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…. तस्मै श्रीगुरवे नम:

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गुरु दीक्षा देते हैं। दीक्षा केवल किसी विषय को लेकर कोई सूचना नहीं है,बल्कि यह सजगता और बुद्धिमत्ता की चरम सीमा है। गुरु आपको केवल ज्ञान से नहीं भर देते हैं,बल्कि आपके भीतर प्राण शक्ति को जगाते हैं। गुरु की उपस्थिति में क्या होता है? आप थोड़ा और अधिक सजीव हो जाते हैं। आपके शरीर की प्रत्येक कोशिका थोड़ा और अधिक सजीव हो जाती है। गुरु केवल बुद्धि का ही नहीं,बल्कि बुद्धिमत्ता का आवाहन एवम जागरण करते हैं। बुद्धि की चरम सीमा बुद्धिमत्ता है। मन चंद्रमा से जुड़ा हुआ है और पूर्ण चंद्रमा पूर्णता,उत्सव एवम चरम सीमा का प्रतीक है। गुरु पूर्णिमा वह दिन है,जब शिष्य पूर्ण रूप से जागृत हो जाता है। और उस पूर्णता में,शिष्य अपने गुरु के प्रति कृतज्ञ होता है। कृतज्ञता आपकी और मेरी (द्वैत) नहीं होती है बल्कि यह अद्वैत होती है। यह एक नदी की तरह नहीं है,जो दूसरी नदी में जाकर मिल रही है,बल्कि यह एक सागर है,जो अपने आप में ही घूम रहा है। नदी और सागर,दोनों ही कहीं ना कहीं जाते हैं। एक नदी एक जगह से दूसरी जगह जाती है। लेकिन,सागर कहां जाता है? यह अपने आप में ही घूमता है और गुरु पूर्णिमा विद्यार्थी या शिष्य की पूर्णता का प्रतीक है। शिष्य कृतज्ञता का उत्सव मनाता है। सबसे पहले गुरु दक्षिणामूर्ति हैं। वह एक अवतार हैं,जिसमें अनंत को सीमितता में बड़ी कुशलता से पिरोया गया है। इस अवतार में अंत और अनंत एक साथ मौजूद हैं।
गुरु सिद्धांत : हमारे शरीर में अरबों कोशिकाएं हैं। प्रत्येक कोशिका का अपना जीवन है। बहुत सारी कोशिकाएं प्रत्येक क्षण जन्म ले रही हैं और मर रही हैं। आपका शरीर एक नगर के समान है। जिस प्रकार से बहुत सारे ग्रह सूर्य के चारों ओर चक्कर लगा रहे हैं,उसी प्रकार से आपके शरीर में बहुत सारी कोशिकाएं घूम रही हैं। आप मधुमक्खी के छत्ते के जैसे एक नगर हैं। छत्ते में बहुत सारी मधुमक्खियां होती हैं,जो बैठी रहती हैं,लेकिन इनमें से केवल एक रानी मक्खी होती है। यदि वह रानी मक्खी कहीं चली जाती है,तब बाकी सारी मक्खियां भी चली जाती हैं। छत्ता खत्म हो जाता है। इसी प्रकार से हमारे शरीर में एक अणु है। वह सबसे छोटे से भी छोटा अणु है, जो आत्मा है,जो सब जगह पर है,फिर भी कहीं नहीं है। वही रानी मक्खी है,जो आप हैं। वही रानी मक्खी ईश्वर है। वही रानी मक्खी गुरु सिद्धांत है।

सदा जीवंत रहते हैं सद्गुरु

जिस तरह पश्चिम में फादर्स डे और मदर्स डे मनाने का रिवाज है (अब तो यह भारत में भी प्रचलन में आ रहा है), उसी तरह भारत में गुरूज डे मनाने की बहुत प्राचीन प्रथा है। लेकिन इसे हम गुरु पूर्णिमा के नाम से मनाते हैं जो हर वर्ष आषाढ़ पूर्णिमा के दिन पड़ता है। यह पर्व गुरु को समर्पित होता है, और इस दिन पूरे भारत में शिष्य अपने गुरु की पूजा करते हैं और उनके द्वारा दिखाये गए मार्ग पर निष्ठा के साथ चलते रहने का पुन: संकल्प लेते हैं। भारत में गुरु को बहुत ऊंचा स्थान दिया गया है। संत कबीर ने यहां तक कह दिया कि शिष्य को भगवान से पहले गुरु की वंदना करने में संकोच नहीं करना चाहिए- गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरु आपनो जिन गोविंद दियो बताय। इस दोहे को पढ़ते समय हमें यह याद रखना चाहिए कि कबीर साहब यहां एक साधारण शिक्षक की नहीं, अपितु एक सद्गुरु की बात कर रहे हैं। ऐसे ही एक सद्गुरु हुए, परमहंस योगानन्दजी। अपनी विश्व-विख्यात पुस्तक,द आॅटोबायोग्राफी आॅफ ए योगी (हिन्दी में योगी कथामृत) में अपने गुरु, स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि का जो श्रद्धा-सिक्त और भाव-परिपूर्ण चरित्र-वर्णन उन्होंने किया, उसे पढ़कर गुरु और शिष्य, दोनों के चरणों में पाठक का मस्तक स्वयं ही झुक जाता है। अपनी पुस्तक का शुभारंभ योगानन्द जी ने अपने गुरु का स्मरण करते हुए इस प्रकार किया: परम सत्य की खोज और उसके साथ जुड़ा गुरु-शिष्य संबंध प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है। इस खोज के मेरे अपने मार्ग ने मुझे एक भगवत्स्वरूप सिद्ध पुरुष के पास पहुंचा दिया जिनका सुगढ़ जीवन युग-युगांतर का आदर्श बनने के लिए तराशा गया था। वे उन महान विभूतियों में से एक थे जो भारत का सच्चा वैभव रहे हैं। अपने गुरु के संदर्भ में लिखे गए ये सुंदर शब्द स्वयं योगानन्दजी के अद्भुत जीवन-चरित्र के लिए भी खरे उतरते हैं। हालांकि उनका अधिकांश जीवन अमेरिका में योग-प्रचार में बीता, उनकी गिनती भारत के महानतम संतों में की जाती है। पूरे पाश्चात्य जगत में आज अगर योग को इतनी स्वीकृति मिल रही है,इसका अधिकांश श्रेय योगानन्दजी को जाता है जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन भारत और पश्चिम में क्रिया योग के प्रचार के लिए समर्पित कर दिया। परमहंस योगानन्दजी का कहना था की सभी सच्चे गुरु अमर होते हैं। अपने शिष्यों का मार्गदर्शन करने के लिए और उन पर कृपा-वृष्टि करने के लिए एक सद्गुरु को शरीर में बने रहने की कोई आवश्यकता नहीं होती। जो भी सच्चा शिष्य अपने गुरु की शिक्षाओं का निष्ठापूर्ण पालन करता है, वह अपने गुरु की जीवंत उपस्थिति का अनुभव अवश्य करता है। वे कहते थे कि सद्गुरु अपने शिष्य के कूटस्थ (भ्रूमध्य में स्थित विचार और संकल्प शक्ति का केंद्र) में रहते हैं, और जब कोई शिष्य पूरे मन-प्राण से गुरु का स्मरण करता है, तो वह अपने गुरु को हमेशा अपने पास पाता है। अत:, एक सद्गुरु और उनके सच्चे शिष्य में कोई दूरी नहीं रहती। आइये, इस गुरु-पूर्णिमा के दिन हम सब अपने-अपने सद्गुरु का भक्तिपूर्ण स्मरण करें और उनकी जीवंत उपस्थिति और मार्गदर्शन का लाभ उठाएं।
(लेखक प्रसिद्ध आध्यात्मिकपुस्तक ह्ययोगीकथामृतह्ण के लेखक व योगदा सत्संग सोसाइटी आॅफ इंडिया के वरिष्ठ संन्यासी हैं)

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