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चीन ने क्यों किया हमला ?

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वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गलवान घाटी के संघर्ष बिंदु से भारत और चीन अपनी फौजें पीछे हटने लगी हैं, लेकिन चीन ने इस बार देपसांग में तंबू गाड़ दिया है और घुसपैठ की कोशिश में है। चीन इस इलाके में कराकोरम दर्रे के पास वाले इलाकों में कब्जा करना चाहता है। भारत में चीन के राजदूत ने कहा कि इस समय और संघर्ष तनाव का रास्ता है और गलत है। राजदूत ने भारत से कहा है कि ऐसी कार्रवाई ना करें जिससे हालात और जटिल हो जाएं। दरअसल, वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थित रणनीति का उद्देश्य सामरिक है जो कि स्वाभाविक है। किसी भी संघर्ष का अंतिम लक्ष्य अपनी शर्तों पर टिकाऊ शांति ही होता है। यद्यपि यह केवल कहने के लिए ही है। जहां कहीं भी दो राष्ट्रों के बीच प्रतिस्पर्धा होती है और उसके चलते संघर्ष होता है तो स्थाई शांति केवल यूटोपिया है। उधर, चीन कराकोरम दर्रे के आसपास के इलाकों पर कब्जा करना चाहता है, इसमें उसका स्वार्थ है। जब से भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले गुलाम कश्मीर के आतंकी अड्डों को खत्म कर दिया है तब से पाकिस्तान को खतरा पैदा हो गया है कि हो न हो एक दिन भारत इस क्षेत्र पर कब्जा कर लेगा। इस क्षेत्र में जहां पाकिस्तान का अंदरूनी राजनीतिक स्वार्थ है, वहीं चीन का आर्थिक स्वार्थ भी है। यही कारण है कि लद्दाख से कराकोरम तक जहां चीन ने मोर्चा खोला हुआ है, वहीं पाकिस्तान ने भारत के विरुद्ध कूटनीतिक और आतंकवादी मोर्चा खोल दिया है। इससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जहां परेशानी होगी, वहीं आज पूरे देश में एक सुलझे हुए आदमी के खिलाफ वातावरण बनेगा। जहां भारतीय राजनयिकों को पाकिस्तान से निकाला जा रहा है, वहीं अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी भारत के खिलाफ बयानबाजी करने से पाकिस्तान चूक नहीं रहा है। पाकिस्तानी लोग खुश हैं कि भारत कूटनीतिक तौर पर अलग-थलग पड़ गया है और मोदी जी परेशान हैं। सैन्य नजरिये से देखें लगता है कि भारत ने चीन का हमला और अतिक्रमण रोक दिया है और किसी भी स्थिति के लिए सेना चौकस है। 15 और 16 जून के बीच की रात ने दोनों प्रतिद्वंद्वियों को स्थिति के नए सिरे से आकलन के लिए बाध्य कर दिया है। चीन को यह अहसास हो गया है कि जब घूसों और डडों की लड़ाई ऐसी बर्बर हो सकती है तो फिर आज के भारत की सेना के साथ हथियारबंद जंग कैसी होगी। चीन इसी कारण से गलवान घाटी से पीछे लौटने और कूटनीतिक वार्ता को आगे बढ़ाने पर तैयार हो गया। पूरी लड़ाई समग्र रूप से देखें तो सामरिक प्रभाव वाली है और उसे रणनीतिक रूप दिया गया है। इसका उद्देश्य है भारत के लिए एक अप्रिय स्थिति पैदा कर जवाबी कार्रवाई के लिए ललकारना, जिससे पहले से परेशान प्रधानमंत्री मोदी और ज्यादा परेशान हो जाएं तथा उनकी प्रतिक्रिया युद्धक हो जाए। 1959 में भारत द्वारा दलाई लामा को शरण देना और इसके बाद सीआईए के साथ मिलकर कथित तिब्बती विद्रोहियों को ट्रेनिंग दिया जाना 1962 के युद्ध के प्रमुख कार्यों में शामिल था, क्योंकि तिब्बत की निर्वासित सरकार और तिब्बती सैनिकों की उपस्थिति को चीन अपनी संप्रभुता पर खतरा मानता था और तिब्बत की आजादी के लिए भारत द्वारा मदद को वह प्रमुख मानता था। अब भी चीन मानता है कि अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ मिलकर भारत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और विशेष रूप से दक्षिण चीन सागर तथा हिंद प्रशांत क्षेत्र में उसके सामरिक हितों को कमजोर कर रहा है। कुल मिलाकर देखें तो चीन चाहता है कि भारत क्षेत्रीय और वैश्विक स्तरों पर उसे “बड़ा भाई” मान ले। हमारे पास चीन के मुकाबले के लिए पर्याप्त सैनिक क्षमता है लेकिन अभी हम जिस आर्थिक मोड़ से गुजर रहे हैं उस मोड़ पर चीन से संघर्ष के फलस्वरूप हम पीछे चले जाएंगे। इसी कारण मोदी जी ने कूटनीतिक और सैन्य साधनों का कुशल प्रबंधन किया है और चीन इसी से खिझा हुआ है।

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