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एनकाउंटर में एक्टिंग (व्यंग्य)

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डॉ. सजल प्रसाद
पुलिस महकमे में दारोगा बहाली के लिए शहर के गांधी मैदान में फिजिकल एक्जामिनेशन कल से ही चल रहा था। इसके लिए दूर-दूर के गांव से 18-20 साल के गबरूं जवानों की भीड़ शहर में उमड़ी थी। पीठ पर एक पिट्ठु बैग और पानी की बोतल झुलाए इन जवान लड़कों ने बसस्टैंड, रेलवे स्टेशन, पार्क, मंदिर, मस्जिद, धर्मशाला आदि में पनाह ले रखी थी। इनके पास इतने रुपये भी नहीं होते कि किसी कामचलाऊ होटल में ही रुक सकें। अधिकतर लड़कों के पास 6.4 की प्लास्टिक जरूर होती, जिसे कहीं भी बिछाकर ये पसर जाते और तुरंत गहरी नींद के आगोश में समा जाते। इन्हें मच्छरों का कोई खौफ नहीं रहता या मच्छर ही इनसे शायद खौफ खाते होंगे। आखिर भविष्य के ये दारोगा यदि मच्छरों से डर जाएं तो अपराधी से कैसे लड़ेंगे ? इसी कारण नगर निगम प्रशासन ने शहर में एक महीने से डीडीटी नहीं छिड़कवाया था और न ही फॉगिंग मशीन से शहर को धुआं-धुआं किया था। फिजिकल टेस्ट में सारे कपड़े उतरवा दिये जाते। केवल जांघिया या लंगोट पहने रहने की इजाजत थी। एक लड़के ने कहा भी – स्ससा…! इहो उतरवाइये दो तो, दारोगा न बन के नागा साधु’ए हम बन जाएं।’ फिजिकल टेस्ट में लंबाई और वजन के बाद छाती नापी जाती थी। फिर, सांस फुलाकर छाती नापी जाती थी। यह देखकर एक कैंडिडेट ने कहा, ‘सिंगल फेफड़ा वाले मंत्रियों का इस तरीके से टेस्ट हो तो सांस फुलाते ही उनके प्राण निकल जाएं।’
पांच मिनट में आठ किलोमीटर की दौड़ लगानी होती थी। कच्छा या लंगोट पहनकर दौड़ने वाले कैंडिडेट की कतार को देखकर एक दर्शक ने टिप्पणी की- ‘नेताओं को यह दौड़ लगानी पड़े तो, उनकी तोंद टूटकर यहीं मैदान में गिर जाएगी और बगल में खेल रहे बच्चों को मुफ्त में दर्जनों फुटबॉल मिल जाएंगे। दूसरी तरफ, एक दूर कोने में एक तम्बू के नीचे कुछ बड़े पुलिस अफसर अलग से बैठे थे। फिजिकल टेस्ट के बाद चुनिंदा रोबदार चेहरा, ऐंठी हुई मूंछ, कसी हुई मुश्कें और गठीले बदन वाले कुछ जवानों को इस तम्बू में बैठे पुलिस अफसरों के पास भेजा जाता था।
यहां आने पर उनसे प्रश्न किया जाता – ‘एक्टिंग आती है?’ प्रश्न सुनकर सब अचकचा जाते। कोई हां, तो कोई ना कह रहा था। लंबा कद, कसी हुई देह व गोरा-चिट्टा दिखने वाले एक लड़के ने हिम्मत करके पूछ ही लिया – ‘क्या साहब! हमको दारोगा बनाइएगा कि बॉलीवुड का सलमान खान!’
पुलिस के बड़े अधिकारी ने हंस कर कहा – ‘बेटा! तेरा सेलेक्शन हो गया तो जल्द समझ जाओगे।’
फिजिकल टेस्ट पास कर चुके ऐसे कुल 18 जवानों को अलग किया गया था, जिसने कहा था कि उन्हें एक्टिंग आती है। अब इन जवानों में कानाफूसी शुरू हो चुकी थी। एक ने कहा – ‘मालूम होता कि एक्टिंग के कारण नौकरी मिलेगी तो अखाड़े की बजाय थियेटर में घुसे रहता।’
दूसरे ने कहा – ‘चोप्प ! तेरा अकल चरने गया है क्या ! अबे, लगता है ई ससुर हमनी के जासूस बनाएगा।’
तीसरे का कहना था – ‘छोड़ यार ! दारोगा बन गये तो ऐसे भी झूठ-सच बोलना पड़ेगा। एसपी साहब की पत्नी की फरमाइश पूरी न हुई तो निर्विकार भाव से झूठ बोलने को तैयार रहना पड़ेगा।’
खैर ! अब एक्टिंग टेस्ट की बारी थी। तम्बू के अंदर बारी-बारी बुलाया जा रहा था। एक बड़े अधिकारी वहीं अंदर कुर्सी पर बैठे थे और टेस्ट ले रहे थे।
उन्होंने एक कैंडिडेट से पूछा – ‘कभी एक्टिंग की है?’
‘जी सर!’
‘कहां एक्टिंग किये?’- दूसरा प्रश्न था।
‘गांव में रामलीला होती थी, उसी में एक्टिंग की थी।’ – लड़के का जवाब था।
‘क्या रोल प्ले किया था तुमने?’- अफसर ने पूछा
‘शूर्पनखा बना था, सर!’
‘अरे वाह ! शाबाश !’- अफसर को खुश देख लड़के का हौसला बढ़ा।
‘उस दृश्य में नाक काटे जाने के बाद शूर्पनखा के रोल में मैं जमीन पर गिरकर ऐसा तड़पा था कि कई दर्शक मंच पर चढ़ आए थे और लक्ष्मण बने एक्टर की जमकर धुनाई कर दी थी।’ – लड़का उत्साहित होकर बता रहा था।
‘तेरा सेलेक्शन पक्का!’- अफसर ने पीठ ठोंकी।
‘तू अब बाहर जा और दूसरे को भेज।’- यह कहकर अफसर ने अपनी टांगें लंबी की।
तम्बू में दूसरा कैंडिडेट घुसा। अफसर ने पूछा – ‘कभी अभिनय किया है क्या?’
‘जी सर ! गांव की रामलीला में मैं लक्ष्मण बनता था।’- लड़के ने आत्मविश्वास से उत्तर दिया।
‘कोई दृश्य बताओ’- अफसर ने निर्देश दिया।
‘सर ! लक्ष्मण के रोल में तीर लगने के बाद मूर्छित होकर जमीन पर गिरने की ऐसी एक्टिंग की थी कि राम की एक्टिंग कर रहे चुन्ना भैया गला फाड़ कर रोने लगे थे और दर्शक मंच पर चढ़कर मेरे चेहरे पर पानी का छींटा मार-मारकर मुझे जैसे होश में लाने का प्रयास करते रहे थे।’ – अच्छी शक्ल-सूरत के उस कैंडिडेट ने अपनी अभिनय-कथा सुनायी।
‘वेल डन ! तू भी सेलेक्ट।’ – अफसर ने कहा।
लंबे कद का एक तीसरा कैंडिडेट आया तो अफसर ने कड़क कर पूछा – ‘बता, तुमने कभी कोई एक्टिंग की है?’
‘यस सर! मैंने कॉलेज में एक शार्ट प्ले में शोले फिल्म के उस दृश्य में जय बने अमिताभ बच्चन की एक्टिंग की थी, जिसमें ‘जय’ यानी अमिताभ बच्चन यानी मुझे गोली लग जाती है और मैं तड़पते हुए भी सिक्का उछालकर वीरू को निकल जाने को कहता हूं। – यह बताते हुए वह लड़का भावुक भी हो जाता है और जैसे जय के किरदार में घुस जाता है।
‘तेरा भी सेलेक्शन फाइनल’- अफसर ने निर्णय सुनाया।
इसी तरह 18 जवानों में से 12 का सेलेक्शन एक्टिंग एबिलिटी के आधार पर कर लिया गया और शेष छह को जेनरल सेलेक्शन में भेज दिया गया।
एक्टिंग एबिलिटी के नाम पर सेलेक्ट हुए इन सभी 12 जवानों को अब एक दूसरे पंडाल में जमा किया गया। पंडाल में सामने टेबुल के पीछे रोबदार चेहरा और मोटी, घनी व गोल होकर पीछे घूमती हुई मूंछ वाले एक दूसरे पुलिस अफसर की कड़क आवाज गूंजी – ‘वेल ब्वायज ! यू आॅल ट्वेल्व आर रिक्रूटेड एंड सेलेक्टेड फॉर स्पेशल टास्क फोर्स।’
‘यस सर!’- एक साथ बारह जवानों की आवाजें गूंज गयी।
‘गेट रेडी फॉर ए स्पेशल मिशन … नाउ द टाइम हैज कम एंड यू आॅल हैव टू प्रूव योर एक्टिंग स्किल।’- यह सुनकर अभी-अभी सेलेक्ट हुए इन रंगरूटों ने एक-दूसरे के चेहरे की तरफ देखने शुरू किया।
यह भांपकर उस कड़क अफसर ने कहा- ‘एक गैंगस्टर को बाबा के दरबार में पार्सल करना है।’
फिर उन्होंने तीन जवानों की तरफ मुस्कुराकर देखा और उनमें से एक से कहा – ‘शूर्पनखा! तुम्हें नाक कटने के बाद गिरकर तड़पने की एक्टिंग करनी है।’
दूसरे से कहा – ‘लक्ष्मण! तुम्हें तीर लगने के बाद मूर्छित हो जाने की एक्टिंग करनी है।’
और, तीसरे से वे मुखातिब हुए – ‘वेल बिग बी! तुम्हें शोले फिल्म में गोली लगने के बाद भी लड़ते रहने वाले अमिताभ बच्चन की एक्टिंग करनी है।’
यह कहकर वह जाने लगे और फिर अचानक मुड़ कर बोले – ‘डोंट वरी यंग मेन ! पार्सल भेजने का काम तुम्हारे कमांडिंग अफसर करेंगे। तुम तीनों को केवल एक्टिंग ही करनी है।’
एनकाउंटर के बाद एसटीएफ में शूर्पनखा, लक्ष्मण और अमिताभ बच्चन का किरदार निभानेवाले तीनों जवानों का एक साथ तीन-तीन इंक्रीमेंट बढ़ाकर वेतन निर्धारण किया गया था और पार्सल करनेवाले अफसर को ग्रेड वन में प्रोमोशन मिला था। दूसरी तरफ, गैंगस्टर की हिस्ट्री जानकर शहर में कई लोग एनकाउंटर को जस्टिफाइड बता रहे थे तो कुछ लोग इसे हिडेन पॉलिसी के तहत एक्ट प्ले बताने पर तुले थे।

एसोसिएट प्रोफेसर व
अध्यक्ष, हिंदी विभाग,
मारवाड़ी कॉलेज, किशनगंज (बिहार)।

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