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देश का आजमाया हुआ हथियार है बॉयकॉट

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द्दाख में लाइन आफ एक्चुअल कंट्रोल पर चीनी करतूतों को रोकने के क्रम में भारत के बीस रणबांकुरों के बलिदान के बाद देश में चीन के खिलाफ गुस्सा उठना स्वाभाविक है। इस गुस्से की अभिव्यक्ति में चीनी सामान के बहिष्कार (बॉयकॉट) की मांग भी शामिल हो चुकी है। हालांकि मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में इस विचार को अव्यावहारिक मानने वालों की भी कमी नहीं है। वाणिज्य मंत्रालय के मुताबिक 2018-19 में चीन और भारत के बीच करीब 6.09 लाख करोड़ का कारोबार हुआ, जिसमें चीन का पलड़ा भारी रहा। चीन ने भारत को 4.92 लाख करोड़ का निर्यात किया, जबकि भारत से उसने सिर्फ 1.17 लाख करोड़ का आयात किया। ऐसे में यह सवाल बनता है कि भारत का उद्योग और आम समाज जिस तरह से चीनी सामानों और वहां से आए कच्चे माल पर आश्रित हो चुका है, उसे देखते हुए क्या वह इनके आयात में कटौती का जोखिम उठा सकेगा?
बापू भी थे खिलाफ : ऐसे ही सवाल गांधी जी के सामने भी उठे थे जब 11 जुलाई 1921 को मुंबई के परेल में उन्होंने विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर एक तरह से स्वदेशी अभियान का श्रीगणेश किया था। हालांकि स्वदेशी के पक्ष में विदेशी के बहिष्कार को लेकर गांधी का आंदोलन मौलिक नहीं था। स्वदेशी की भावना इसके सोलह साल पहले ही जोर पकड़ चुकी थी, जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया था। उसके खिलाफ बंगाल में बंग भंग आंदोलन शुरू हुआ जो देखते-देखते पूरे भारत का आंदोलन बन गया। इसी आंदोलन के दौरान 7 अक्टूबर 1905 को ΄ाुणे में विदेशी वस्त्रों की पहली होली जलाई गई थी। उन दिनों गांधी जी दक्षिण अफ्रीका में थे। उन्होंने इसका समर्थन नहीं किया था। इंडियन ओपीनियन में उन्होंने इसके खिलाफ लिखा था। लेकिन भारत लौटने और देश भ्रमण करने के बाद गांधी को लगा कि देश का स्वाभिमान तभी जागृत हो सकता है, जब स्वदेशीकरण ΄ार जोर दिया जाए। इसके पहले हिंद स्वराज में वे स्वदेशी का गुणगान कर ही चुके थे, हालांकि, स्वदेशी के जरिए ब्रिटिश सरकार को चुनौती देने की बातें सार्वजनिक तौर ΄ार उससे काफी ΄ाहले से शुरू हो गई थी। जुलाई 1903 की सरस्वती में आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की लिखी कविता ΄ा्रकाशित हुई थी। जिसकी कुछ पंक्तियां हैं, अरे भाई! अरे ΄यारे! सुनो बात/ स्वदेशी वस्त्र से शोभित करो गात/ वृथा क्यों फूंकते हो देश का दाम/ करो मत और अपना नाम बदनाम! बहुत कम लोग जानते हैं कि गांधी के स्वदेशी अभियान का भी उस दौर में कई लोगों ने समर्थन नहीं किया था। गांधी भक्त के रुप में विख्यात दीनबंधु एंड्रयूज ने भी इसका विरोध किया था। 1921 में ही गांधी जी को लिखे एक पत्र में एंड्रयूज ने लिखा था, मैं जानता हूं कि गरीबों की सहायता की भावना से ही आप विदेशी कपड़ों की होली जला रहे हैं लेकिन मैं ऐसा महसूस करता हूं कि आप गलती पर हैं। विदेशी शब्द में जातीयता की भावना को उभारने वाली बात छिपी हुई है। उन सुंदर और कोमल वस्त्रों के ढेर को आग लगाते हुए आपका चित्र देखकर मेरे मन को गहरा धक्का लगा है। मुझे भय है कि कहीं यह कदम, स्वार्थ΄ारायण राष्टÑवाद की ओर न ले जाए। यह संयोग ही कहा जाएगा कि आज चीनी वस्तुओं के बहिष्कार की जो मांग उठ रही है, उसके विरोध में दिए जा रहे तर्कों में भी यही कहा जा रहा है कि इससे स्वार्थनारायण राष्टवाद को मदद मिलेगी। हालांकि, स्वदेशी के जरिए गांधी ने किस तरह ब्रिटिश सरकार की चूलें हिला दीं, यह इतिहास में दर्ज हो चुका है। यह भी संयोग ही है कि इन दिनों प्रेमचंद भी चर्चा में हैं। गांधी के स्वदेशी आंदोलन को महसूस करना हो तो ΄ा्रेमचंद की दो कहानियों जुलूस और सुराज से गुजरना जरूरी हो जाता है। एक और संयोग यह है कि 31 साल पहले जून में ही इलाहाबाद में स्वदेशीकरण को लेकर आजादी बचाओ अभियान शुरू हुआ था। बहुराष्टरीयकरण के खिलाफ उभरे इस आंदोलन का ही असर था कि बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी स्वदेशी जागरण मंच के जरिए इसे आगे बढ़ाने की कोशिश की। यह बात और है कि 1998 में भारतीय जनतापार्टी के सत्ता में आने के बाद उसे महसूस हुआ कि डंकेल प्रस्तावों के दौर में इसे बहुत दूर तक खींच पाना संभव नहीं होगा और फिर यह आंदोलन भी सुस्त पड़ गया। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्वदेशी के ही कुछ कार्यकर्ताओं ने चीन के सामानों के बहिष्कार के आंदोलन की शुरुआत साल 2013 में दिल्ली के जंतर-मंतर से की थी। जाहिर है, स्वदेशी के जरिए भारतीयता का संदेश देने का विचार काफी पुराना है। इसीलिए यह समय-समय पर नए-नए रूपों में सामने आता रहता है। चीनी वस्तुओं के बहिष्कार के समर्थक भी मानेंगे कि चीन की आर्थिक रीढ़ कमजोर करने की कोशिश अब गांधी की तर्ज पर संभव नहीं है। इसके लिए एक बेहतर राह सोनम वांग्चुक ने अपने एक विडियो में दिखाई है।
वांग्चुक फॉर्म्युला : सोनम वांग्चुक लद्दाख की वह हस्ती हैं, जिनकी जिंदगी से प्रेरित किरदार आमिर खान थ्री इडियट फिल्म में निभा चुके हैं। सोनम का सुझाव है कि जिन वस्तुओं और साधनों के बिना आपकी जिंदगी चल सकती है, उन चीनी वस्तुओं का पहले चरण में बहिष्कार करें। नाचने-गाने के विडियो शेयर करने वाले चीनी ऐप टिकटॉक के बिना भी जिंदगी चल सकती है। कम से कम ऐसे मोर्चों पर तो चीन को चोट पहुंचाई ही जा सकती है। बिना चीनी लड़ियों और झालर के भी हम रोशनी के त्योहार मना सकते हैं। लेकिन इसके लिए भारत को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पस्त हुए जर्मनी और जापान की तरह खुद पर भरोसा करना होगा। अपने करोड़ों कार्यशील हाथों को कुशल बनाना होगा। इसके लिए दीर्घकालिक योजना बनानी होगी। तभी उस तरह का लक्ष्य हासिल किया जा सकेगा, जैसा गांधी जी ने एंड्रयूज की चिंताओं को नजरअंदाज करके हासिल किया था।

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