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नेपाल के नए नक्शे पर भारत को गंभीर आपत्ति

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नेपाल सरकार ने लिंपियाधुरा काला पानी और लिपुलेख को अपने नए राजनीतिक नक्शे में शामिल किया है और इस पर भारत बेहद नाराज है। भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि किसी भी क्षेत्र पर ऐसे दावे को भारत कभी स्वीकार नहीं करेगा। विदेश विभाग का कहना है कि नेपाल का नक्शा एकतरफा हरकत है और ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं है। यह दावा बनावटी है और द्विपक्षीय बातचीत से मामले को सुलझाने की राजनीतिक समझदारी से अलग है। भारत सरकार ने सलाह दी है कि नेपाल ऐसी हरकतों से बचे और भारतीय संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करे। भारत सरकार ने यह उम्मीद जाहिर की है कि नेपाल का नेतृत्व सकारात्मक वातावरण बनाते हुए राजनयिक बातचीत के जरिये सीमा मुद्दों को हल करेगा। नेपाल का रुख दिनोदिन बदल रहा है। बुधवार को प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने सर्वदलीय बैठक बुलाई थी जिसमें कई पूर्व प्रधानमंत्रियों ने भी हिस्सा लिया था। नेपाल मजदूर चांद पार्टी के सांसद प्रेम सुवाल ने बैठक के बाद बताया कि प्रधानमंत्री ओली में स्पष्ट कहा है कि वह भारत के पक्ष में उस जमीन कादावा नहीं छोड़ेंगे। विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ज्ञावली ने कहा कि सरकार अपने पुरखों की जमीन की हिफाजत करेगी और उन्होंने नेताओं से इस मामले पर संयम बरतने की अपील की। दूसरी तरफ भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 8 मई को लिपुलेख के समीप से होकर गुजरने वाले उत्तराखंड मानसरोवर रोड का उद्घाटन किया। लिपुलेख नेपाल और भारत की सीमाओं से सटता हैऔर नेपाल भारत के इस कदम को लेकर नाराज है। नेपाल इसे अतिक्रमण का मुद्दा कह रहा है और इसे लेकर नेपाल में भारत विरोधी प्रदर्शन हो रहे हैं। उत्तराखंड के धारचूला के पूरब महाकाली नदी के किनारे नेपाल का दार्चुला जिला पड़ता है। महाकाली नदी नेपाल भारत सीमा के तौर पर भी काम करती है। नेपाल सरकार का दावा है कि भारत सरकार ने उसके लिपुलेख इलाके में 22 किलोमीटर लंबी सड़क बना दी है। नेपाल ने 2019 के नवंबर में इसी मामले को लेकर अपना विरोध जताया था। जम्मू और कश्मीर के बंटवारे के समय जो राजनीतिक नक्शा जारी किया गया था उसमें आधिकारिक रूप से कालापानी इलाके को भारतीय चित्र में दिखाया गया था। काला पानी का इलाका इसी लिपुलेख के पश्चिम में है। नेपाल लंबे समय से इस पर दावा कर रहा है। 2015 में जब चीन और भारत के बीच व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देने के लिए समझौता हुआ था, तब भी नेपाल ने दोनों देशों के समक्ष विरोध किया था। इस हफ्ते नेपाल ने महाकाली नदी से लगे सीमावर्ती इलाके में सशस्त्र पुलिस (एपीएफ) भेज दी। काला पानी से लगे छांगरू गांव में एपीएफ ने सीमा चौकी स्थापित की है। एपीएफ का ढांचा भारतीय सशस्त्र सीमा बल की तरह है। 1816 में नेपाल और भारत की तत्कालीन ब्रिटिश सरकार में एक समझौता हुआ था जिसके लगभग 204 साल बाद नेपाल ने यह कदम उठाया है। काला पानी विवाद के बाद इस हफ्ते लिपुलेख को लेकर काठमांडू में विरोध प्रदर्शन से भारत नेपाल के कूटनीतिक संबंध फिर बिगड़ने लगे हैं। अगर विवाद के कुछ मुद्दों को छोड़ दें तो दोनों देशों के संबंध हाल तक बड़े मधुर रहे हैं और विवाद का चरित्र देखकर यह जाहिर होता है कि संबंधों को बिगाड़ने में कोई तीसरा कारक तत्व है। अगर चीनी कूटनीति जो लोग समझते हैं उन्हें यह पता चल रहा होगा कि कारक तत्व चीन ही है। इस घटना ने नेपालियों को नाराज कर दिया है। यहां तक कि प्रधानमंत्री ओली ने कह दिया कि नेपाल 1 इंच जमीन भी नहीं छोड़ेगा। प्रश्न उठता है कि इस स्थिति के कारण भारत नेपाल संबंध खराब हो जाएंगे और महाकाली नेपाल के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? भारत और नेपाल में सभ्यता, संस्कृति, इतिहास और भूगोल की दृष्टि से बहुत नज़दीकियां हैं। शायद कोई भी देश इतनी नजदीकी नहीं रखता जितनी इन दोनों देशों में रखी है। लेकिन 1800 किलोमीटर लंबी सीमा पर दोनों देशों के दरमियान कभी न खत्म होने वाले कई सीमा विवाद भी हैं। दोनों देशों की सरहद खुली हुई है और आड़ी तिरछी भी है। मुश्किल तो यह है कि दोनों देशों की सीमाओं का निर्धारण पूरी तरह नहीं हो पाया है। महाकाली जिसे नेपाल में शारदा और गंडक जिसे नेपाल में नारायणी कहते हैं वहां सीमा नदियां ही हैं और मानसून के समय बाढ़ आने पर तस्वीर बदल जाती है। यही नहीं, नदियों का रुख भी हर साल बदलता है। कई क्षेत्रों में सीमा बताने वाले खंभे अभी भी खड़े हैं, पर कोई उनकी कदर नहीं करता। सामान्य परिस्थितियों में दोनों देशों में आवाजाही लगी रहती है।
1816 में भारत के तत्कालीन ब्रिटिश शासन और नेपाल के बीच संधि हुई थी जिसे सुगौली संधि कहते हैं। उसी संधि के आधार पर 1850-1856 में एक नक्शा बना था। उस नक्शे में महाकाली नदी जो काला पानी से उत्तर पश्चिम में 16 किलोमीटर दूर से निकलती है, उसे ही सरहद माना गया था। लेकिन इस नक्शे में और भी कई कमियां हैं इसलिए 1875 में एक और नक्शा बना जिसमें महाकाली नदी काला पानी के पूरब से निकलती हुई दिखाई गई है। नदियों का रुख पिछले वर्षों में बदलता रहा। भारत और नेपाल दोनों देशों में कन्फ्यूजन बना रहा कि महाकाली नदी का उद्गम कहां है और विवाद की जड़ यही है। यह विवाद नया नहीं है, लेकिन इसे लेकर इतनी उग्र स्थिति कभी नहीं आई। आज चीन अपना कूटनीतिक वर्चस्व कायम करना चाह रहा है और उसने नेपाल में पहले भारत विरोधी माहौल तैयार किया और तब इस विवाद को हवा दे दी। इसमें प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की हिमाकत तो चीन शायद ही करे, लेकिन फिर भी इस क्षेत्र का राजनीतिक संतुलन बिगड़ने की आशंका है। भारत सरकार को इससे सचेत रहने की जरूरत है।

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