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चीन की वापसी संदेहास्पद

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Ajeet kumar, Samvad Parikrama,
भारत और चीन के बीच लद्दाख में टकराव वाली जगहों से पीछे हटने की सहमति बन गई है। बताया जा रहा है कि लेफ्टिनेंट-जनरल स्तर की दूसरी वार्ता में दोनों देशों के बीच सहमति बनी, जिसके बाद सूत्रों के हवाले से खबर आई की चीन धीरे-धीरे पीछे हटने को तैयार हो गया है। इस बारे में आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है पर जो एजेंसियां खबरें दे रही हैं वे सेना के शीर्ष सूत्रों के हवाले से यह बात कह रही हैं। 15 जून की रात को गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद से ही तनावपूर्ण शांति बनी हुई है। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच दोपक्षीय बातचीत हुई है और रूस के विदेश मंत्री को शामिल करके त्रिपक्षीय वार्ता भी हुई है। इस वार्ता में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लवारोव का यह कहना अहम है कि दोनों देशों का विवाद सुलझाने के लिए तीसरे पक्ष की जरूरत नहीं है और दोनों आपस में अपने विवाद को सुलझाने में सक्षम हैं।

इन सारी बातों का लब्बोलुआब यह है कि एक हिंसक झड़प और दोनों तरफ से जान हानि के बाद टकराव को टालने और तनाव घटाने पर सहमति बन गई है। पर यह सहमति और चीन के पीछे हटने की बात अपने आप में संदेह पैदा करती है। चीन आसानी से अपनी जगह नहीं छोड़ता है और वह कोई भी कदम अचानक या अनायास नहीं बढ़ाता है। मिसाल के तौर पर भारत, चीन और भूटान के ट्राइ जंक्शन पर स्थित डोकलाम की घटना को देखा जा सकता है। अव्वल तो चीन आसानी से यहीं मानने को तैयार नहीं था कि वह संधियों का और सीमा रेखा का उल्लंघन कर रहा है। यह बात मनवाने और उसे पीछे हटने के लिए तैयार करने में 72 दिन लग गए थे।

डोकलाम में, जहां कोई टकराव नहीं हुआ था और हिंसक झड़प नहीं हुई थी, दोनों देशों की सेनाएं आमने सामने डटी थीं, वहां से पीछे हटने में चीन ने 72 दिन लिए तो वह लद्दाख में इतनी जल्दी पीछे हटने को कैसे तैयार हो गया है? यह बड़ा सवाल इसलिए है क्योंकि यह चीन की रणनीतिक चाल भी हो सकती है। असल में 15 जून की रात को दोनों देशों के सैनिकों के बीच हुई झड़प के बाद से चीन अब खुद ही तनाव घटाना चाहता था। उसका शुरुआत मकसद पूरा हो चुका था। वह डेढ़ महीने से ज्यादा समय तक गतिरोध पैदा करके पूर्वी लद्दाख के तीन या चार सेक्टरों में बैठा रहा। भारत की चुप्पी या झूठे प्रचार के बीच उसने गलवान घाटी, पैंगोंग लेक, दौलत बेग ओल्डी और डेमचक में अपनी बढ़त बनाई। यह चीन की सैन्य और कूटनीतिक रणनीति थी, जो उसने गलवान घाटी में टकराव किया और पैंगोंग लेक के पास बढ़त बनाई।

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गलवान घाटी में चीन को भी बड़ा नुकसान हुआ है। जानकार सूत्रों के हवाले से चीन से खबर आई है कि उसके दो सैन्य अधिकारी मारे गए। वह संख्या नहीं बता रहा है इसका मतलब है कि उसका नुकसान भी बड़ा है। लेकिन यह उसका सोचा समझा कदम भी हो सकता है। ध्यान रहे टकराव के बाद से ही सबका ध्यान गलवान घाटी पर था। इस बीच दूसरे दिन से खबर आई कि उसने पैंगोंग लेक में अपनी बढ़त बनाई है और करीब आठ किलोमीटर का इलाका घेर लिया है। अभी इसकी पुष्टि नहीं हुई है पर अगर भारत के सैन्य अधिकारी उसके पीछे हटने को लेकर बात कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि वह आगे बढ़ कर बैठा है। यह भी चीन की पुरानी रणनीति है और उसके उत्तरी सीमा पर भी इसे देखा जा सकता है वह दूसरे देश की सीमा में घुस जाता है और फिर आगे बढ़ कर वहां स्थायी निर्माण करता है और उसके बाद समझौते के तहत कुछ इलाके छोड़ कर पीछे हट जाता है।

सामरिक विशेषज्ञ मान रहे हैं कि चीन ने डोकलाम में भी यहीं किया। उसने वार्ता के बाद पीछे हटना कबूल कर लिया और उसके बाद फिर शांति बहाली होने के बाद उसने आसपास के इलाकों में अपना निर्माण कार्य किया। आज भूटान भी उससे परेशान है और भारत भी। इस बार का विवाद भी चीन ने पहले सिक्किम में शुरू किया। नाकू ला में दोनों देशों के सैनिकों के बीच टकराव हुआ और इसी बीच उसने लद्दाख के तीन इलाकों में अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा दी। सेटेलाइट से मिली तस्वीरों और सामरिक जानकारों के स्थानीय सैन्य अधिकारियों से मिली जानकारी का लब्बोलुआब यह है कि चीन ने लद्दाख के कई इलाकों में पक्का निर्माण किया है। उसने बंकर बनाए हैं, सड़कें बनाई हैं और सेना की दूसरी फैसिलिटी का निर्माण किया है।

तभी उसके पीछे हटने के वादे पर भारत आंख मूंद कर भरोसा नहीं कर सकता है। भारत को यह सुनिश्चत करना होगा कि वह पीछे हटे। लद्दाख और खास कर विवाद वाली जगहों की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वहां लगातार सेना मौजूद रह कर निगरानी नहीं कर सकती है। दूसरे, दोनों देश, जिसे अपनी अपनी सीमा मानते हैं उसके बीच बहुत बड़ा इलाका नो मेंस लैंड का है, जहां कोई नहीं रहता है। इस इलाके पर चीन की नजर है। भारतीय सैन्य अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि अगर उसने इस इलाके में भी कोई निर्माण कार्य किया है तो उसे हटाए और स्थायी रूप से पीछे हटे।

चीन के साथ सहमति और पीछे हटने का वादा सिर्फ दिखावे के लिए नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही भारत को बरसों से चल रही वार्ता को भी किसी नतीजे तक पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए। दोनों देशों में सीमा विवाद सुलझाने के लिए बने तंत्र के अधिकारियों के बीच 22 बार बैठकें हो चुकी हैं। अब इसका नतीजे पर पहुंचना जरूरी है।

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