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यहां मां काली को पहला पुष्प अर्पित करते हैं अश्वथामा

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इटावा ।

उत्तर प्रदेश के इटावा मे यमुना नदी के किनारे मॉ काली का एक ऐसा मंदिर है जिसके बारे जनश्रुति है कि यहां महाभारत काल का अमर पात्र अश्वश्थामा अदृश्य रूप मे आकर सबसे पहले पूजा करता है ।

 

इटावा मुख्यालय से मात्र पांच किलोमीटर की दूरी पर यमुना नदी के तट पर स्थित इस मंदिर का नवरात्रि के मौके पर खासा महत्व हो जाता है जब मनोकामना को पूरा करने के इरादे से दूर दराज से भक्तगण यहां आते है ।

मंदिर के मुख्य मंहत राधेश्याम द्विवेदी का कहना है कि कालीवाहन नामक इस मंदिर का अपना एक अलग महत्व है। नवरात्रि के दिनो मे तो इस मंदिर की महत्ता अपने आप मे खास बन पडती है। वर्ष 1972 से वह इस मंदिर की सेवा कर रहे है लेकिन आज तक इस बात का पता नही लग सका है रात के अंधेरे मे जब मंदिर को घुल करके साफ कर दिया जाता है इसके बावजूद तडके जब गर्भगृह खोला जाता है उस समय मंदिर के भीतर ताजे फूल मिलते है जो इस बात को साबित करता है कोई अदृश्य रूप मे आकर पूजा करता है। मान्यता है कि अश्वश्थामा मंदिर मे पूजा करने के लिये आते है।

के.के.पोस्ट ग्रेजुएट कालेज के इतिहास विभाग के प्रमुख डा.शैलेंद्र शर्मा का कहना है कि इतिहास में कोई भी घटना तब तक प्रमाणिक नहीं मानी जा सकती जब तक कि उसके पक्ष में पुरातात्विक, साहित्यिक ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध न हो जाएं । हालांकि जनश्रुतियों के अनुसार कतिपय बातें समाज मे प्रचलित हो जातीं हैं यद्यपि महाभारत ऐतिहासिक ग्रन्थ है लेकिन उसके पात्र अश्वत्थामा का इटावा में काली मंदिर में आकर पूजा करने का कोई प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैै । फिर भी आस्था के आगे सब कुछ पीछे छूट जाता है ।

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कभी चंबल के खूखांर डाकुओ की आस्था का केंद्र रहे महाभारत कालीन सभ्यता से जुडे इस मंदिर से डाकुओं से इतना लगाव रहा है कि वो अपने गैंग के डाकुओ के साथ आकर पूजा अर्चना करने मे पुलिस की चौकसी के बावजूद कामयाब हुये, लेकिन इस बात की पुष्टि तब हुई जब मंदिर मे डाकुओं के नाम के घंटे और झंडे चढे हुये देखे गये।

इटावा के गजेटियर में इसे काली भवन का नाम दिया गया है। इष्टम अर्थात शैव क्षेत्र होने के कारण इटावा में शिव मंदिरों के साथ दुर्गा के मंदिर भी बड़ी सख्या में हैं। महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती की प्रतिमायें है, इस मंदिर में स्थित मूर्ति शिल्प 10 वीं से बारहवीं शताब्दी के मध्य का है। वर्तमान मंदिर का निर्माण बीसवीं शताब्दी की देन है।

मंदिर में देवी की तीन मूर्तियाँ है- महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती । महाकाली का पूजन शक्ति धर्म के आरंभिक रूवरूप की देन है। मार्कण्डेय पुराण एवं अन्य पौराणिक कथानकों के अनुसार दुर्गा जी प्रारम्भ में काली थी। एक बार वे भगवान शिव के साथ आलिगंनबद्ध थीं, तो शिवजी ने परिहास करते हुए कहा कि ऐसा लगता है जैसे श्वेत चंदन वृक्ष में काली नागिन लिपटी हुई हो। पार्वती जी को क्रोध आ गया और उन्होंने तपस्या के द्वारा गौर वर्ण प्राप्त किया। मंदिर परिसर में एक मठिया में शिव दुर्गा एवं उनके परिवार की भी प्रतिष्ठा है।

मठिया के बाहर के बरामदे का निर्माण न्यायमूर्ति प्रेमशंकर गुप्त के पूर्वजों ने किया है। महाभारत में उल्लेख है कि दुर्गाजी ने जब महिषासुर तथा शुम्भ-निशुम्भ का वध  कर दिया, तो उन्हें काली, कराली, काल्यानी आदि नामों से भी पुकारा जाने लगा। कालीवाहन मंदिर के बारे में जनश्रुति है, कि प्रातः काल जब भी मंदिर का गर्भगृह खोला जाता है, तो मूर्तियॉ पूजित मिलती हैं। कहा जाता है कि द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वमत्थामा अव्यक्ता रूप में आकर इन मूर्तियों की पूजा करता है। कालीवाह मंदिर श्रद्धा का केन्द्र है। नवरात्रि के दिनों में यहाँ बड़ी संख्या में श्रृद्धालु आते हैं।

कालीवाह मंदिर काफी पहले से सिनेमाई निर्देशको के आकर्षण का केंद्र बना रहा है । डाकुओ पर बनी कई फिल्मो की शूटिंग इस मंदिर परिसर मे हो चुकी है । निर्माता निर्देशक कृष्णा मिश्रा की फिल्म बीहड की भी फिल्म का कुछ हिस्सा इस मंदिर मे फिल्माया गया है । बीहड नामक यह फिल्म 1978 से 2005 के मध्य चंबल घाटी मे सक्रिय रहे डाकुओ की जिंदगी पर बनी है । यमुना नदी के किनारे बसे ऐतहासिक काली वाहन मंदिर के स्वामित्त्व को लेकर अदालत ने फैसला सुनाया हुआ है। लंबी अदालती लडाई के बाद कालीवाह मंदिर अब सार्वजनिक मंदिर ना हो कर निजी मंदिर के दायरे मे आ चुका है । मंदिर के पूर्व पुजारी शंकर गिरी के बेटो को मंदिर को अदालत के आदेशो के बाद सौंपा जा चुका है ।

करीब 22 साल पहले शंकर गिरी के साथ मे पूजा करने वाले सुशील चंद्र गोस्वामी ने नई कमेटी का गठन करके 1997 मे अदालत मे दावा कर इस मंदिर पर अपना हक जताया लेकिन अदालत ने केस की सुनवाई के दौरान एक रिसीवर को तैनात कर दिया । उसके बाद लगातार अदालत मे सुनवाई होती रही । गवाहो सबूतो और सरकारी वकीलो के जिरह के बाद अपर जिला जज ने काली वाहन मंदिर को निजीसंपति मानते हुए शंकर गिरी के बेटे रविंद्र गिरी और विजय गिरी को सौंप दिया । जो वाकायदा अब मंदिर का संचालन करने मे जुटे हुए है ।

मंदिर को सरसव्य करने के लिए उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार के अलावा स्थानीय नगर पालिका परिषद की ओर से कई ऐसी योजनाए चलाई गई है जिसके धन के प्रयोग से मंदिर को नया और बेहतर रूप मिला हुआ है । दूरस्थ बैठ मॉ काली के भक्तो को मंदिर का यह रूप खूब भाता भी है  ।

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