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बंगाल पहुंची क्षेत्रीय अस्मिता की सियासी जंग

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श्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव से एक साल पहले ममता बनर्जी ने वहां क्षेत्रीय अस्मिता का कार्ड खेलने की कोशिश की है। ममता बनर्जी ने शहीद दिवस के मौके पर यह दांव खेला। बीजेपी को राज्य के लिए बाहरी पार्टी करार देते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि उनके राज्य को बंगाल के ही लोग चलाएंगे, न कि कोई बाहरी लोग। दरअसल हर साल 21 जुलाई को ममता बनर्जी शहीद दिवस मनाती हैं, क्योंकि उसी दिन पुलिस फायरिंग में कई लोगों की मौत हुई थी। इस बार ममता बनर्जी की यह वर्चुअल रैली अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए प्रचार अभियान की शुरुआत मानी जा रही है। ममता के करीबियों के अनुसार आगे इस अभियान को वह क्षेत्रीय अस्मिता से और भी अधिक जोड़ेंगी। दरअसल दस सालों के शासन के बाद ममता बनर्जी को पता है कि इस बार एंटी इनकंबेंसी का सामना करना पड़ सकता है और खतरा मुख्य रूप से बीजेपी से ही है। बीजेपी ने वहां हाल के सालों में अपने संगठन को मजबूत बनाने में सफलता भी पाई है। 2019 आम चुनाव में राज्य की 42 सीटों में बीजेपी को 19 सीटें मिली थीं। तभी से विधानसभा चुनाव में बीजेपी की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है। लेकिन यह भी सही था कि आम चुनाव में बीजेपी की सफलता के पीछे मोदी फैक्टर और अमित शाह का मैनेजमेंट का बड़ा योगदान था। यही कारण है कि ममता बनर्जी ने संकेत दे दिया कि वह इस चुनाव को स्थानीय चुनाव का रूप देते हुए खुद को बंगाल की बेटी के रूप में पेश कर सकती हैं। अब तक राज्य में उनके सामने बीजेपी का कोई स्थापित चेहरा या मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं है। अभी तक का संकेत भी यही है कि बीजेपी राज्य में बिना किसी चेहरे के उतर रही है। उसी का लाभ उठाने के लिए ममता बनर्जी ने अभी से क्षेत्रीय कार्ड सामने रख दिया है। दरअसल ममता को पता है कि नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में अभी कमी नहीं आई है और अगर वह ममता बनाम मोदी को चुनाव में सामने रखती हैं, तो नुकसान उनका ही होगा। इस बार ममता बनर्जी के चुनाव के मुख्य रणनीतिकार प्रशांत किशोर हैं और वे बिहार में नीतीश कुमार से लेकर हाल ही में केजरीवाल तक क्षेत्रीय अस्मिता के इस रूप का फायदा सफलतापूर्वक उठा चुके हैं।
सफल सियासी ट्रेंड : दरअसल हाल के दिनों में राष्टÑीय राजनीति में प्रासंगिकता बनाए रखने की चुनौती झेल रहे क्षेत्रीय दल और क्षेत्रीय क्षत्रप हर जगह क्षेत्रीय अस्मिता के नाम पर राजनीति कर रहे हैं। चाहे वह कर्नाटक हो या महाराष्टÑ, तमिलनाडु- ओडिशा हो या आंध्र प्रदेश, सभी जगह क्षेत्रीय अस्मिता राजनीति पर हावी है। राष्टÑीय स्तर पर अजेय दिख रहे बीजेपी जैसे राष्टÑीय दलों का ऐसे मुद्दे पर आक्रामक तरीके से आगे बढ़ना मुश्किल होता है। यही कारण है कि कहीं अलग राज्य को लेकर, तो कहीं स्थानीय लोगों को वहां के संसाधनों पर अधिक हक दिए जाने के नाम पर मुद्दे उठते रहे हैं। दक्षिण भारत में तो कई दशकों से क्षेत्रीयता के मुद्दे सियासी धारा तय करते रहे हैं। कभी हिंदी थोपने के नाम पर, तो कभी संसाधनों में हक को लेकर दक्षिण के राज्य बड़ा मुद्दा बनाते रहे हैं। कुछ साल पहले तो दक्षिण के राज्यों ने केंद्र की ओर से जारी होने वाले फंड में अपने हिस्से को लेकर एक फ्रंट बना दिया था, जिससे केंद्र सरकार भी बड़ी चिंता में पड़ गई थी। बाद में जब देश की हिंदी बेल्ट में भी क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व बढ़ा, तो इस तरह के मुद्दे इस इलाके में भी उठने लगे। क्षेत्रीय अस्मिता के कई रूप भी रहे हैं। कहीं चेहरे के नाम पर यह कार्ड खेला गया तो कहीं क्षेत्र के नाम पर। कहीं-कहीं प्रांत को खास दर्जा देने की मांग भी हाल के सालों में अहम मुद्दा बनी रही है। इसने भी क्षेत्रीयता की जंग को बढ़ाने का काम किया है। बिहार, ओडिशा, आंध्र प्रदेश सहित कई राज्य पिछड़ेपन या वक्त की जरूरत बताकर अपने राज्य को स्पेशल स्टेटस देने की मांग करते रहे हैं। इस मांग का आशय उस राज्य को मिलने वाले बजट से होता है, लेकिन हकीकत में देखें, तो यह मुद्दा भी क्षेत्रीयता की जंग में तब्दील होता जा रहा है। 2015 में बिहार विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार की ओर से बिहार स्वाभिमान का मुद्दा उठाया गया था।
अस्मिता का मोदी प्रयोग : दिलचस्प बात है कि आज जिस क्षेत्रीयता के मुद्दे पर क्षेत्रीय दल मोदी फैक्टर को काउंटर करना चाहते हैं, उस राजनीति में कभी प्रधानमंत्री मोदी ने बतौर गुजरात सीएम महारत हासिल कर रखी थी। गुजरात में उन्होंने राज्य की अस्मिता का मुद्दा उठाकर बड़ी राजनीतिक सफलता हासिल की थी। उन्होंने खुद के काम को 2007 के विधानसभा चुनाव में गुजराती अस्मिता से जोड़ते हुए पहली बार इस दांव का सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया था। जानकारों के अनुसार ऐसे मुद्दे हमेशा राष्टÑीय दलों को परेशान करने वाले होते हैं। जिस दल की सरकार केंद्र में रहती है, उसे भी ऐसे मुद्दे मुश्किल में डालते हैं। लेकिन क्षेत्रीय दलों को इसमें भावना भड़काकर वोट लेने में आसानी होती है। कोई भी राष्टÑीय दल किसी क्षेत्रीय मुद्दे पर साफ स्टैंड नहीं ले सकता, क्योंकि इसके असर बहुआयामी होते हैं। वहीं क्षेत्रीय दल के लिए यह अवसर की तरह होता है। चूंकि देश में क्षेत्रीय दल अभी संघर्ष के दौर से गुजर रहे हैं, इसलिए वे क्षेत्रीयता का दांव चलकर वोट बटोरने का रास्ता अपना सकते हैं। वहीं बीजेपी पूरे देश में राष्टÑवाद, आक्रामक हिंदूवाद जैसे मुद्दे को स्थानीय स्तर तक स्थापित करने में सफल रही है। इसका लाभ पार्टी को चुनाव दर चुनाव मिल भी रहा है। ममता बनर्जी की बीजेपी के इस कार्ड को क्षेत्रीयता जैसे मुद्दे से काउंटर करने की रणनीति कहां तक सफल होगी, वह अगले कुछ महीनों में देखने को मिल सकता है।

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