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कोरोना एक राष्ट्रीय आपदा

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दिल्ली भी अपनी जिम्मेदारी संभाले देशभर में संक्रमण के मामले अब कई गुना तेजी से बढ़ रहे हैं। वर्तमान स्थिति पर खुद संज्ञान लेते हुए उच्चतम न्यायालय ने सरकार से जवाब तलब किया और रपट देने का आदेश दिया है। महामारी अभी तक भले सामुदायिक स्तर पर न फैली हो, लेकिन देश के कई बड़े शहरों में जिस तेजी से अचानक नए मामले सामने आ रहे हैं, उससे लगता है, खतरा अब तेजी के साथ बढ़ रहा है। सभी प्रभावित राज्यों की सरकारें यथाशक्ति इस महामारी का, जो जीवन और जीविका दोनों के लिए खतरा बन गया, सामना कर रहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोनावायरस के खिलाफ लड़ाई का आगाज करते हुए लॉकडाउन का ऐलान किया, लेकिन अब 80 दिनों के बाद भी कोरोना के खिलाफ लड़ाई नहीं जीती गई है। जनता को उसके हाल पर नहीं छोड़ा जा सकता। सभी राज्यों को अतिरिक्त आईसीयू के बेड्स, वेंटिलेटरों, टेस्टिंग के साधनों की जरूरत है। कोरोना के साथ रहना सीखने की सलाह देने की बजाय उसे रोकने का प्रयास होना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि राजनीति को किनारे रखकर दिल्ली इस राष्ट्रीय आपदा के समक्ष अपनी जिम्मेदारी संभाले।
लॉकडाउन और अनलॉकडाउन के हम तीसरे महीने में हैं। कहा जा रहा है कि कोरोना का सबसे बुरा दौर अभी आया नहीं है। देश में संक्रमितों की संख्या 3 लाख के आंकड़े पार कर गई है। भारत दुनिया में कोरोना से सबसे अधिक प्रभावित देशों की सूची में चौथे स्थान पर पहुंच गया है। देश के हेल्थ विशेषज्ञों के अनुसार भारत कोरोना के कम्युनिटी ट्रांसमिशन के चरम पर पहुंच गया है, लेकिन सरकार इसे नहीं मानने का हठ कर रही है। सौभाग्यवश भारत में मृत्यु दर अभी भी अपेक्षाकृत कम है। अन-लॉकडाउन के बाद कोरोना के मामले तेजी से बढ़े हैं लेकिन सरकारें इस स्थिति को काबू करने में असमर्थ दिख रही हैं। हम ईश्वर भरोसे की स्थिति की ओर बढ़ रहे हैं। विश्व की यह पहली और आखरी महामारी नहीं है। लेकिन निश्चित रूप से यह पहली महामारी है जो जीवन और जीविका दोनों के लिए भयंकर खतरा बन गई है। हमारे सामने तीन मुख्य चुनौतियां हैं- सेहत, आर्थिक एवं सामाजिक। ये चुनौतियां कितनी बड़ी होंगी, यह दो बातों पर निर्भर है। पहले कि आने वाले दिनों में कोरोना की स्थिति कितनी गंभीर होगी और दूसरी कब तक कोरोना पर काबू पाया जाता है। आज दोनों बातें अनिश्चित हैं।
सबसे बड़ी चुनौती सेहत की है। जान है तो जहान है। सरकार को सेहत और जीविका दोनों को बचाना है। कोरोना केवल स्वास्थ्य ही नहीं, बड़ा आर्थिक संकट बन गया है। दुनियाभर में करीब ढाई करोड़ नौकरियां खतरे में हैं। विश्व अर्थव्यवस्था डूबने के कगार पर है। अमीर और गरीब दोनों देशों की कमर इसने तोड़ कर रख दी है। ज्यादातर, देशी विदेशी कंपनियां लड़खड़ा रहीं है। भारत की अर्थव्यवस्था जो कोरोना के पहले से ही ढलान पर थी, उसे पटरी पर लाना एक आर्थिक युद्ध के समान चुनौती है। आज देशों की अर्थव्यवस्था चारों खाने चित्त है। कारोबार बंद हैं, कारखाने बंद हैं। राज्यों के खजाने खाली हो रहे हैं। कई राज्य जुलाई-अगस्त के बाद नौकरियां नहीं देने की स्थिति में पहुंच जाएंगे। यूं ही चलता रहा तो भारत के पिछले साल की कामयाबी खत्म हो जाएगी। लॉकडाउन के चलते 12 करोड़ नौकरियां चली गईं हैं, आगे भी आशंका है क्योंकि कोविड-19 का सबसे बुरा दौर अभी आना बाकी है। छोटी-बड़ी कंपनियां दिवालिया होने के कगार पर हैं।
आर्थिक चुनौतियां : अर्थव्यवस्था में सुधार मुख्यतः दो बातों पर निर्भर है। पहली बात, व्यक्तिगत मनोवैज्ञानिक स्थिति। क्या ग्राहक आमदनी के बावजूद और जरूरत पड़ने पर भी बाजार जाएगा? चीन में बड़े-बड़े मॉलों के खुलने के एक महीने बाद तक ग्राहक भय से नहीं आए। भाव में वृद्धि ग्राहक तय करेंगे। मांग ही अर्थव्यवस्था का चक्र चला पाएगी। दूसरी बात कि सरकार कितना रुपया लोगों की जेब में डालती है। सभी देशों ने सीधा धन दिया है, भारत उहापोह की स्थिति में है। सरकार साहूकार का काम कर रही है, सीधी राहत के बजाय कर्ज दे रही है। सरकार के पास पर्याप्त धन है 500 अरब डॉलर (36 लाख करोड़ रुपये) की विदेशी मुद्रा का रिजर्व और बैंकों के पास 5 लाख करोड़ नगदी है। लेकिन सरकार असमंजस में है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि धन का महत्व जीवन से ज्यादा नहीं हो सकता। जजों ने कहा है कि सरकार ब्याज पर ब्याज न लगाए। मध्यम वर्ग के सामने पहाड़ जैसा संकट खड़ा है। मजदूरों की स्थिति बद से बदतर है। सरकार ने 28 मार्च को आदेश दिया कि लॉकडाउन के 54 दिनों का पूरा वेतन मालिकों को मजदूरों को देना होगा। विरोध में मालिक उच्चतम न्यायालय पहुंच गए। सरकार को विवश होकर 18 मई को यह आदेश वापस लेना पड़ा। न्यायाधीशों ने कहा हम वेतन देने के लिए बाध्य नहीं कर सकते, मालिक-मजदूर आपस में तय कर लें। मजदूरों के पलायन के पीछे सरकार की असमर्थता और असफलता, मजदूरों के वेतन की गारंटी नहीं दे पाना, इसका एक मुख्य कारण बना।
एक तरफ जहां गरीब किसान-मजदूर-दिहाड़ी, निम्न वर्ग यहां तक कि निम्न मध्य वर्ग गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी से जूझ रहा है वहीं बड़ी तकलीफ होती है जब मध्यम और उच्च वर्ग के लोग पांच सितारा होटलों-क्लबों में मनचाहा खाना खाते हैं। एयर कंडीशंड घरों में बैठकर टीवी सेमिनारों में घोषित करने में कहते कि न तो भुखमरी है और ना ही नौकरियां गई हैं। यह हमारे देश की सभ्यता संस्कृति नहीं है हम मजदूरों की तनख्वाह रोकने की बात तो दूर, काटकर कम भी कर दें। जब सरकार 29 मार्च को कानून बनाती है कि 54 दिनों का पूरा वेतन देना होगा इसी सभ्यता के लोग कानून के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में मामला दायर करते हैं असहाय सरकार दबाव में 18 मई को इस कानून को वापस ले लेती है।
बेहतर मानवीय दुनिया और समझ : कोरोना हमारे सामाजिक व्यवहार एवं सोच में एक बड़ा परिवर्तन और सुधार ला सकता है- हालांकि अधिक संभावना है कि हम सुधरेंगे नहीं। मृत्यु सब के दिलो-दिमाग पर छायी हुई है जिसने एक श्मशानी वैराग्य की मनोस्थिति को जन्म दिया है। नास्तिकों में भी धर्म के प्रति आस्था जगती दिख रही है। आज का हिंदुस्तान अपने दादा दादी के पुराने भारत को पुनः खोज रहा है, जो वैश्वीकरण, औद्योगिकरण और आधुनिकीकरण के जंगल में खो गया है। एक सोच पनप रही है कि केवल खान-पान, रिश्ते व्यवहार में ही नहीं विकास के मॉडल और जीवन शैली में भी बड़ा परिवर्तन करना होगा।
विशेषकर, युवा वर्ग से उम्मीद है कि जो अपनी संस्कृति-सभ्यता से विमुख हो रहा है अपनी जड़ों की ओर लौटेगा। संक्रमण के बादल छंटने के बाद एक ज्यादा बेहतर, ज्यादा मानवीय और सामाजिक अर्थव्यवस्था बनकर उभरेगी। सामाजिक न्याय एवं सामाजिक साम्य को प्राथमिकता मिलेगी। पाश्चात्य प्रभाव कम होगा। फिजूलखर्ची और दिखावा कम होगा। प्रकृति और वातावरण के प्रति नजरिया बदलेगा। आर्थिक संभावनाओं से बढ़कर सामाजिक संभावना हमारे देश को एक बेहतर राष्ट्र बनाएंगे। यह व्यापक सच्चाई है कि विश्व इतिहास में किसी भी दौर की अपेक्षा आज न्याय, समानता, अमन- शांति और पर्यावरण रक्षा को मानव जाति ने नकारा है और आज उसी की सजा के रूप में अस्तित्व के संकट की लड़ाई लड़ रहा है।

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