानी के आधार पर ऐसा करता है तो वह विरासत में उसे मिली आजादी और लोकतंत्र के साथ न्याय नहीं कर पाएगा। आज का युवा अगर नेहरू व गांधी को नहीं जान पाता है तो उसका लोकतंत्र से विपरीत रास्ते पर जाने का अंदेशा बन जाएगा।देश का भविष्य युवाओं के हाथ में है। इसलिए उनके साथ नेहरू की हकीकत को जरूर साझा किया जाना चाहिए। नेहरू आलोचना से परे नहीं हैं, मगर उनके प्रति नफरत फैलाना भारत के स्वतंत्रता संग्राम और नेहरू की अगुवाई में हुए भारत निर्माण को लेकर नफरत फैलाना है। युवाओं को जानना चाहिए कि नेहरू राहुल गांधी के परदादा भर नहीं थे। वे हमारे स्वतंत्रता संघर्ष के महानतम नेताओं में से एक थे, जिन्हें नौ बार जेल में डाला गया। यहां यह उल्लेखनीय है कि उन्होंने 3259 दिन अर्थात नौ वर्ष की लंबी अवधि जेल में बिताई। जेल में रहते उन्होंने उल्लेखनीय पुस्तकें लिखीं, जिन्होंने लाखों देशप्रेमियों को प्रभावित और शिक्षित किया। नौजवानों को सवाल करना चाहिए कि क्या किसी भाजपाई नेता अथवा आरएसएस के किसी व्यक्ति ने देश की आजादी के लिए स्वतंत्रता संघर्ष में भाग लिया और जेल गए।याद रहे सरदार वल्लभ भाई पटेल ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ (आरएसएस) की विचारधारा को देश के लिए घातक मानते थे। इसीलिए उन्होंने 1948 में आरएसएस पर पाबंदी लगा दी थी। सरदार पटेल कांग्रेस की नीतियों, राष्ट्रवाद, देश की मजबूती के पक्षधर थे। हिंदुत्व के नाम पर आज जिस तरह सांप्रदायिक उन्माद का जहर घोला जा रहा है, वे इसके कट्टर विरोधी थे। मोदी जी उनकी आड़ में चुनाव में लाभ लेने के लिए तरह-तरह के स्वांग रच रहे हैं।मोदी जी दलील देते हैं कि सरदार पटेल यदि प्रधानमंत्री होते तो भारत शक्तिशाली, बेहतर राष्ट्र होता और सारा कश्मीर हमारा होता। मगर यह भी तथ्य है कि विभाजन के समय सरदार पटेल पूरा कश्मीर देने को तैयार थे। नेहरू नहीं होते तो वह भी हमारे पास नहीं होता, जो आज है। नेहरू व पटेल के बीच जो भी मतभेद थे, वे कांग्रेस की विचारधारा के भीतर के मतभेद थे। पटेल ने एक कांग्रेसी के रूप में ही देश की सेवा की थी और इसी रूप में वे विदा भी हुए थे। इस तथ्य को स्वीकारने में जब पुराने जनसंघियों को परेशानी होती है तो वे नेहरू व पटेल के मतभेदों को कुछ इस तरह पेश करते हैं जैसे पटेल जनसंघी हो गए हों।नेहरू जी ऐसे बुद्धिमान और विचारशील नेता थे, जिनका दुनिया में अत्यधिक सम्मान था। याद रखा जाना चाहिए कि जब भारत को शक्ति के रूप में नहीं देखा जाता था, तब वे विश्व के नेता थे। नए भारत की एक मजबूत आधारशिला उन्होंने रखी, जिसके बलबूते भारत आत्मनिर्भर बन पाया। उन्होंने ही भिलाई, राउरकेला जैसे भारी उद्योगों की स्थापना की। बांधों और नहरों के जाल की नींव डाली। आईआईटी, एम्स, आरईसी, आईआईएम, एनसीईआरटी, सीबीएसई, केंद्रीय विद्यालय जैसे अनुसंधान और अध्ययन के महत्वपूर्ण संस्थान बनाए। ये सब उनके जीते जी बनाए गए। उन्होंने योजना, वित्त, राजकाज, शिक्षा, चिकित्सा, विज्ञान आदि क्षेत्रों में राष्ट्र के सर्वोत्तम संस्थानों का निर्माण किया। इसके लिए एक बड़ी दृष्टि चाहिए थी। जो बुनियादी ढांचा वे बना गए थे, बाद की सरकारों ने उसी के आधार पर अपने काम को आगे बढ़ाया। बाद की सरकारोंको बुनियाद रखने के कठिन काम से छूट मिली रही।वर्ष 2019 के आम चुनाव में सत्ता पक्ष जनता को भ्रमित करने के लिए तरह-तरह के ढोंग कर रहा है। खासतौर पर चार घंटे की सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट हवाई हमले का जोर-शोर से बखान किया जा रहा है, और कांग्रेस को पाकिस्तान का हमदर्द बताया जा रहा है। यह भारत को एक स्मृतिलोप की तरफ ले जाने के बराबर है। क्या भारत की नई पीढ़ी के लोगों को 1965 के युद्ध के समय पाकिस्तानी सेना को चटाई गई धूल के बारे में कुछ पता है, जब भारतीय सेनाएं लाहौर के पास इच्छो गिल नहर तक पहुंच गईं थी? क्या नई पीढ़ी को यह पता है कि 1947 में देश के बंटवारे के वक्त आज का बांग्लादेश पूर्वी-पाकिस्तान था ? वर्ष 1971 में पाकिस्तान के चुनाव में शेख मुजीब-उर-रहमान को अधिक वोट मिलने पर भी भुट्टो को प्रधानमंत्री बना दिया गया था। इससे पूर्वी पाकिस्तान में विद्रोह भड़क गया। पाकिस्तानी सेना के जुल्म-ओ-सितम व मारकाट से शरणार्थियों की संख्या बढ़ गई। तब फील्ड मार्शल मानेकशॉ के मार्गदर्शन में भारतीय सेना ने पूर्वी-पाकिस्तान पर हमला कर दिया। कुछ दिनों की लड़ाई में ही पाकिस्तानी सेना ने हार मानते हुए जनरल टिक्का खान सहित 93 हजार सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने समर्पण कर दिया और पाकिस्तान के स्थान पर बांग्लादेश अस्तित्व में आया। शेख मुजीब पहले प्रधानमंत्री बने। उस समय भारत में कांग्रेस की सरकार थी और राहुल गांधी की दादी इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थीं।

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