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जदयू-भाजपा की तल्खी : मोहभंग या जुबानी जंग  

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पटना।

जदयू-भाजपा की दोस्ती में आई हालिया तल्खी से एनडीए गठबंधन की गांठ ढीली पड़ने के कयास लगाये जाने लगे हैं। हालांकि दोनों ही दल के शीर्ष नेतृत्व की ओर से ऐसा कोई कदम नहीं उठाया गया है, जिससे गठबंधन में टूट या दरार के पुख्ता संकेत मिलते हों। लेकिन, भाजपा-जदयू के कई कद्दावर नेताओं की तल्ख़ बयानबाजी ने एनडीए में दरार के अटकलों को हवा दी है।

आगामी चुनाव में सीएम फेस से लेकर पटना में हालिया जलजमाव के सवाल पर अपनी ही सरकार पर हमलावर कतिपय भाजपा निताओं और भाजपा कोटे के मंत्री, स्थानीय सांसद-विधायकों के सिर पर ठीकरा फोड़ते जदयू नेताओं ने गठबंधन पर सवाल खड़ा करने का मौका दिया है।

भाजपा-जदयू के संबंधों में अचानक आयी दरार के रहस्यों को जानने की जिज्ञास भी लोगों में बढ़ने लगी है। लोगों में भाजपा और जदयू की अंदरुनी कलह की चर्चा आम है। लोगों में यह भी चर्चा है कि भाजपा अब अपनी शर्तों पर जदयू के साथ संबंध निभाना चाह रही है अथवा जदयू अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि और एजेंडे के प्रति सख्त रहने के लिए गठबंधन के बावजूद भिन्न दिखना चाह रहा है।

हालांकि, दोनों दल की ओर से डैमेज कंट्रोल की कोशिश भी की जा रही है। बावजूद इसके भाजपा-जदयू के रिश्तों को लेकर सियासत गर्म है। नतीजा है, तल्खी से उपजे सवालों को विपक्ष भी हवा देने से नहीं चूक रहा है। सियासी गलियारे में अपने-अपने तरीके से भविष्यवाणी और कयासों का दौर जारी है।

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मसलन, भाजपा-जदयू अगला चुनाव साथ-साथ नहीं लड़ेंगे। भाजपा अब छोटे भाई की स्थिति में नहीं रहना चाहती। यदि साथ लड़े भी तो भाजपा सीएम पद का दावेदार होगी। जदयू को भी भाजपा का साथ रास नहीं आ रहा है। जदयू नए गठबंधन की कवायद में है। वगैरह, वगैरह। ये सवाल राजनीतिक गलियारे में चर्चा का विषय बने हुए हैं। भाजपा के छुटभैये से लेकर तमाम बड़े नेताओं के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चे को हल्के में नहीं लिया जा सकता।

राजनीतिक पंडित इसे न तो अनायास मानते हैं और नहीं अस्वाभाविक, बल्कि इसे सुनियोजित कार्रवाई का हिस्सा मान रहे हैं। विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा-जदयू के बीच चेहरा और कद को लेकर खींचतान होना तय माना जा रहा है।  वहीं सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि राजनीतिक रूप से संवेदनशील प्रदेश की जनता को इसका निहितार्थ समझाने की शायद ही जरूरत हो। भाजपा ने विस चुनाव से पहले राज्य सरकार की विफलताओं को गिनाकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के भ्रम को तोड़ने की कोशिश जरूर की है।

भाजपा ने दमदार तरीके से सबकुछ कह दिया जो उसके जेहन में था। वहीं आगे की लकीर भी खींच दी कि गठबंधन सरकार में रहते भाजपा की इजाजत के बिना जदयू अपने वोटबैंक के हिसाब से सबकुछ तय नहीं कर सकता। वहीं, रावण वध के मौके पर भी भाजपा-जदयू के बीच की दूरियां ने भविष्य की राजनीति और दोनों के संबंधों पर लगाये जा रहे कयासों का ट्रेलर जरूर दिखा दिया है।

हालांकि पूर्व में कई ऐसे मौके आये जब दोनों ही दल के शीर्ष नेतृत्व ने गठबंधन के अटूट होने का दावा कर अटकलों पर विराम लगा चुका है। लेकिन, इसबार शीर्ष नेतृत्व खामोश है। इसलिए भले ही मतभेद न हो, लेकिन कयासों और तल्खियों के बीच कुछ ऐसे मौके आये जब लोगों ने अपने नजरिये से दोनों दलों के बीच दूरी नाप ली।

सियासत में कब क्या हो कोई नहीं जनता। लेकिन, जबतक दोनों दल का शीर्ष नेतृत्व मुंह नहीं खोलता तबतक न तो गठबंधन दरकने के कयासों को पुख्ता माना जा सकता है और न ही तबतक तल्खी पर उपजा भ्रम ही दूर हो सकता है।

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