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अमेरिका ने मारी हमारे पेट पर लात!

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विवेक सक्सेना

चीन की हरकतों पर अमेरिकी नेताओं की बयानबाजी को लेकर हम भले खुशी में उछले लेकिन वास्तविकता कुछ और ही है। नोट रखे कि पिछले दिनों अमेरिका ने भारत को उसकी औकात दिखाते हुए उसकी पीठ पर नहीं बल्कि पेट पर लात मारी है व अमेरिकी सरकार के एक फैसले के बाद भारत के पढ़े-लिखे ज्यादातर आईटी विशेषज्ञ अब वहां नौकरी करने नहीं जा सकेंगे क्योंकि अमेरिकी प्रशासन ने इस साल, 2020 के अंत तक वहां के सबसे लोकप्रिय एच-1बी व एच-2बी समेत एच-4-जे व एल श्रेणी के तमाम वीजा देना बंद कर देने का निर्णय लिया है।  यह बात किसी से छिपी नहीं है कि विकसित व अमीर देश होने के बावजूद अमेरिका में मेधावी व कम वेतन पर मिलने वाले कर्मचारियों की काफी कमी है। इसको पूरा करने के लिए अमेरिका की तमाम जानी-मानी कंपनियां वहां भारत जैसे देशों से अपने कर्मचारियों को नौकरी करने के लिए भेजती है। इसके लिए उन्हें अमेरिकी सरकार अपना एच-1 वीजा देती है।

भारत के नौजवानों के लिए यह वीजा तो मानो सफलता की कुंजी थी। इसके जरिए योग्य व्यक्ति व उसकी पत्नी भी वहां नौकरी कर सकती है। अमेरिकी सरकार औसतन हर साल 85,000 एच-1बी वीजा जारी करती है। इनमें से करीब 65000 उच्च योग्यता प्राप्त लोगों की व 20,000 भारतीयो में पढ़ाई लिखाई करने वालो को जारी किया जाता है। इसके अलावा एच-1बी वीजा के तहत अमेरिकी कंपनियां अपने किसी योग्य  प्रवासी से वहां 7 साल तक काम करवा सकती है। अमेरिका ने एचबी-1 वीजा 1990 में शुरू किया था। तब से अब तक देश के हालात को देखते हुए इसमें वहां की सरकारों ने तरह-तरह के बदलाव किये। इंटरनेट व तकनीक खासतौर से कंप्यूटर के विकास के बाद में बड़ी तादाद में इंफॉर्मेशन तकनीक में माहिर लोग वहां काम करने जाने लगे। हालांकि सच्चाई यह है कि इस वीजा के जरिए अमेरिका जाने वाले लोगों को वहां के नागरिको की तुलना में कहीं कम वेतन दिया जा रहा है। खुद अमेरिकी सरकार में इस कदम की आलोचना होती आई है।

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अमेरिकी लोगों के लिए हम भारतीय लोग तो मानों बिहार से आने वाले मजदूरों जैसे हो गए है जोकि कम वेतन में काम करने को तैयार रहते हैं। जनवरी 2017 में सत्ता संभालने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा था कि कम पैसे पर नौकरी करने वाले यहां के लोगों व अर्थव्यवस्था के लिए घातक साबित हो रहे हैं। क्योंकि स्थानीय लोगों को अच्छी नौकरियां नहीं मिल पा रही हैं। उन्होंने एच-1बी वीजा व्यवस्था को तोड़ डालने की बात भी कहीं है।कोविड-19 के कारण पैदा हुए बुरे आर्थिक हालात व कुछ माह बाद अमेरिका में होने जा रहे राष्ट्रपति चुनाव के कारण ट्रंप काफी परेशान है। पहले इसी 23 जून तक गैर-आव्रजन कर्मचारियों के आने पर रोक लगाई गई व अब इसे 31 दिसंबर तक बढ़ा दिया गया है। सरकार ने साथ ही एच-1बी वीजा हासिल करने के लिए औपचारिक आवश्यकताओं को भी बढ़ा दिया है। वह अपने एच 1-बी वीजा ठुकराने पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं। पिछले साल उसने 6 फीसदी आवेदन ठुकरा दिए थे। सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने के कारण अब यह वीजा दिए जाने की प्रक्रिया पूरी तरह से ठप्प हो गई है।

सो 31 दिसंबर को इसके प्रभाव में आने पर भारत से  लोग वहा नहीं जा सकेंगे। इससे पहले इस वीजा पर अमेरिका में काम करने वाले लोगों, उनकी पत्नियो या बच्चो पर कोई असर नहीं पड़ेगा। यहां यह बताना जरूरी हो जाता है कि सूचना तकनीक की भारतीय कंपनियां हर साल सबसे ज्यादा एच-1बी वीजा अपने कर्मचारियों के लिए हासिल करने के पक्ष में रहती आई है। सरकारी आकड़ों के मुताबिक मौजूदा वित्तीय वर्ष के दौरान जिन 1.84 लाख लोगों ने एच-1बी वीजा के लिए आवेदन किया है उनमे से 67 फीसदी भारतीय थे।पहले यह वीजा लाटरी के जरिए निकाला जाता था पर अब सरकार ने ज्यादा सुयोग्य व ज्यादा वेतन पाने वाले लोगों को ही वीजा देने का फैसला किया है ताकि अमेरिका की आईटी कंपनियेां को एच-1बी वीजा पर लोग न बुलाने पड़े और वे स्थानीय लोगों को भारी वेतन पर नौकरी दें। ट्रंप प्रशासन चाहता हैं कि कंपनियां 50 फीसदी कर्मचारी वहीं से ले व वे अपनी लागत घटा सके।

सरकार के इस फैसले से गूगल, एप्पल, फेसबुक व टिवटर जैसी कंपनियां खासी प्रभावित है। सभी कंपनियो में एच-1बी वीजा पर अमेरिका जाने वाले लोग हैं। . वहां की किसी कंपनी में काम करने के बाद  वे वेतन व पद के प्रभाव के कारण अपनी कंपनी बदल लेते हैं। पिछले साल ऐसा 13,000 आईटी प्रशिक्षित लोगों ने अपनी नौकरी बदली थी। अमेरिकी कंपनियां भी कुछ कम चालाक नहीं है। वे वीजा देने के बदले उनका वेतन नहीं बढ़ाती है व उनकी पद्दोन्नति भी नहीं करती है जोकि जब तक कंपनी उनके वीजा के लिए आवेदन नहीं करेगी वहां लोग टिक नहीं पाएंगे।

वैसे टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज समेत भारतीय कंपनियां अमेरिका में चल रही अपनी परियोजना के लिए भारतीय प्रशिक्षित लोगों को ले जाती हैं। जहां एक और उच्च वेतन पर वहां काम करके भरतीय लोग अपनी पढ़ाई के लिए लिया गया कर्ज चुका पाते हैं वहीं वे लोग वहां लंबा रूक कर अमेरिकी ग्रीन कार्ड हासिल करने की कोशिश करते हैं।गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने सरकार के इस कदम का विरोध करते हुए कहा है कि देश की अर्थव्यवस्था मजबूत बनने में भारतीय लोगों की बहुत अहम भूमिका है। मगर राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है कि जिस कोविड के कारण देश के करोडो लोग बेरोजगार हो चुके है व बेरोजगारी की दर 13.3 फीसदी है तब उनके अपने नागरिको को नौकरी देना ज्यादा अहमियत रखता है।

एक खासियत यह है कि अमेरिका पर इस समय पूरी दुनिया की नजर है। वहां के नेता चुनावों में जनता को लुभाने के लिए एक जैसा बरताव करते हैं। ध्यान रहे कि 33 करोड की जनसंख्या वाले इस देश में बेरोजगारो की संख्या दो करोड़ से ऊपर पहुंच गई है। वहां चंद माह बाद राष्ट्रपति पद के चुनाव होने वाले हैं। रंगभेद की नीति का शिकार बने फ्लयाड की हत्या व कोरोना वायरस के प्रकोप से सफलतापूर्वक सामना न कर पाने के कारण पूरे देश में ट्रंप की आलोचना हो रही है।

तभी वे नौकरी के लिए बाहर से आने वाले योग्य लोगों के आगमन पर रोक लगा कर संदेश देना चाहते हैं कि वे अमेरिका पहले के सिद्धांत पर चल रहे हैं। मगर वे यह बात भूल जाते हैं कि अगर उनके देश पर ही इतने आईटी विशेषज्ञ होते तो उन्हें विदेशों से नौकरी के लिए उन्हें क्यों बुलवाना पड़ता? पर इतना तय है कि उनके इस कदम से जहां हमारे तमाम युवाओं के रंगीन स्वपdन टूट जाएंगे वहीं देश को आर्थिक समस्याओं का भी सामना करना पड़ेगा। देखें की चुनाव क्या रंग दिखाता है।

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