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“बस” हे राजनीति

प्रेम शंकर

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भारत ही नहीं पूरी दुनिया कोरोना वायरस से जूझ रही है। करीब दो माह से पूरे देश में लॉकडाउन है। भूख, बेरोजगारी से जूझ रही कामगारों की बड़ी आबादी सड़कों पर जिंदगी की जंग लड़ रही है। ऐसी विकट घड़ी में अपेक्षा के विपरीत मजदूरों का दर्द भी राजनीति से अछूता नहीं बचा। यूपी-राजस्थान बॉर्डर पर उत्तर प्रदेश सरकार और कांग्रेस के बीच मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचाने को लेकर जमकर नूरा-कुश्ती चली। नतीजा हुआ जिनके दर्द बांटने पर राजनीति हुई, बॉर्डर पर वह तबका ठगा महसूस करते दर्द का एक और बोझ उठाकर ‘अपनी जंग-अपने भरोसे’ लड़ने को कूच करता चला गया। चार दिन चले इस पूरे राजनीतिक ड्रामे के बीच सवाल है कि राजनीति कौन करता रहा? सवाल है कि आखिर मजदूरों के लिए बस क्यों नहीं चली? बसें बॉर्डर पर खड़ी रहीं, लेकिन प्रवासी मजदूरों का पैदल संघर्ष जारी रहा, तो वहीँ प्रियंका गांधी और योगी सरकार के बीच बसों को लेकर नाक की लड़ाई जारी रही। प्रियंका गांधी ने योगी सरकार की उत्तर प्रदेश परिवहन निगम 20,000 बसे मजदूरों को धोने में क्यों नहीं लगाई। योगी सरकार ने कांग्रेस को घेरा के कांग्रेस राजनीति कर रही है कांग्रेस शासित प्रदेशों में यह काम क्यों नहीं किया। उत्तर प्रदेश सरकार के मंजूरी के बाद कांग्रेस ने 1000 से अधिक बसों का जो विवरण मुहैया कराया उनमें कुछ दोपहिया वाहन, एंबुलेस और कार के नंबर भी थे। कांग्रेस ने कहा कि उसकी ओर से मुहैया कराई गई सूची में उत्तर प्रदेश सरकार ने खुद 879 बसों के सही होने की पुष्टि की है और उसे अब इन बसों को चलाने की अनुमति प्रदान करते हुए मजदूरों को मंतव्य स्थान पर पहुंचाने का काम करना चाहिए। प्रियंका गांधी ने कहा कि अगर लिस्ट में कुछ गड़बड़ी है उन्हें छोड़कर बाकी सही बसें हैं उन्हें चलने दें। इससे राह चलते लोगों को मदद मिलेगी। इसके बाद कांग्रेस ने 200 बसें और भेजी लेकिन जो भी सरकार ने ठान लिया था इसका श्रेय हम कांग्रेस को लेने नहीं देंगे प्रियंका गांधी ने यह भी कहा की बसों पर बीजेपी का स्टिकर चिपका ले लेकिन बसों को मजदूरों को गंतव्य स्थान तक पहुंचाने का कार्य करें। महामारी के दौर में भूखे को भोजन और कामगारों को काम देने के वादे तो खूब किए गए, लेकिन चिलचिलाती गर्मियों में सुनसान सड़कों पर घिसट-घिसट कर बच्चों और बुजुर्गों को लेकर चलते प्रवासियों को देखकर कैसे मान लिया जाय कि वादे और दावे सच हैं। प्रियंका गांधी और योगी सरकार के बीच रोजी और रोटी का विवाद नहीं था। विवाद ये चल रहा था कि प्रवासियों को घर पहुंचाने के लिए बसें देनी है या नहीं? पहले ट्वीट-ट्वीट हुआ? फिर चिट्ठी-चिट्ठी। फिर प्रियंका गांधी के निजी सचिव पर एफआईआर की गई कुछ बसों के गलत नंबर देने पर, लेकिन बस है कि चली ही नहीं। कांग्रेस ने सड़कों पर पैदल सफर कर रहे मजदूरों की मदद के लिए यूपी सरकार को पत्र लिखा तो, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मजदूरों की मददगार बनने का स्वांग रचने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस पर जोरदार हमला किया और जवाब में चार सवाल पूछे। सड़क हादसे का हवाला देते हुए योगी ने पूछा प्रियंका वाड्रा जी को हमारी इतनी ही चिंता है तो वह हमारे बाकी साथियों को भी ट्रेनों से ही सुरक्षित भेजने का इंतजाम कांग्रेस शासित राज्यों से क्यों नहीं करा रहीं? खबर आई कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रियंका गांधी के प्रस्ताव को मंजूरी देते हुए हुए 1000 बसों का इंतजाम करने को कहा। साथ ही यह भी कहा गया कि वे बसों के नंबर्स के साथ-साथ चालक/परिचालक (ड्राइवर-कंडक्टर) की जानकारी भी मुहैया कराएं। कुछ ही देर में कांग्रेस की ओर से जवाब भी आ गया। इसमें बताया गया कि बसों के नंबर मेल में अटैच हैं। फिर यूपी सरकार की ओर से जब इन नंबरों की जांच की गई तो इनमें से कई गाड़ियों के नंबर तो मोटरसाइकल, स्कूटर, थ्री व्हीलर के मिले। इस घटना पर योगी सरकार की ओर से नाराजगी भी जताई गई। प्रश्न यह है कि आपदा की घड़ी में कुछ कागजों के बिना भी गाड़ियों को ले जाने की परमिशन की जा सकती है , जो बसें चनले की हालत में नही थी उसको छोड़कर। भारत सरकार ने भी 30 जून तक राहत देते हुए बीमा आदि कुछ कागजातों के बिना पर परिचालन नहीं रोकने का निर्देश दिया था।

राजनीतिक वार-पलटवार के बीच एक और खबर आई कि 879 बसों में भी कई ऐसे वाहन हैं, जिनमें अलग-अलग खामियां है। इनमें 79 गाड़ियों की फिटनेस समाप्त हो चुकी है। यही नहीं 140 गाड़ियों का तो बीमा खत्म हो चुका है। उधर, 78 गाड़ियों की फिटनेस और बीमा दोनों खत्म हो गया है। ऐसे में खामियों वाली कुल गाड़ियों की संख्या 297 है। लेकिन, राजनीतिक घटनाक्रम में आम नागरिक के दर्द और उसके नजरिये से देखा जाय तो बस पर चले राजनीतिक ड्रामे से मजदूर का न इत्तेफाक ही रखना था, न उनका भला होना था। राजनीति में संवेदना और संजीदगी नहीं दिखी। दिगर बात है कि इस पूरे मामले में किसे कितना राजनीतिक लाभ हुआ? भले ही राजनीतिक चश्मे से कांग्रेस ने मजदूरों के लिए बसों का इंतजाम किया हो, लेकिन यूपी की योगी सरकार की संवेदनहीनता जरूर उजागर हुई। बसों की फिटनेस जांच बाद में भी की जा सकती थी, या जो बसें सही थीं उनसे मजदूरों को भेजना पहला कर्तव्य बनता था। सामने खड़ी बसों को निहारते थके हारे सफर जारी रखने को विवश ये भारत के वो लोग थे, जो इस देश की रीढ़ हैं। जिनके खून-पसीने से ये देश चलता है। इनके प्रति सबकी जिम्मेदारी है। विपदा की इस घड़ी में मजदूरों का दर्द किसी को नहीं दिखा मजदूर सड़क पर पैदल चलते रहे, लेकिन बसें नहीं चली। राजनीतिक ड्रामे का कड़वा सच रहा कि मजदूरों का दर्द और बढ़ गया। राजनीतिक विवाद में मजदूर पिसे। दर्द, मानवता, संवेदना सब हारी, राजनीति जीती। इस विवाद के बाद भी बस विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। अब नया विवाद कोटा से यूपी गए छात्रों के बस किराये को लेकर यूपी सरकार ने हवा दे दी है। इससे मजदूरों के प्रति संवेदना के मामले में योगी सरकार कटघरे में है। भाजपा नेताओं और सरकारों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सीख लेनी चाहिए, कि अम्फान से हुई क्षति के बाद तत्काल पश्चिम बंगाल पहुंच गए और पश्चिम बंगाल को 1000 करोड़ और उड़ीसा को 500 करोड़ की आर्थिक मदद दी। इसी तरह यदि योगी सरकार भी पहले मजदूरों को खड़ी रह गई बसों से भेजकर कांग्रेस पर सवाल उठाती तो बस के मुद्दे पर उसकी फजीहत नहीं होती।

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