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कोरोना की आंधी झेलने को हम कितने तैयार- प्रेम शंकर

विशेष संपादकीय

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लॉकडाउन में दूसरे प्रदेशों में फंसे बिहारी मजदूरों और छात्रों की घर वापसी शुरू हो गयी है। अभी पहली खेप करीब 1200 लोगों को लेकर जयपुर से दानापुर ट्रेन पहुंची और दूसरी खेप केरल से दो ट्रेनें बिहार पहुंची हैं। कोटा से भी छात्रों के आने का क्रम एक-दो दिन में शुरू होगा। अभी भले ही तीन-चार रेलगाड़ियां पहुंचीं हैं, परंतु सैकड़ों ट्रेनें अभी आनी है। लाखों लोगों को आना बाकी है। यह बात अलग है कि सबका मेडिकल चेकअप और अन्य आवश्यक कार्रवाई के बाद ही गांव और घर में प्रवेश करने दिए जाने का दावा किया जा रहा है, लेकिन लंबे समय तक हर पल खतरा बना रहेगा। इसका ताजा उदाहरण पंजाब लौटे महाराष्ट्र के नांदेड़ गुरुद्वारा में फंसे श्रद्धालुओं में से करीब डेढ़ सौ लोगों में कोरोना संक्रमण पाए जाने का मामला है। पंजाब के स्वास्थ्य मंत्री ने महाराष्ट्र सरकार पर भेजने से पहले टेस्ट नहीं कराये जाने का आरोप लगाया है। चूक किसी की हो खामियाजा तो भुगतना ही होगा। जब बड़ी संख्या में लोगों के आने का क्रम रफ़्तार पकड़ेगा, तब पंजाब की घटना की यदि कुछ और राज्यों में पुनरावृति होती है, तो बड़ा खतरा हो सकता है। छूट में प्रशासनिक तैयारी का एक उदाहरण लॉकडाउन-3 के पहले दिन कई शहरों में देखने को मिला। शराब की दुकानों पर लॉकडाउन का मूलमंत्र सोशल डिस्टेंस की लोगों ने धज्जियाँ उड़ा दी। जब दुकानों पर सैकड़ों की संख्या में जुटे लोगों से नियम का अनुपालन कराने में सरकारी तंत्र विफल होता दिख रहा है। तब बड़ा सवाल है कि लाखों की संख्या में घर वापसी को निकले जत्थे से उत्त्पन्न संभावित खतरे से निबटने में देश की राज्य सरकारें कितना तैयार हैं?

देश के अन्य राज्यों की तुलना में बिहार में कोरोना नियंत्रण में कहा जा सकता है। एक ओर जहां लगातार मरीज मिल रहे हैं, तो लगभग संक्रमितों में से एक चैथाई लोगों ने अब तक कोरोना पर विजय प्राप्त किया है। लेकिन खतरे की आशंका अब बढ़ी है। बताया जा रहा है कि मजदूरों की सिर्फ थर्मल स्कैनिंग हो रही है, कोरोना टेस्ट नहीं हो रहा है। ऐसी हालत में देशभर में लगभग 4 करोड़ों मजदूर अपने-अपने प्रदेशों में लौटेंगे। बहुत से मजदूरों के पास स्मार्टफोन नहीं होते हैं। नार्मल फोन होता है जिसमें आरोग्य सेतु एप इंस्टॉल नहीं किया जा सकता। सवाल है कि जिसके पास स्मार्ट फोन है भी तो सभी ऐसे नहीं हैं कि एप डाउनलोड कर सकें, दूसरे अगर स्मार्टफोन है और पैसे खत्म हो जाने की वजह से नेट पैक रिचार्ज नहीं करा पा रहे हैं तो ऐसी स्थिति में आरोग्य सेतु एप से मॉनिटरिंग कितना कारगर होगा? मजदूर बाहर से लौटने के बाद पंचायत स्तर, ब्लॉक स्तर के क्वॉरंटाइन सेंटर में चले जाते हैं तो वहां पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक होगी कि वह वहां से निकलकर गांव में जाकर अपने परिवार या किसी से न मिलें। बहुत जगह से ऐसी भी खबरें आई हैं दिन में लोग क्वॉरंटाइन सेंटर में रहते थे देर रात घर भाग जाते थे और सुबह फिर पहुंच जाते थे।

अभी रोज इक्का-दुक्का ट्रेनें ही आ रही हैं इसलिए उनको उनके जिले के क्वॉरेंटाइन सेंटर तक पहुंचाने का इंतजाम हो जा रहा है, लेकिन जब बहुतायत में लोग आएंगे तो यह प्रक्रिया लम्बी चलने वाली है। क्योंकि बिहार में 2700000 और झारखंड में 400000 मजदूर बाहर है जो कि घर आना चाह रहे हैं। मजदूरों की बड़ी संख्या देखते हुए बंगाल सरकार ने भेजने से मना कर दिया है। छात्रों को लेने जाने वाली बसों को भी बंगाल में इंट्री नहीं हो पाई है। अभी तक बंगाल सरकार के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि हम अभी अपने हाथ कोरोना से लड़ रहे हैं, हमारे पास मैन पावर नहीं है कि केंद्र के गाइडलाइन के अनुसार छात्रों मजदूरों को एक जगह जमा कर उनको बस या ट्रेन में टेस्टिंग करा करके भेजा जा सके।

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केंद्र सरकार की गाइडलाइन के अनुसार राज्य सरकारों को घर जाने को इच्छुक लोगों को एकत्रित करने, उनकी स्वास्थ्य जांच कराकर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए ट्रेन या बसों में बैठा कर विदा करना है। कोई भी राज्य सरकार पहले अपने नागरिकों की सुरक्षा की व्यवस्था करेगी फिर बाहर जाने वाले लोगों को ध्यान देगी। आप्रवासियों की संख्या ज्यादा होने की वजह से इसमें बहुत ज्यादा पुलिस फोर्स व अधिकारी लगेंगे जिससे ममता सरकार हाथ खड़े कर रही है। ऐसी स्थिति अन्य राज्य सरकारों की भी हो सकती है, पर उन्होंने रोक नहीं लगाई है। महाराष्ट्र से लोगों के लौटने के बाद की पंजाब की स्थिति की अन्य राज्यों में पुनरावृत्ति नहीं होगी, यह दावा नहीं किया जा सकता है। 4 करोड़ मजदूरों को इधर से उधर देशभर में जाना है। ऐसी स्थिति में बड़ी संख्या में टेस्ट और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कराना असंभव नहीं तो कठिन कार्य है।

झारखंड गवर्नमेंट में लगभग सभी तरह के भुगतान को रोक दिया गया है। सिर्फ कोरोना पर खर्च हो रहा है। कमोबेश यही स्थिति अन्य राज्य की सरकारों के साथ भी है। इतनी बड़ी संख्या में मजदूरों को लाना, उनको खिलाना, 21 दिन तक क्वारंटाइन में रखना और उसके बाद मजदूरों को काम देना, बहुत बड़े खर्चे के साथ साथ बड़ी व्यवस्था में सरकार को पूरा तंत्र लगाना होगा। बिहार का आधा हिस्सा बाढ़ की चपेट में आ जाता है। मई महीने में बारिश चालू हो जाती है अगले 6 महीने तक प्रशासन सिर्फ इसी कार्यों में लगा रहेगा। इसका दूसरा सबसे बड़ा निगेटिव इंपैक्ट यह होने वाला है कि मजदूर जहां-जहां काम करते थे, वह इंडस्ट्री, कंस्ट्रक्शन या संस्थान बिन मजदूर कैसे चलेंगे? पूरे देश में अर्थव्यवस्था पर कितना भारी असर होगा इसका अनुमान लगाना मुश्किल है। स्थिति ठीक रही तो अगले 2-3 महीने के बाद देश को चलाने के लिए सारी इंडस्ट्री सभी जगह से मजदूरों को ले जाने की भीड़ होगी, क्योंकि इनके बिना काम नहीं चलेगा। मजदूरों को अगर काम पर वापस नहीं भेजा गया तो देश की इकोनॉमी को बड़ा नुकसान होगा। इंडस्ट्री और सारे काम चालू नहीं हुए तो देश नहीं चल सकता है। अभी सभी राज्य सरकारें मजदूरों को वापस लाकर जनता को खुश कर तुष्टीकरण की राजनीति में जुटी हुई हैं, जो कि भविष्य के लिए सही नहीं है। आखिर उन मजदूरों को कब तक बिठाकर खिला सकते हैं। उनको रोजगार तो देना ही पड़ेगा। सबसे बड़ी और अच्छी बात होती कि उनको भरोसे में लेकर जहां थे वहीं पर उनको हर तरह सुविधा दी जाती और किसी के साथ बहुत ज्यादा प्रॉब्लम जैसे मां-बाप बीमार हों, या कोई पारिवारिक प्रॉब्लम है तो उनको लाया जाता किसी को रोका नहीं जाता। अभी सबको लग रहा है घर नहीं जाएंगे तो हम यहीं रह जाएंगे, इसलिए भागमभाग की स्थिति है। इसे संभालने की जरूरत और जागरूक करने की जरूरत है। केंद्र सरकार ने जो ऑरेंज और ग्रीन जोन के लिए छूट दिया है उसे सभी राज्य सरकारों को लागू करना चाहिए, ताकि घर में बंद आम जनता भी सावधानीपूर्वक घरों से निकल सके और उनके मन में व्याप्त भय भी खत्म हो।

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