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चीनी हमले के परिप्रेक्ष्य में मोदी का संबोधन

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गलवान घाटी में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के हमले के बाद ऐसा लगने लगा है कि दशकों की शांति अब समाप्त हो गयी। वस्तुतः चीन के साथ भारत के समझौते ऐसे हैं, जिनमें वह भारत को प्रतिक्रियात्मक स्थिति में उलझा देता है। ऐसा लगता है कि मोर्चाबंदी के दौरान चीन के उकसावे तथा गलत सूचनाओं के जंजाल में भारत हमेशा फंस जाता है। इसमें सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण और चिंताजनक है कि किस सिद्धांत के तौर पर भारत और चीन के बीच समझौता हुआ, जिसके तहत वास्तविक नियंत्रण रेखा से 2 किलोमीटर के दायरे में किसी प्रकार के हथियार का उपयोग नहीं करना है? भारत और चीन के लिए सीमा की अवधारणा अलग-अलग है, उसी तरह हथियारों की भी अवधारणा पृथक है। इन सारी स्थितियों में सबसे बड़ी बात यह है कि चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा के निर्धारण के प्रति पुनः अनिच्छा जताई है ताकि भारत का संतुलन बिगड़ता रहे। यहां तक कि उसने इस मामले में इसके पहले कभी बातचीत भी नहीं की है। नतीजा यह हुआ है कि दशकों से सीमा विवाद जारी है और हम उसे शांति समझते रहे हैं और अपनी सीमा के प्रति लापरवाह रहे हैं। यह पहला अवसर है कि प्रधानमंत्री अग्रिम मोर्चे पर खुद गए और हाल की झड़प में घायल सैनिकों से अस्पताल में जाकर मुलाकात की। बेशक इससे हमारे सैनिकों का मनोबल बढ़ेगा। भारत का सैनिक इतिहास देखें तो सीमा की स्थिति का पता चलेगा। सन 1962 के युद्ध के एक साल के बाद चीन ने सिक्किम में सीमा पर निर्माण कार्य शुरू किया। क्योंकि काम चीन की तरफ हो रहा था इसलिए भारत ने कुछ किया नहीं। इसके बाद भारत सन 1965 के पाकिस्तान युद्ध से उबरा ही था कि 1967 में नाथूला में भारतीय सीमा में घुसकर चीन ने अचानक हमला कर दिया। हालांकि महीनों की मोर्चाबंदी और हाथापाई के बाद सीमा पर कटीले तारों की बाड़ लगा दी गयी ताकि आमने-सामने की मुठभेड़ नहीं हो सके। खंभे गाड़े जाने लगे तभी चीन की ओर से चेतावनी आने लगी। भारतीय सेना अपनी सीमा के भीतर थी और बिल्कुल खुले में थी। वहां चीनी सैनिक भी पहुंच गए और बाड़ लगाने का काम रोकने की कोशिश करने लगे। अचानक चीन की तरफ से फायरिंग शुरू हो गयी।भारतीय सेना के कमांडर लेफ्टिनेंट कर्नल रायसिंह के सीने में गोलियां लगीं लेकिन वह तब तक नहीं गिरे जब तक उन्होंने उस चीनी अधिकारी का खात्मा नहीं कर दिया, जिसने उनको चेतावनी दी थी और फिर उन्होंने उसकी मशीनगन भी छीन ली। कर्नल राय सिंह उस हमले से बच गए। चीन को अपनी सेना के लोगों के मरने की परवाह नहीं। पांच घंटे तक युद्ध चला और 80 भारतीय सैनिक शहीद हुए तथा 300 चीनी सैनिक मारे गए लेकिन भारत की सेना ने नाथूला को नहीं जाने दिया। यह 9 सितंबर 1967 की घटना है। इसी के कुछ दिन बाद 1 अक्टूबर को फिर मामला उस समय गरम हो गया, जब चीनियों ने समीप के ही चो ला पर कब्जा कर लिया और भारतीय सैनिकों से हाथापाई के दौरान एक चीनी सैनिक ने एक भारतीय जवान को संगीनों से घायल कर दिया। वहां तैनात गोरखा ब्रिगेड के जवान आग बबूला हो गए और खुखरी से चीनियों पर हमला कर दिया। चीनी भाग खड़े हुए। भारतीय सैनिकों ने उस स्थान को फिर से अपने कब्जे में ले लिया। वास्तविक नियंत्रण रेखा कायम रही। सन 1967 की घटना के समय पूर्वी कमान जनरल मानेक शॉ के हाथों में थी और वे प्रमुख भूमिका निभा रहे थे। वहां उन्होंने लोगों के सवाल के जवाब में कहा कि मैं अब बताऊंगा कि उनसे कैसे निपटा जाएगा। मानेक शॉ की बात सुनकर चीनी हतप्रभ रह गए और जब उन्होंने देखा कि वहां भारत की अतिरिक्त फौज भेजी जा रही है तो वे समझ गए कि मामला गड़बड़ होगा। उन्होंने सिक्किम का नाथू ला खाली कर दिया। नाथू ला और गलवान की मोर्चाबंदी में एक बात समान है कि चीनी वहां लगातार गश्त कर रहे हैं और भारतीय सैनिकों को धमका रहे हैं ताकि भारतीय फौज के जवान डर जाएं लेकिन ऐसा नहीं होगा। उन्होंने भी जैसे को तैसा करना शुरू कर दिया है। हमारे सैनिकों ने गलवान में जो वीरता दिखाई, वह तारीफ के काबिल है। भारत के सैनिक इतिहास में इस घटना का जिक्र स्वर्ण अक्षरों में किया जाएगा। अब जरूरी है कि हमारे नेता कुछ करें और इसी के तहत प्रधानमंत्री ने पहला कदम उठाया है। इसके बाद जरूरी है कि सुरक्षा संबंधी विदेश नीति में बदलाव किया जाए। अब हमें 70 साल पुरानी नीति को त्यागना होगा। इस नीति को वीरता पर आधारित तैयार करनी होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लद्दाख जाने के बाद इस दिशा में परिवर्तन साफ दिखाई पड़ रहा है। भारतीय सेना ने लड़ाकू विमानों, हेलीकॉप्टरों तथा अन्य परिवहन बेड़ों की तैनाती बढ़ानी शुरू कर दी है।
वायु सेना ने भारत की सैन्य तैयारियों को और मजबूत करने के लिए कई अग्रिम मोर्चे तक भारी सैन्य उपकरण और हथियार पहुंचाने के लिए सी-17 और सी-130 जे सुपर हर्कुलस के बेड़े को भी लगाया है। एक तरफ सैनिक तैयारियां चल रहीं हैं और दूसरी तरफ कूटनीतिक एवं राजनीतिक हवा भी गर्म की जा रही है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में साफ कहा कि उदारवाद का जमाना गया तथा विकास का जमाना है। हालांकि उन्होंने चीन का नाम नहीं लिया लेकिन यदि गुंजाइश नहीं छोड़ी है कि कयास लगाया जा सके कि निशाना किस ओर है। इसके बाद उन्होंने खुलकर कहा कि हमें मालूम है, इसके खतरे क्या हैं? प्रधानमंत्री ने कहा कि शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीन के विस्तारवादी इरादों को सारी दुनिया समझ चुकी है और अब चीन नया सिरदर्द बन गया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि लद्दाख तो चीन के लिए छोटा सा मामला है। बड़ा मामला तो 83,000 वर्ग किलोमीटर वाला अरुणाचल प्रदेश है और अगर वह सोच रहा है कि अरुणाचल को कब्जे में लेगा तो 21वीं सदी में ऐसी बातें सोचने का मतलब है कि आपको अपने दिमाग का इलाज कराने की जरूरत है। जबरन कब्जा कभी नहीं किया जा सकता। उनकी सलाह से चीन चौंक गया। लेकिन मोदी की इस बात से देश की सेना और देश की जनता का मनोबल बढ़ा है। बढ़े हुए मनोबल से तो कुछ भी किया जा सकता है। आजादी के बाद किसी प्रधानमंत्री ने इतने सख्त शब्दों में चीन को नहीं चेताया।

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