सन्मार्ग लाइव
सनसनी नहीं, सटीक खबर

गांवों में अनुपयोगी न हो जाएं प्रवासी श्रमिक

- Sponsored -

पूरी दुनिया में चाइनीज वायरस कोरोना के कहर के बीच देशभर से प्रवासी मजदूर किसी भी तरह अपने घर लौट रहे हैं। एक अनुमान है कि लगभग ढाई करोड़ मजदूर लौटेंगे। भारत के गांव ज्यादातर खेती पर निर्भर हैं, इसलिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था पहले से ही कई तरह के बोझ से लदी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आत्मनिर्भर भारत का नारा दिया। यह आदर्श तो बड़ा अच्छा है और बेशक मोदी जी का प्रयास होगा कि इस दिशा में आगे बढ़ा जाए लेकिन कैसे, साधन क्या हैं? भारतीय गांव कृषि पर निर्भर हैं और यह निर्भरता इतनी ज्यादा है कि शायद दूसरी दिशा में अभी तक नहीं देखा गया। अभी भी गांव में जो सरकारी कार्यक्रम चल रहे हैं उनमें कृषि प्रमुख है या वही कार्य हैं जो कृषि से जुड़े हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम से आरंभ करो माइक्रो,लघु और मध्यम दर्जे के उद्यम भारतीय अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में सहयोगी तो हो सकते हैं लेकिन घर लौटने वाले मजदूरों की समस्याओं को हल करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। यद्यपि, कितने लोग अपने गांव को लौटेंगे, इसका कोई सटीक आंकड़ा नहीं है। जनगणना 2011 आंकड़े बताते हैं कि लगभग 1.78 करोड़ लोग मजदूरी के लिए अपने गांवों से अन्य स्थानों पर गए। लेकिन उन्हीं आंकड़ों से पता चलता है कि 2001 से 2011 तक लगभग 2.3 करोड़ लोग अपने-अपने गांवों से शहरों की ओर गए हैं और लॉकडाउन को देखते हुए इस संख्या के लौटने की उम्मीद है। गांवों में ज्यादा आबादी गुप्त बेरोजगारी को जन्म देती है। भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था लगभग भारत की 70% आबादी को पालती है। सरकार के ताजा देवर सर्वे के मुताबिक इससे ग्रामीण क्षेत्रों में स्तरहीन जीवन जीने के लिए लोग मजबूर हैं। 2015-16 में ग्रामीण प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 40,928 रुपए थी जबकि उसी अवधि में शहरी क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 98,435 रुपए हुआ करती थी। ग्रामीण भारत में प्रति व्यक्ति ही उत्पादन शीलता कम होती है। भारत की समग्र कार्य शक्ति लगभग 71% ग्रामीण अर्थव्यवस्था में लगी है, लेकिन अर्थव्यवस्था में इसका योगदान महज 48% है। ग्रामीण कार्य शक्ति उत्पादन क्षमता शहरी वर्क फोर्स से कम है। गांव में ज्यादा पूंजी और तकनीक से श्रमिक उत्पादन शीलता को बढ़ावा मिले लेकिन इसके बाद भी श्रमिक उत्पादन क्षमता पिछले वर्षों में घटी है। 1970-71 में उत्पादन शीलता का अंतर 12% से कम था जो 2017-18 बढ़कर 13% से ऊपर चला गया। ऐसी स्थिति में ग्रामीण अर्थव्यवस्था गांव में लौटने वाले श्रमिकों को रोजगार नहीं दे सकती। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी कमी है कि वह खेती पर बहुत ज्यादा निर्भर है और खेती के अलावा कोई ऐसा साधन नहीं है जिसमें इतनी बड़ी आबादी को रोजगार दिया जा सके क्योंकि गांवों में कार्यों की विविधता अभाव का है। साधारणतया भारतीय मजदूरों को ज्यादा काम एमएसएमई सहित उत्पादन क्षेत्र से प्राप्त होता है। अब जबकि ये मजदूर लौट रहे हैं अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ेगा। श्रमिक सर्वे बताते हैं कि 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चे बड़े-बुजुर्गों पर निर्भर हैं। अधिकांश मजदूर सामाजिक सुरक्षा स्कीमों से भी वंचित हैं। जिनराज्यों से ज्यादा मजदूर बाहर जाते हैं उन राज्यों में उतनी ही ज्यादा बेकारी होती है। अब ये मजदूर जब अपने राज्यों में लौटेंगे तो उम्हें काम देना बड़ा कठिन हो जाएगा। इस स्थिति के मद्देनजर बिहार, उत्तर प्रदेश से सबसे ज्यादा मजदूर अन्य राज्यों में काम के लिए गए हैं और जब लौटेंगे और जब हालात सामान्य हो जाएंगे तो उन्हें रोजगार के लिए दर-दर भटकना पड़ेगा। हमारे देश में पहले भी मौसमी बेरोजगारी थी। यदि किसी विशेष मौसम में बेरोजगार श्रमिक को सहायक व्यवसाय में काम मिल भी जाता था, तब भी वह बेरोजगार बने रहे थे। अस्पष्ट ग्रामीण क्षेत्रों में मौसमी बेरोजगारी और प्रच्छन्न बेरोजगारी दोनों ही कायम हैं। लेकिन अभी जो अफरा-तफरी दिख रही है, उसमें केवल सरकार दोषी नहीं है। महामारी अगर अचानक आ जाती है तो अफरा-तफरी हो ही जाती है। कुछ लोग सरकार को दोषी बता रहे हैं,सरकारों के दोष बता रहे हैं,लेकिन वे जमीनी सच्चाई को नजरअंदाज कर रहे हैं। अगर आपदा ऐसी भयानक है तो नेक नियति से भरा हुआ नेता भी कुछ नहीं कर सकता। ऐसे में नेता को गलत कहना और दोषी करार देना, खुद में गलत है। बेकारी बढ़ेगी यह तय है। आने वाले वक्त में किताबों में दर्ज होगा कि 2020 में भारत कई मोर्चों पर जूझ रहा था और इसे परास्त करने के लिए जो कदम उठाए गए वह पर्याप्त नहीं थे। हालात स्वरूप बदल कर हमारे सामने आए हैं।
हमें इससे पार पाना है तो केवल सरकार का मुंह ताकना बंद करना पड़ेगा। कितने ही कुटीर उद्योग हैं, जो घर-घर में शुरू हो सकते हैं, भले उनमें मुनाफा लाखों की बजाय केवल हजारों रुपये में हो, लेकिन कम से कम पलायन की नौबत तो न आए। हर युवा को यही सोचकर भविष्य गढ़ना होगा।

- Sponsored -

- Sponsored -

- Sponsored

- Sponsored -