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क्रय शक्ति बढ़ा आर्थिकी संवारने की कोशिश

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कोविड-19 के असर से पैदा हुए अभूतपूर्व आर्थिक संकट से निपटने के सिलसिले में सरकार द्वारा दिए गए राहत पैकेज का दोहरा मंत्र यही है : पहला, मानव जीवन की हानि कम से कम होने दी जाए, खासकर उन लोगों की जो समाज के सबसे निम्नतम स्तर पर हैं। दूसरा है इस संकट की घड़ी को साहसिक ढांचागत सुधार लागू करते हुए संभावना में बदला जा सके। ऐसे सुधार करना जो उत्पादक क्षमता को पहुंची हानि की भरपाई करने के फौरी कदमों से परे जाकर अर्थव्यवस्था की समग्र आपूर्ति क्षमता को बढ़ा सके। पिछले कुछ दिनों से वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने जिन राहत उपायों की घोषणा की है वे सावधानीपूर्वक तैयार किये गये काफी संतुलित तथापि साहसिक हैं और आने वाले दिनों में उपरोक्त वर्णित दोनों ध्येयों को पूरा कर दिखाएंगे।
हर कोई मानता है कि मौजूदा संकट 90 के दशक में आया एशियाई वित्तीय संकट और 2008-09 की वैश्विक मंदी, दोनों से कहीं ज्यादा बड़ा है, हालांकि तब भी आर्थिकी की मांग एवं आपूर्ति पक्ष पर बहुत ज्यादा असर हुआ था। विगत के दोनों संकटों की तरह मौजूदा संकट के दृष्टिगत भी सरकार ने अपनी प्रतिक्रिया में वर्तमान समस्या से सही ढंग से निपटने के उपाय किए हैं। आपूर्ति अवयव को सुचारु करने में सरकार की प्रतिक्रिया चार-परत वाली है।
पहली, खाद्य सुरक्षा और किसानों की आमदनी पर ज्यादा असर न होने पाए, इसलिए सरकार ने लॉकडाउन लागू करते ही कृषि और इससे संबंधित गतिविधियों को तुरंत आवश्यक सेवा घोषित कर दिया था। इससे देश के बहुत महत्व रखने वाली रबी की फसल की कटाई सफलतापूर्वक हो पाई है। इसका अर्थ है देश के किसानों के हाथ में 78000 करोड़ की क्रय शक्ति बनी है।
दूसरा उपाय है व्यापारियों-उद्योगपतियों के पास नकदी की कमी को दूर करना ताकि कहीं दिवालियापन की स्थिति न बन जाए। इसके लिए व्यावसायिक बैंकों से लिए गए कर्ज की किस्तें और ब्याज उगाही पर कुछ महीनों की रोक का ऐलान किया गया है। इससे सूक्ष्म-लघु-मध्यम उद्योगों को विशेष रूप से बल मिलेगा, इनको अतिरिक्त उधार-सीमा बनाने के लिए बिना नई जमानत दिए धन मिल पाए, इसके लिए 3 खरब रुपये का प्रावधान किया गया है। मंत्री द्वारा घोषित किए गए 50,000 करोड़ रुपयों के फंड से सूक्ष्म-लघु एवं मध्यम उद्योग वित्त नई इक्विटी प्राप्त कर सकते हैं, साथ ही सब्सिडी वाले उधार की सुविधा भी ले सकते हैं। इन उपायों से बहुत बड़ी संख्या में व्यापारियों, खासकर सेवा क्षेत्र जैसे कि होटल, मनोरंजन, खुदरा क्षेत्र इत्यादि को काफी राहत मिलेगी।
राज्यों को बिजली आपूर्ति करने वाली कंपनियों के लिए 90000 करोड़ का उधार पैकेज अलग से दिया गया है ताकि राज्यों को बिजली सेवा प्रदाता और उत्पादकों को दिवालिया होने से बचाया जा सके, अन्यथा नतीजे बहुत हानिकारक हो सकते थे।
राहत उपायों के तीसरे पक्ष में निजी उत्पादकों के लिए आर्थिकतंत्र में काफी सुधार किया है, फिर चाहे वे कृषि क्षेत्र से हों या निर्माण उद्योग में। किसानों के लिए काफी समय से लंबित पड़े सुधार घोषित कर दिए गए हैं, इसके अंतर्गत वे अपनी पसंद का फसल खरीदार अथवा कोई कृषि उत्पाद निर्यातक खुद तय कर सकते हैं, ताकि जरूरी भंडारण बन सके। आज से पहले जिन क्षेत्रों में सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का एकछत्र राज या फिर दबदबा था, इसकी बजाय निजी व्यापारियों के लिए जगह बनाई गयी है।
अंत में चौथा राहत उपाय वह है, जिसकी भले ही वित्तीय छाप बहुत बड़ी न हो, लेकिन यह देशभर के 50 लाख से ज्यादा परिवारों, रेहड़ी-फड़ी वालों की रोजी-रोटी पर असरअंदाज है और वह है इनमें प्रत्येक को अपना स्टॉक और कामकाजी रकम फिर से बनाने के लिए 10,000 रुपये का गैर-जमानती ऋण देना।
इसलिए यह पैकेज मौजूदा उत्पादक क्षमता को बचाए रखने की गारंटी देता है और घरेलू एवं विदेशी कंपनियों की निजी क्षेत्र में भागीदारी बनाने हेतु बेहतर जमीन मुहैया करवाता है। आर्थिकी में गिरती बाजार मांग को उठाने के लिए अनेकानेक उपाय घोषित किए गए हैं। खपत, निवेश और वस्तुओं की मांग से मिलकर कुल बाजार मांग बनती है। यहां इस पहलू पर उन्हें गौर करना होगा जो यह समझते हैं कि ग्राहक के हाथ में वास्तविक नकदी ही आर्थिकी में गिरती मांग को ऊपर उठाने का जरिया होता है। इसलिए सूक्ष्म-लघु-मध्यम उद्योग और काम-धंधे हों या किसान (जिनके लिए केसीसी योजना के तहत 2 खरब रुपये का प्रावधान रखा गया है) इनको मिली अतिरिक्त उधार सीमा मिलकर संयुक्त बाजार मांग को मजबूत बनाएंगे।
सीधी खपत को बढ़ाने के लिए भी काफी उपाय घोषित किए गए हैं। इनमें 1.73 लाख करोड़ का प्रावधान (यह पैकेज पहले घोषित किया जा चुका है) समाज के सबसे निचले स्तर पर बैठे लोगों की आमदनी और भलाई को सुधारने के लिए किया गया है। इसमें 20 करोड़ जनधन खाताधारक महिलाएं भी आती हैं, जिनके बैंक खाते में सीधा धन जाएगा। जिन लोगों का टीडीएस और टीसीएस कटता है उनके लिए इसमें 25 फीसदी की छूट देने से हाथ में 50,000 रुपये का अतिरिक्त धन आ सकेगा। मनरेगा योजना के लिए अलग से 40000 करोड़ रखे गए हैं ताकि शहरों से गांव वापस पहुंचे लोगों को ग्रामीण क्षेत्र में काम और राहत मिल सके। भवन निर्माण मजदूरों के लिए 30,000 करोड़ रखे हैं, वहीं 12 करोड़ किसानों के खाते में 17,800 करोड़ रुपये भेजे जा चुके हैं। राज्य सरकारों के कोरोना के लिए क्वारंटाइन होम और प्रवासी मजदूरों के लिए पनाहगाहें बनाने के लिए 13,000 करोड़ रुपये दिए जाएंगे।
इन तमाम उपायों से विभिन्न श्रेणी के लोगों को मिलने वाले सीधे धन से गिरती बाजार मांग ऊपर उठेगी और यह कारक वह है जो आर्थिक गतिविधियों को तेजी से दुबारा सही हालत में लाने के लिए सहायक होता है।
जैसा कि वित्तमंत्री ने विशेष जोर देकर कहा है कि 20 लाख करोड़ का राहत पैकेज 12 मई को प्रधानमंत्री के भाषण में किए वादे से ज्यादा रकम का है। यह रकम हमारे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 10 प्रतिशत से अधिक है और दुनिया के बाकी विकासशील देशों द्वारा घोषित किए गए पैकेज से इसकी तुलना की जा सकती है। साहसिक ढांचागत सुधार उपायों के साथ जोड़कर दिया गया राहत पैकेज जहां एक ओर भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने लायक बनाएगा, वहीं हमारे त्रस्त पड़े किसानों को काफी समय से लंबित आर्थिक आजादी, लचीलापन और वित्तीय संबल मुहैया करवाएगा। यह पैकेज कोरोना काल के बाद भारत की आर्थिकी को फिर से पटरी पर लाने का मौका देता है।

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