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ढ़ोल बाजे के साथ महाराज जरासंध की प्रतिमा का हुआ विर्सजन

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नवादा – नगर के गढ़पर मुहल्ला में चन्द्रवंशी समाज द्वारा स्थापित महराज जरासंध की प्रतिमा का विसर्जन रविवार को बाजे-गाजे के साथ किया गया। इस दौरान चन्द्रवंशी समाज के लोगों ने उॅट, हाथी, घोड़ा के साथ जुलूस निकालकर नगर के मुख्य मार्गाे का भ्रमण करते हुए शोभ मंदिर पहुंच मूर्ति का विसर्जन किया।

अखिल भारतीय चंद्रवंशी क्षत्रीय के बैनर एवं चन्द्रवंशी समाज की ओर से परम्परागत तरीके से मगध सम्राट जरासंध की जयंती सदियों से मनाते आ रहा है। जुलूस में शामिल चन्द्रवंशी समाज के लोगों ने बताया कि जरासंध महाभारत कालीन मगध राज्य के नरेश थे, और उनका सपना चक्रवर्ती सम्राट बनने का था।

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जरासंध एक शक्तिशाली राज तो थे लेकिन वह बहुत क्रुर थे। उन्होने अजेय होकर अपना सपना पूरा करने के लिए बहुत से राजाओं को अपने कारागार में बंदी बनाकर रखे थे। वे मथुरा के यदुवंशी नरेश कंश का ससुर एवं परम मित्र थे। उनकी दोनों पुत्रिया आसित एवं प्रपित का विवाह कंष से हुआ था। श्री कृष्ण से कंश वध का प्रतिषोध लेने के लिए 17 बार मथुरा पर चढ़ाई की, लेकिन हर बार उसे असफल होना पड़ा।

वहीं यह भी मान्यता है कि मगध सम्राट के दो अलग शरीर को जरासंध के जन्मोउत्सव के दिन हीं देवी पार्वती ने जरा देवी का रूप धारण कर दोनों आधे शरीर को जोड़ा था तभी से राजा बृहद्रथ ने देवोत्थान पर्व मनाने की घोषणा की। वायु पुराण और महाभारत के पन्नो में राजगीर में जरासंध की महिमा और ऐतिहासिक महत्व का वर्णन मिलता है। मौके पर मोहन सिंह चन्द्रवंशी, रामरतन सिंह, वार्ड पार्षद मनोज चन्द्रवंशी, परमानंद सिंह तथा सुरेश सिंह समेत सैकड़ो की संख्या में लोग मौजूद थे।

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