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झारखंड विधानसभा चुनाव 2019 : कुछ सीटों पर भाजपा-आजसू के बीच दोस्ताना संघर्ष के आसार

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गौतम चौधरी
रांची : झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान राष्टÑीय लोकतांत्रिक गठबंधन में साफ तौर पर बिखराव दिख रहा है बावजूद इसके दलों के नेता एक-दूसरे के खिलाफ खुलकर बोलने से बच रहे हैं। विभाजन की बात अभी तक किसी दल ने स्वीकार नहीं किया है और गठबंधन घटक दलों के नेता यही कह रहे हैं कि अंततोगत्वा हमलोग इकट्ठे चुनाव लड़ेंगे लेकिन गठबंधन के तीनों दलों (भाजपा, आजसू और लोजपा) ने एक-दूसरे के खिलाफ अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं।

ताजा खबर के अनुसार आजसू पार्टी ने भाजपा नेताओं के द्वारा दिए गए सारे वैकल्पिक प्रस्ताव को ठुकरा दिया। फलहाल कुल लवो-लुआव में एनडीए के घटक दलों में गठबंधन के कोई चिह्न नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में कयास यह लगाया जा रहा है कि एनडीए गठबंधन के घटक लोक जनशक्ति पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी जबकि भाजपा और आजसू के बीच कुछ सीटों पर दोस्ताना संघर्ष हो सकता है। कुछ सीटों पर आजसू अपना उम्मीदवार वापस ले सकता है।

दोनों पार्टियों के बीच गतिरोध कम करने के लिए भाजपा के बड़े नेता लगातार आजसू के नेताओं के साथ संपर्क बनाए हुए हैं लेकिन अभी तक आजसू पार्टी की ओर से कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिले हैं। जानकारी में रहे कि आजसू ने जैसे ही गठबंधन धर्म के इतर जाते हुए अपने उम्मीदवारों की घोषणा की, भाजपा के असंतुष्ट नेता आजसू में जाने लगे।

खबर तो यहां तक आ रही है कि झारखंड के कद्दावर नेता लोकसभा के पूर्व उप सभापति करिया मुंडा का बेटा अमरनाथ मुंडा आजसू केन्द्रीय अध्यक्ष सुदेश महतो से मिलने गए थे। यही नहीं हाल-फिलहाल कांग्रेस और अन्य पार्टियों के नेताओं ने भी आजसू ज्वाइन किया है।

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आजसू की ओर से आ रहे संकेतों में बताया गया है कि जो बड़े नेता अन्य पार्टियों से आजसू में ज्वाइन कर रहे हैं उन्हें पार्टी टिकट देगी। ऐसे में एनडीए गठबंधन में विभाजन की रेखा साफ दिख रही है लेकिन भाजपा गठबंधन तोड़ने का ठिकड़ा अपने सिर नहीं फोड़ना चाहती है। वह चाहती है कि प्रचारित यही किया जाए कि गठबंधन आजसू के जिद्द के कारण टुटा है।

यही कारण है कि भाजपा के नेता लगातार यही कह रहे हैं कि हम किसी भी कीमत पर अपने सहयोगी पार्टी के नेता को मना लेंगे। इधर आंकड़ों का समीकरण देखें तो गठबंधन टुटने के बाद भी वोट के मामले में भाजपा की स्थिति अन्य दलों की अपेक्षा बेहतर है। झारखंड निर्माण से लेकर अबतक भाजपा का वोट प्रतिशत लगातार बढ़ता गया है।

पिछले 2019 के लोकसभा चुनाव में तो भाजपा को जबरदस्त सफलता मिली थी। हालांकि इसमें आजसू की भी भूमिका थी लेकिन इस बहुमत के लिए भाजपा अपने आप को ही स्रेय दे रही है। भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि गठबंधन टुटने के बाद भी भाजपा को कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि इससे यह साबित होता है कि प्रदेश में भाजपा की स्वीकार्यता जमीन पकड़ रही है। भाजपा को 2014 के विधानसभा चुनाव में लोकसभा चुनाव की तुलना में साढ़े नौ प्रतिशत वोट कम हो गए थे।

क्या कहते हैं एक्पट्र
लोकसभा का चुनाव राष्टÑीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं, जबकि विधानसभा के चुनाव स्थानीय मुद्दे हावी होते हैं। जो ट्रेंड रहा है उसके आधार पर भाजपा राष्टÑीय मुद्दों के मामले में बेहतर है लेकिन स्थानीय मुद्दों में कमजोर पड़ जाती है। राष्टÑीय चुनाव को स्थानीय मुद्दे कम प्रभावित करते हैं और इसीलिए भाजपा को लोकसभा चुनाव में मिले वोट पर बहुत ज्यादा भरोसा नहीं किया जा सकता लेकिन भाजपा को मिली मत प्रतिशत का एकदम उलट तो नहीं हो सकता है।
– अधिवक्ता विशाल कुमार, झारखंड उच्च न्यायालय, चुनावी गणित के जानकार, रांची।

सच पूछिए तो झारखंड और राष्टÑीय स्तर पर भाजपा गठबंधन के साथ ही आगे बढ़ी है। स्थानीय पार्टियों के अपने अहम होते हैं लेकिन भाजपा को गठबंधन में विश्वास पैदा करनी चाहिए। वैसे आंकड़े तो यही कह रहे हैं कि गठबंधन टुटने के बाद भी भाजपा की स्थिति अन्य दलों की अपेक्षा बेहतर होगी लेकिन पार्टी सरकार बनाने तक का बहुमत जुटा पाएगी यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता है। इसलिए गठबंधन में जो गतिरोध और अंतरविरोध पैदा हुआ है वह अविश्वास के कारण पैदा हुआ है। इसे दूर करने की जरूरत है।
– त्रिभुवन शर्मा, झारखंड बाल कल्याण समिति के पूर्व सदस्य एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता, रांची।

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