सन्मार्ग लाइव
सनसनी नहीं, सटीक खबर

कहो कि मैं कौन हूं?

कोरोना की कविता। राजेश श्रीवास्तव

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– कहो कि मैं कौन हूं, क्यूं इतना मैं मौन हूं, गुनगुनाता था कभी मैं,खिलखिलाता था कभी मैं…….

– ना जाने अचानक ये क्या हुआ,सिसकती रातों में बेचैन हूं मैं,इतनी भयावह भी होगी जिंदगी मेरी, कि खुद को भी पहचान ना पाऊं, कि कौन हूं मैं।

– जो दुखों का अंबार बिखरा पड़ा है,किसी को बताऊं तो कैसे बताऊं। मेरी कशमकश को तो कोई ना समझे, हंस के कहूं तो मेरा दर्द कोई ना समझे,किसी मोड़ पे कोई मदद भी कर दे,तो अपने सम्मान का मोह भी कैसे भुला दे।

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– बचा भी ना सकता अब आशियाना भी अपना, शेष कहीं ना बचा अब ठिकाना भी अपना,बड़े प्यार से जो मालिक थे रखते,वह भी अब लहजे से हो गए बेगाना।

– कहो क्या थी मेरी ये अपनी ही भूल,बचे थे ना पैसे,ना खर्चे फिजूल,अब वो पत्नी की बेचैनी और बच्चों के स्कूल,तंग आ गया हूं देखकर अपने ये उसूल।

– बेबसी के ये किस्से किसे मैं सुनाऊं, जहां भी मैं जाऊं अकेला ही पाऊं,ना फिक्र इतनी थी मुझे अपने आप को जिलाने की,लेकिन अब इस जद्दोजहद में फिक्र है परिवार को खिलाने की।।

– धीर हूं गंभीर हूं ,निस्तेज लिए शरीर हूं, ना मैं मजदूर हूं ,ना ही मैं अमीर हूं, मृत्यु तो मेरी तय है, क्योंकि इनके बीच की मैं लकीर हूं,बेजुबान अपनी होठों को सिए ,चलता हुआ राहगीर हूं।।।।।

ना ही मैं दिहाड़ी मजदूरी खट सकता हूं,ना ही हवा में उड़ सकता हूं,एक में मेरे सम्मान को ठेस लगेगा तो दूसरे में मेरी पेट को, इन दोनों के बीच ही मैं पिसता रहा हूं,पिसता रहूंगा।।।।।

– हां मै वही हूं, जो रिसेपशन पर बैठा आपको हंस के सलाम करता था,

आपको खाना परोसकर भाभी जी की खबर भी पूछता था,अपने खाने के जादू से आपसे टिप लेता था,

वो प्रिंटर की दुकान से अपने घर को चलाता था,वो टाइपिंग की मशीन से कचहरी में टक टकाता था,

वो बेकरी की केक से आपके बच्चो की खुशियां लौटाता था,तब जाके मैं अपनी छोटी बहन की शादी के पैसे जुटा पाता था,

वो फूड स्टॉल के काउंटर को शाम में सजाता था,तब जाके अपने मोटरसाइकिल की लोन चुका पाता था,

वो प्रोडक्ट बेचने के लिए सड़क किनारे छतरियां लगाता था,

तब जाके अपने छोटे भाई को अच्छे स्कूल में पढ़ा पाता था,

ट्युशन पढ़ाके अपनी बूढ़ी मां का इलाज करवाता था,वो मंदिर में पूजा कराके दक्षिणा पाता था,दिन भर खट के टेबल कुर्सियां बनाता था,

तब जाके आपके शौक को पूरा कर पाता था,आपके सपने के घर में नक्काशियां उतारता था,

वो थपेड़े ख़ाके प्राइवेट कंपनी में सैलरी पाता था,
तब जाके वो इस मायावी शहर में किराया भर दे पाता था,

वो मैकेनिक वो फिटर वो गांव के आर्केस्ट्रा का गायन,सब खत्म कर दिया ये लॉकडाउन का डायन।

– समाज के वे दानी,ऐसा स्वांग रचाते है,दान करके वे मुझसे , अपनी फोटो खिचाते हैं,बेबसी का ये आलम मुझसे अब सहा ना गया,, पर देखते ही देखते ये क्या से क्या हो गया।।।।।।।।।।।,।।।।।।।।।।।।

– ना तेरे दान को ना ही तेरे सम्मान को,ले ना सकूंगा बेच कर अपने स्वाभिमान को,ना मैं मांग सकता हूं ना ही मैं छीन सकता हूं,बस बचे हुए जिंदगी के दिन अब गिन सकता हूं । ।

— रोजमर्रा के खर्चों से अब मैं उब सा गया हूं,साहूकार के कर्जो से अब मैं डूब सा गया हूं,किसी दिन जो ना देखोगे मुझको,,,, देखोगे की पत्नी – बच्चों संग पंखे से झूल गया हूं।।

– पर अब भी मैं मौन हूं,सरकारी खाते में भी गौण हूं,फिर भी ना मुझे पहचाने आप,आखिर मैं कौन हूं?- — (निम्न मध्यम वर्गीय बेबस और लाचार व्यक्ति की कहानी)-राजेश श्रीवास्तव,रांची

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