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चीन का चोर कबूलनामा

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पिछले दिनों जब मोदीजी ने लद्दाख की चोटी से अपने सैनिकों के माध्यम से दुनिया को यह संदेश दिया कि अब विस्तारवाद का नहीं विकासवाद का समय है, तो पूरी दुनिया ने मोदीजी की बात को अपना मौन समर्थन दिया, फड़फड़ाया और दर्द से चीत्कारा तो सिर्फ एक देश, वह था चीन। आश्चर्य की बात यह थी कि मोदीजी ने अपने सैनिकों को दिए संदेश में विस्तारवाद की आलोचना करते हुए विस्तारवादी सोच तथा कुकृत्यों से संक्रमित ताकतों के मिटने और सिमटने की बात कहते हुए एक बार भी चीन का नाम नहीं लिया, पर चीन ने उनके विस्तारवाद को ना सिर्फ खुद से जोड़ा बल्कि आनन-फानन में अपने बचाव में त्वरित प्रतिक्रिया भी दे दी। पुरानी कहावत है चोर की दाढ़ी में तिनका, जिसे फिलहाल इस वाकये के बाद हम यूं भी कह सकते हैं-चोर चीन की दाढ़ी में तिनका। ऐसा इसलिए क्योंकि अपने देश में अपने सैनिकों को दिए संदेश पर चीन का बौखलाना और फिर बौखलाहट में त्वरित प्रतिक्रिया देना, स्पष्ट रूप से उसका दोषी के रूप में अपने लिए सफाई देना ही कहा जाएगा। उसकी प्रतिक्रिया ने यह सिद्ध कर दिया कि वह मोदीजी की विस्तारवाद वाली बात से चिढ़ा और यह चिढ़ इतनी ज्यादा थी कि उस पर उसने त्वरित प्रतिक्रिया के साथ यह सफाई भी दे डाली कि चीन विस्तारवादी नहीं है। उसके अपने पड़ोसी चौदह देशों के साथ सीमा विवाद हैं, जिनमें बारह देशों के साथ उसने विवाद सुलझा लिए हैं। चीन की बौखलाहट और जल्दबाजी में बिना मांगी दी गई सफाई यह सिद्ध करने के लिए काफी है कि वह विस्तारवादी है। चीन दुनिया का इकलौता ऐसा देश है जिसके इतने सारे देशों से सीमा विवाद हैं। चीन ने प्रतिक्रिया देते हुए आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया है कि उसके चौदह देशों से सीमा विवाद हैं, वह भी अपने आप में बेहद महत्वपूर्ण होने के साथ उसके विस्तारवादी होने की स्वीकारोक्ति ही है। अपने इस वक्तव्य में उसने जिन चौदह देशों के साथ सीमा विवाद का जिक्र किया है, उनमें से कुछ को तो वह अपना क्षेत्र बता उन पर जबरन अधिकार कर चुका है उन्हें अपना हिस्सा मानता है । ताकत के बूते उनका शोषण दोहन करता है। वहां की जनता पर घोर अत्याचार करता है। वहां के लोगों के मानवीय स्वतंत्रता के अधिकारों को कुचलता है। सच तो आखिर सच ही होता है, जो झूठे के मुंह से भी निकल ही आता है। चीन के मुंह से भी निकल चुका है। अब दुनिया को चीन से यह पूछने की जरूरत है कि आखिर उसने किन चौदह देशों का जिक्र किया है और वे देश हैं तो फिर उन पर उसका अधिकार कैसे? यह अधिकार गलत है। इसे सुधारने की जरूरत है। वह सुधारे या फिर मानवता और दुनिया के हित और सुरक्षा के लिए दुनिया को ही ऐसा करना पड़ेगा और यह उसकी विवशता होगी। वास्तव में चीन की विस्तारवादी नीति और महाशक्ति बनने की उसकी भूख ने मानवता की रक्षा और उसकी वैश्विक शांति जैसी बेहद महत्वपूर्ण जिम्मेवारी से उसे कोसों दूर कर दिया है। जिसकी शुरुआत वह बहुत पहले कर चुका था। अब तो अपने द्वारा प्रायोजित कोरोना संक्रमण को दुनिया में फैला कर और फिर वैश्विक आपदा के दौर में दूसरे देशों की सीमाओं का अतिक्रमण का प्रयास कर उसने अपनी बदनीयती की अति कर दी है, जिसका अंत निश्चित है। यह दानवीय स्वभाव है कि वह अपने अंतिम समय में भी गलती नहीं मानता है, सुधार के रास्ते पर नहीं आता है क्योंकि उसके कर्मफल के रूप में उसे अपनी करनी का फल भोगना ही पड़ता है। फिलहाल चीन उसी स्थिति में आ चुका है। चीन ने जिन चौदह देशों में से बारह देशों से सीमा विवाद सुलझाने की सफाई दी है, उसकी सच्चाई यह है कि उनमें से कुछ देशों पर वह जबरन कब्जा किए बैठा है तो कुछ के साथ निरंतर इसका षडयंत्र कर रहा है। उन देशों की जनता निरंतर चीन से आजादी की मांग करती आंदोलन कर रही है, जिन पर वह सैन्य अत्याचार कर रहा है। चीन जमीनी अतिक्रमण के साथ सामुद्रिक क्षेत्र में भी अपनी विस्तारवादी बदनीयती के साथ है। कई देश उसकी इस काली करतूत से परेशान हुए अपनी जनता की मूलभूत जरूरतों पर खर्च किए जाने वाले धन और संसाधनों को चीन से रक्षा के मद में खर्च करने को विवश हैं। जमीन से लेकर समुद्र तक चीन की इसी विस्तारवादी बदनीयती का नतीजा है कि आज वियतनाम, ताइवान जैसे छोटे देशों के साथ अमेरिका, जापान, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे कई बड़े देश चीन के विरूद्ध एकजुट हो उसके सामने हैं। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के षडयंत्रकारी और विस्तारवाद के भूखे चीन के इलाज का यह सबसे उपयुक्त अवसर है, दुनिया को अब चीन के चोर कबूलनामे पर भी उससे सवाल पूछने के साथ सही जवाब पाने और फिर उसको हकीकत में बदलने की जरूरत है । लिखते-लिखते खबर आ रही है कि चीन मोदीजी के बिना पूछे सवाल का जवाब देने के बाद अब पीठ दिखाने को विवश हुआ पीछे जा रहा है, पर उसने जो जवाब दिया है उसे उसके सामने बहुत आगे तक ले जाने की जरूरत है।

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