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आदि दर्शन पर वैश्विक सम्मेलन, प्रकृति, पंचतत्व, वैदिक और अवैदिक विषय पर गंभीर मंथन

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रांची : शनिवार को दूसरे दिन रांची के आॅड्रे हाउस में जुटे दुनिया भर के जनजातीय दार्शनिकों ने आत्म, ब्रह्म, प्रकृति, महिला, पुरुष, पाप एवं पूण्य पर गहन मंथन किया। दरअसल, रांची में इन दिनों दुनिया भर के 100 के करीब आदि दार्शनिक जुटे हुए हैं। ये दुनिया भर में फैल, जनजातीय समूहों के दर्शन पर मंथन करने के लिए यहां आए हैं और 17 जनवरी से ये लोग इस गंभीर चिंतन पर अपने-अपने मत प्रस्तुत कर रहे हैं।

दूसरे दिन के कार्यक्रम के प्रथम सत्र में जुडी किपकेंडा, ग्याती राणा, डॉ. आयशा गौतम, डॉ. नेहा अरोड़ा, डॉ. निकोलस लकड़ा, मुकुल राभा, डॉ. शांति खलको ने भाग लिया। इस सत्र की मघ्यस्थता नामचीन आदिवासी चिंतक एवं लेखक महादेव टोप्पो ने किया।

दूसरे सत्र में प्रकृति और भगवान के बीच संबंधों पर चर्चा की गयी। पंचतत्व के चिंतन का आदि सिद्धांत क्या है और उसका वैदिक सिद्धांतों के साथ क्या संबंध है, इसपर गंभीर मंथन किया गया। इस सत्र की मध्यस्थता संत जेवियर कॉलेज के प्राध्यापक संतोष किरो ने किया जबकि इस सत्र में भाग लेने वालों में सूरती हंडयानी, डॉ. रुधिका बोर्डे, धौवमांचूह लमार, पस्साह, डॉ. प्रवीन कुमार उांव एवं सावित्री ने हिस्सा लिया।

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शनिवार को आदि दर्शन सम्मेलन में कुल चार सत्रों में चर्चा हुई। कई विद्वानों ने आदि चिंतन में प्रकृति का व्यक्ति के साथ क्या संबंध है, उसके बारे में अपने विचार रखे। अंत में सभी ने यही कहा कि आदि चिंतन का आधार प्रकृति है और आदि चिंतन सभी चिंतन की जननी है।

ट्राइबल फिलोस्फी पर आयोजित इस सम्मेलन में बंग्लादेश, कीनिया, अफ्रीका, नीदरलैंड सहित 12 देशों के इतिहासकार शिरकत कर रहे हैं। बता दें कि ट्राइबल फिलॉसफी यह दुनिया का पहला कार्यक्रम है। डा.ॅ रामदयाल मुंडा ट्राइबल वेलफेयर रिसर्च इंस्टीच्यूट और कल्याण विभाग द्वारा आयोजित इस सम्मेलन में आदिवासी संस्कृति, सभ्यता और परंपरा पर चिंतन किया जा रहा है।

इस सम्मेलन के सत्रों में आदिवासी समुदाय के रहन-सहन, खान-पान, दिनचर्या और कला-संस्कृति जैसे विषयों पर भी चर्चा हो रही है। नीदरलैंड से इस सम्मेलन में शिरकत करने पहुंचे इतिहासकार पॉल स्ट्रूमर की मानें तो झारखंड ने आदि दर्शन पर सम्मेलन आयोजित कर एक रिकार्ड बनाया है। वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. सुभद्रा चावला ने झारखंड की सराहना करते हुए उम्मीद जतायी कि यह सम्मेलन दुनिया को खास मैसेज देगा।

एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 90 देशों में करीब 37 करोड़ आदिवासी रहते हैं। जो पूरी दुनिया की आबादी का पांच फीसदी है। आदिवासियों की आर्थिक स्थिति पर नजर दौड़ाएं तो दुनिया के गरीबों में 15 फीसदी भागीदारी आदिवासियों की है। आज भी आदिवासी समुदाय का मुख्य आधार जल, जंगल और जमीन है। प्रकृति से प्रेम इनकी जीवनशैली में समाहित है। चाहे सरहुल हो या कर्मा, आदिवासी इन पर्वों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश देते हैं।

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