सन्मार्ग लाइव
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एक अदद टिकट (व्यंग्य)

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डॉ. सजल प्रसाद
स्कॉर्पियो और फॉर्च्यूनर जैसी चमचमाती गाड़ियों का काफिला अब गांव-देहात की कच्ची सड़कों पर धूल उड़ाने लगा है। ऐसी गाड़ियों में लकदक सफेद कुर्ता-पायजामा और इस उमस भरी गर्मी में बंडी धारण करनेवाले कोई एक नेता जी होते हैं और बाकी सब कार्यकर्ता।
अब वह जमाना नहीं रहा कि सीधे-सादे किसी समर्पित समाजसेवी को कोई पार्टी बुलाकर टिकट देगी और उनसे चुनाव लड़ने का आग्रह करेगी। अब तो चुनाव में किसी भी पार्टी का टिकट पाने के लिए जो तिकड़म लड़ाया जाता है और जो किस्से सुनने को मिलते हैं, उससे तो यही लगता है कि क्यों शरीफ लोग राजनीति से दूर होते जा रहे हैं। लेकिन, सियासत का नशा तो सिर चढ़कर बोलता है और चुनाव आते ही कुछ पढ़े-लिखे युवाओं को भी लगता है कि यदि एक बार पार्टी से टिकट मिल जाए तो वह आसानी से चुनाव जीत जाएगा। उस दिन गांव में जब कुछ लोगों ने गाड़ियों का काफिला देखा और गाड़ी से विधायक जी के साथ-साथ कुछ कार्यकर्ताओं को ठसक वाले अंदाज में उतरते देखा तो एक ग्रामीण ने बरबस ही पूछ लिया।
‘धत! ये सब कार्यकर्ता नहीं होते हैं, ये तो चमचे होते हैं।’ – गांव के बुजुर्ग ने गाड़ी से उतरकर अपनी ओर बढ़ रहे विधायक जी के पीछे चलने वाले 5-6 युवकों की टोली को देखकर टिप्पणी की थी।
‘प्रणाम चच्चा!’ – किसी तरह दोनों हाथ जोड़कर विधायक जी ने अभिवादन किया। इस दौरान विधायक जी ने ये ख्याल जरूर रखा कि दोनों कुहनी मुड़ने पर आस्तीन की क्रीज न टूटे और इसलिए उन्होंने जल्दी से दोनों हाथ नीचे भी कर लिए। बेमन से किये गये इस अभिवादन के दौरान क्रीज बचाने की कोशिशों को बुजुर्ग की अनुभवी आंखों ने खूब ताड़ लिया।
‘खूब खुश रहिए और खूब फलिए-फुलिए।’ यह कहकर बुजुर्ग मुस्कुराये और सोचने लगे कि विधायक जी तो पांच साल में फूल कर डबल हो गए हैं, ज्यादा फूल गए तो फटिए जाएंगे।
‘ये बताइए कैसे हैं ? गांव में सब ठीक हैं न !’ विधायक जी ने बात आगे बढ़ायी।’
बुजुर्ग का जवाब थोड़ा कटाक्षपूर्ण था – ‘पांच साल पहले जैसे छोड़ गए थे, वैसे ही हैं।’ चमचों ने बगल की दुकान से एक कुर्सी जुगाड़ कर ली और विधायक जी उस पर बैठने ही वाले थे कि एक चमचे ने इशारे से मना किया। फिर, दौड़कर गाड़ी से झरनी ले आया और कुर्सी को झाड़-पोंछ कर साफ कर दिया। दूसरे, चमचे ने अपने माथे पर बंधा गमछा बिछाया तब विधायक जी उस पर बैठे।
तब तक वो बुजुर्ग व्यक्ति और आसपास पहले से जमा चार-पांच ग्रामीण अपने-अपने काम का बहाना बनाकर वहां से खिसक लिए। यह देख विधायक जी की स्थिति तो सांप-छछूंदर वाली हो गयी। चमचे भी परेशान हो गये। खैर, चमचमाती गाड़ी देखकर वहां जमा हुए बच्चों को ही चॉकलेट का लालच देकर चमचे पकड़ लाए और विधायक जी अपनी झेंप मिटाने के लिए उन्हीं बच्चों से मुखातिब हो गये। इस बीच, दूसरे चमचे ने दुकानदार से मेलजोल बढ़ाकर जानकारी प्राप्त कर ली कि हाल ही में दिल्ली से पढ़कर आया गांव का एक युवक विधायक जी की ही पार्टी से टिकट की जुगाड़ में भिड़ गया है और वह सीधे दिल्ली लॉबी से कनेक्टेड है।
विधायक जी के कान में आकर जब चमचे ने यह बात फुसफुसाते हुए बतायी तो उनके पांव तले जैसे जमीन खिसकने लगी। माथे पर पसीना छलकने लगा और ब्लडप्रेशर जैसे बढ़ गया। नेता जी को याद आया। कुछ दिन पहले ही वे जब पटना गए थे तो ‘साहेब’ के बाएं सिपहसालार ने तवज्जो ही नहीं दी थी। मछली की टोकरी व दही का हांडी देखकर भी नहीं चहके थे। तिमाही के फंड वाला काले चमड़े का बैग भी देखकर वे खुश नहीं हुए थे। एक-एक कर सारा दृश्य सामने आ रहा था और विधायक जी अचानक मूर्च्छित होने लगे। सारे चमचे ताड़ गए और जल्दी से घेरा बनाकर मूर्च्छित हो रहे विधायक जी को उठाकर गाड़ी में किसी तरह लादा और वहां से निकल लिए। विधायक आवास पहुंच कर तुरंत डॉक्टर को बुलाया गया। हालात देखकर डॉक्टर मर्ज समझ गये। फिर भी चमचों से पूछा – ‘कोई बुरी खबर सुने थे क्या ?’ चमचों ने सिर हिलाकर हामी भरी और पूरा किस्सा सुनाया।
‘आज की खुराक ली थी क्या ?’ डॉक्टर ने फिर पूछा।
‘नहीं डॉक्टर साहब! बन्दी के बाद तो विधायक जी वाला ब्रांड मिलना ही मुश्किल हो गया है।’ – एक सीनियर चमचे ने जवाब दिया।
‘वो तो खाली बोतल में ही मडुवा वाला डालकर दो दिन खींच दिये, नहीं तो दो दिन पहले ही स्थिति नाजुक हो जाती।’- चमचे ने कहा।
‘पर, झटका टिकट को लेकर ही लगा है’- दूसरे चमचे ने स्पेशल ओपिनियन दिया। डॉक्टर ने भी हामी में सिर हिला दिया।
दूसरे दिन विधायक जी पटना रवाना हो गए और सीधे ‘साहेब’ के दाएं सिपहसालार की कोठी में पहुंच गये। विधायक के पहुंचने की बात पता लगते ही दाएं सिपहसालार की पहले तो पांच साल पहले हुई अपनी उपेक्षा यादकर भंवें तन गयी, फिर कुछ सोचकर ड्राइंग रूम में बुलवाया।
विधायक जी पुराने खिलाड़ी हैं। घुसते ही पांव पकड़कर फर्श पर लोट गये और अपनी पुरानी गलती के लिए क्षमा मांगते हुए गिरगिट की तरह रंग बदला और मगरमच्छी आंसू बहाने लगे।
तब तक दो चमचों ने देसी मुर्गी की एक टोकरी अंदर आंगन में रख दी और विधायक जी ने पांच साल की पूरी फीस भरकर लाए एक बड़े काले चमड़े के बैग को दाएं सिपहसालार के गले में ऐसे पहना दी , जैसे वह फूलों का हार हो। गले में लटके बैग के वजन से सिपहसालार संतुष्ट हो लिए थे।
‘कहीं कंकड़-पत्थर तो नहीं’ – यही सोचकर उन्होंने विधायक के सामने ही बैग को खोलकर चेक कर लिया और मुतमईन हो गए।
‘अब कहिए, कैसे आना हुआ?’
विधायक जी की जैसे जान में जान आयी। टिकट को लेकर आशंका जतायी। अपने विधानसभा क्षेत्र में दिल्ली वाले युवक की सक्रियता और लॉबी का भी जिक्र किया।
‘बस, अब आपका ही आसरा है’- विधायक जी की बातें सुनकर सिपहसालार की छोटी आंखें और छोटी हो गयीं।
‘आप चिंता नहीं कीजिए, आज से यह सेवक आपकी हर जरूरत पूरी करेगा।’ – विधायक जी ने जानबूझकर ‘हर जरूरत’ पर जोर दिया था।
सुनकर सिपहसालार के चेहरे पर जैसे चमक आ गयी थी। पांच साल पहले विधायक के साथ कोलकाता का प्रवास याद आ गयी उन्हें। विधायक का तीर निशाने पर लगा था।
‘देखते हैं, आपके लिए हम क्या कर सकते हैं।’- दाएं सिपहसालार ने एक अंगड़ाई लेकर कहा था।
‘ हुजूर ! कल कोलकाता राजधानी ट्रेन का कन्फर्म टिकट ले लेते हैं।’ विधायक जी ने उत्साहित होकर पूछा था। दाएं सिपहसालार द्वारा हामी भरते ही विधायक जी समझ गए थे कि अब कोई माई का लाल भी उनका टिकट नहीं काट सकता है। विधायक जी के इस आत्मविश्वास का कारण यही था कि ‘साहेब’ इन दिनों बाएं सिपहसालार से नाराज चल रहे हैं और जरूरी निर्णय के साथ-साथ गोपनीय गतिविधियों के लिए दाएं सिपहसालार पर ही निर्भर हैं।
कोलकाता प्रवास से लौटने के अगले ही दिन से अंतिम चरण के चुनाव के लिए नामांकन शुरू होनेवाला था। पार्टी दफ्तर में विधायक जी को टिकट देने का एलान किया गया और वहीं पत्रकारों के सामने ही उन्हें सिम्बल देकर नामांकन करने के लिए विदा किया गया।
पार्टी दफ्तर में ही बैठा दिल्ली से पढ़ाई कर लौटा वह युवक समझ नहीं पाया कि एक दिन पहले ही जब ‘साहेब’ ने खुद उसकी पीठ थपथपाई थी और युवा चेहरों को टिकट देने की बात कही थी तो, रातोंरात फैसला कैसे उलट गया।
‘निर्णय कैसे बदल गया, अध्यक्ष जी!’ – युवक के स्वर में तल्खी थी।
‘बेटे! अभी राजनीति में नये-नये आए हो, यहां तो पूरी सरकार ही रातोंरात पाला बदल लेती है और दूसरी पार्टी की सरकार बन जाती है। तेरे मामले में तो चुनावी वैतरणी पार करने के लिए महज एक अदद टिकट का ही सवाल था।’ – पार्टी अध्यक्ष ने युवक की जिज्ञासा शांत करने की कोशिश की थी।

एसोसिएट प्रोफेसर व
अध्यक्ष, हिंदी विभाग
मारवाड़ी कॉलेज, किशनगंज (बिहार)।

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