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बाबू जगजीवन राम : अतुलनीय व्यक्तित्व

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आज पड़ोसी देशों मसलन पाकिस्तान, नेपाल और चीन के साथ विवाद अपने चरम पर है। पाकिस्तान रोजाना संघर्ष विराम का उल्लंघन कर गोलीबारी तथा आतंकवादियों की घुसपैठ कराने से बाज नहीं आ रहा है, वहीं लद्दाख में चीन के साथ सीमा विवाद के दौरान हिंसक संघर्ष में बीस भारतीय जवानों के शहीद होने के बाद दोनों देशों में तनाव शीर्ष पर है। यहां तक कि सीमा पर दोनों देशों की ओर से सेना और सैन्य सरंजाम की तैनाती बढ़ा दी गयी है। वहीं नेपाल भी कालापानी नामक स्थान को लेकर तथा अपने नये भू नक्शे को लेकर अड़ा हुआ है तथा पहली बार उसने भारतीय सीमा के पास अपनी सेना को तैनात किया है। ऐसी विषम परिस्थितियों के बीच भारतीय राजनीति के एक ऐसे व्यक्ति की स्मृति स्वाभाविक है, जिसके स्वतंत्र भारत की राजनीति के इतिहास में उसके अवस्थान के संबंध में निःसंकोच कहा जा सकता है- ‘न भूतो न भविष्यति। बाबूजी के नाम से सुपरिचित बाबू जगजीवन राम भारतीय राजनीति के ऐसे देदीप्यमान व्यक्तित्व हैं, जिनकी तुलना अन्य किसी राजनीतिज्ञ से की ही नहीं जा सकती है। ‘अजातशत्रु और अजेय’ भांति बाबूजी ने चार दशक से भी अधिक समय तक संसदीय चुनाव में अपराजित रहते हुए एक ऐसा अनुपम उदाहरण देश के सामने रखा, जो संसदीय राजनीति के लिए अनुकरणीय है। 5 अप्रैल, 1908 को बिहार के आरा के पास चंदवा के एक गांव में जन्म बाबू जगजीवन राम सन 1937 में भाषायी आधार पर उड़ीसा (वर्तमान ओडिशा) के अलग होने के बाद बिहार विधानसभा में पहली बार सदस्य चुने गए। इसके पूर्व बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के एक छात्र के रूप में उन्होंने जातिगत भेदभाव का सामना किया था। दलितों और वंचितों के प्रति उपेक्षा की इस दुर्भावना ने बाबू जगजीवन राम को प्रेरित किया कि वे देश में दलितों के उत्थान के लिए स्वयं को समर्पित करें। बाबूजी ने सन 1935 में अखिल भारतीय दलित वर्ग संघ की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सन 1940 में महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन और सन 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान वे कई बार जेल गए। सन 1946 में वह पंडित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल में सबसे कम उम्र के मंत्री बने और भारतीय राजनीति के प्रमुख व्यक्तियों में शामिल हुए। बाबूजी ने सन 1946 में जेनेवा में श्रम सम्मेलन में भाग लिया। बाबूजी ने 1946-1986 तक 40 वर्षों तक संसद में निर्बाध प्रतिनिधित्व का विश्व रिकार्ड बनाया। जगजीवन बाबू के नाम 31 वर्षों तक केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री और उपप्रधानमंत्री के रूप में सेवा देने का अनूठा रिकार्ड भी है। अपनी उल्लेखनीय प्रशासनिक क्षमता के साथ उन्होंने न केवल राष्ट्र-निर्माण की चुनौतियेें का प्रभावी ढंग से सामना किया बल्कि उन मंत्रालयों को भी सुव्यवस्थित किया, जिनका उन्हें प्रभार सौंपा गया था। बाबूजी ने श्रम मंत्रालय, रेलवे, कृषि, परिवहन, संचार मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का प्रभार संभाला तथा देश में कई क्रांतिकारी बदलाव लाए। ‘हरित क्रांति’ ‘आरक्षण’ ‘कर्मचारी भविष्य निधि, न्यूनतम वेतनमान, कार्य के घंटे, फैक्टरी कानून’ जैसे कई महत्वपूर्ण कानून उन्होंने बनवाए आैर पारित करवाए। आज पाकिस्तान तथा पड़ोसी देश चीन के अतिरिक्त नेपाल के साथ ‘कालापानी’ को लेकर सीमावर्ती नक्शे पर तनातनी है। पाकिस्तान लगातार सीमा संघर्ष विराम का उल्लंघन करते हुए भारतीय सीमा में आतंकवादियों की घुसपैठ करा रहा है, वहीं भूटान के डोकलाम के बाद चीन अब लद्दाख में सीमा पर सैन्यबल बढ़ाते हुए तनाव उत्पन्न कर रहा है। ऐसे समय में बतौर रक्षा मंत्री (27 जून, 1970 से 10 अक्टूबर, 1974 तक) बाबू जगजीवन राम का कार्यकाल स्वभाविक तौर पर याद आ जाता है। बाबूजी को पाकिस्तान के खिलाफ भारत की ‘निर्णायक’ जीत का श्रेय दिया जाता है। बांग्लादेश के निर्माण के लिए हुआ युद्ध ऐसा पहला युद्ध था, जिसे भारत ने जीता। गौरतलब है कि जब बाबूजी ने जून, 1970 में रक्षा मंत्रालय का कार्यभार संभाला था, तब उनके सामने आने वाले इस कठिन कार्य की तैयारी के लिए महज 17 महीने का समय था। बलों का मनोबल बढ़ाना था और सेना की महत्वपूर्ण कमियों को भी पूरा करना था। बाबूजी ने इस कार्य को सही तरीके से किया।
वह देश के चारों ओर, हर सीमा चौकी तक गए और कहा, ‘ हम लड़ने नहीं जा रहे हैं क्योंकि हमारे पास हमला करने का इतिहास, संस्कृति और परम्परा नहीं है। हमारा आधिपत्यवादी इतिहास नहीं है, लेकिन अगर युद्ध हम पर थोपा जाता है तो युद्ध भारतीय जमीन पर नहीं होगा। हम दुश्मन को पीछे धकेल देंगे और युद्ध भारतीय जमीन पर नहीं होगा। हम दुश्मन को पीछे धकेल देंगे और युद्ध उनकी धरती पर होगा।’ यही वास्तव में सशस्त्र बलों का मनोबल बना और यही ‘निर्णायक’ जीत का कारण बना। हमें अच्छी तरह याद है कि जब पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के लोग पाकिस्तानी सेना के उत्पीड़न के खिलाफ विद्रोह में उठे और भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध छिड़ गया तो उन्होंने अदम्य साहस, दुर्लभ दूरदर्शिता दिखाई और युद्ध को सफल निष्कर्ष पर ले गए। हालांकि, शुरू में वे युद्ध के पक्ष में नहीं थे, फिर भी, वे चाहते थे कि न्याय हो, क्योंकि पाकिस्तानी सैनिकों ने बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर नरसंहार किए और भारत पर भी हमले किए। ‘बांग्लादेश मुक्ति संग्राम’ के लिए बांग्लादेश मुक्ति मोर्चा के आंदोलनकारियों और भारतीय सेना की एक ‘संयुक्त कमान’ के निर्माण में भी बाबूजी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस कालक्रम में जगजीवन बाबू ने संसद में दो महत्वपूर्ण घोषणाएं की। 21 अक्टूबर 1971 को उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के साथ कोई भी युद्ध पाकिस्तानी जमीन पर लड़ा जाएगा और संघर्ष के दौरान कब्जे वाले क्षेत्रों को भारत खाली नहीं करेगा। 4 दिसंबर को उन्होंने संसद को बताया कि भारतीय वायु सेना ने पाकिस्तानी वायु हमलों का जवाब दिया है, जो पश्चिम पाकिस्तान द्वारा 3 दिसम्बर को शुरू हुए हमलों के जवाब में किए गए। बाबूजी ने कहा, ‘हमारे सैनिकों, हमारे जवानों, हमारे अधिकारियों को अपनी मातृभूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। वे वास्तव में किसी अन्य भूमि के लिए सर्वोच्च बलिदान करने और चुनौती देने के लिए प्रशिक्षित नहीं किए गए हैं। अगर दूसरे देश्ा के लिए उन्हें ऐसा करना पड़ रहा है तो उनके मनोबल को बढ़ावा देना होगा। यह बड़ी चुनौती है और हमारे सशस्त्र बलों को इसके लिए तैयार रहना होगा।’ युद्ध के दौरान, उन्होंने हर दूसरे या तीसरे दिन संसद को जानकारी दी और सार्वजनिक वक्तव्य दिए। उन्होंने ऐसा जनमत बनाने और जनप्रतिनिधियों को यह बताने के लिए किया कि सीमाओं पर क्या हो रहा है और राष्ट्र कैसे युद्ध के लिए तैयार है। उनका यह संबोधन भारत में हर व्यक्ति तक पहुंच रहा था- चाहे वह शहर हो या ग्रामीण क्षेत्र। उसे मालूम था कि उसे डरने की कोई बात नहीं है और राष्ट्र इस अवसर पर एकजुट हो उठेगा और इसे ऐतिहासिक युद्ध बना देगा। बाबूजी ने ऐसा माहौल बनाया और यही उनकी महान कार्यशैली थी। बाबूजी ने एक बार अपनी सुपुत्री मीरा कुमार से कहा था कि सुरक्षा बल के जवान सर्वोच्च बलिदान देते हैं और यह कि ‘आप अगर किसी आैर के प्रति सम्मान में खड़े नहीं हो सकते हैं, लेकिन आप किसी सैनिक को देखते हैं तो खड़े होकर इनका सम्मान करें।

बाबूजी ने सशस्त्र बालों के मनोबल को बढ़ाने की कोशिश की, जो पहले से ही तीन युद्ध झेल चुके थे। उन्होंने महसूस किया कि भारत की रक्षा केवल सेना के लिए और सीमा की रक्षा करने के बारे में नहीं थी। इसका यह भी मतलब था कि देश्ा का हर नागरिक देश्ा आैर उसके सम्मान की रक्षा के लिए उठे। अपने स्वयं के बलों के साथ लगातार संपर्क में रहने के दौरान उन्होंने बांग्लादेश मुक्ति वाहिनी के संग्रामियों के साथ बातचीत की कि भारत कैसी सहायता प्रदान कर सकता है। बांग्लादेश युद्ध इस मायने में भी अनूठा था कि यह पहली बार थ्ाा कि नौसेना भी इसमें लगी हुयी थी। एक अन्य भूमि पर समन्वय, रसद और कमांड को निरंतर प्रभावी बनाए रखने के साथ हथियारों और गोला-बारूद की आपूर्ति और संदेशों को भेजने का सटीक प्रबंध किया जाना अत्यावश्यक था। वास्तव में 90,000 पाकिस्तानी फौजियों के साथ्ा जनरल नियाजी का आत्मसमर्पण भारत के उत्कृष्ट संचार कौशल के कारण हुआ था। बाबूजी भी जनरल सैम मानेकशॉ (जो बाद में फील्ड मार्शल बने), जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा, जनरल एसएम नंदा और जनरल पीसी लाल के साथ लगातार संपर्क में रहे। भारतीय सेना ने तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी अधिकारियों और उनकी सेना को पूरी तरह से अलग कर दिया थ्ाा। इस दौरान समाचार पत्रों और टेलीविजन में रिपोर्ट आई कि अमेरिका ने सातवें बेड़े को वियतनाम से बंगाल की खाड़ी में मोड़ दिया था और देश्ा के बहुत से लोग चिंतित हो गए। हालांकि इससे बाबूजी प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने कहा, ‘वियतनाम के लोगों ने चावल आैर पानी खाया है आैर उनके पास हथियार और गोला-बारूद नहीं थे। फिर भी वे सातवें बेड़े का मुकाबला करने में सक्षम थे। हम भी ऐसा ही करेंगे।’ बाबूजी को मानवीय भावना और इच्छाशक्ति पर बहुत विश्वास थ्ाा और यह 1971 के युद्ध में विजय का केंद्रीय कारक थ्ाा। रक्षा विश्लेष्कों और सैन्य दिग्गजों ने जगजीवन राम की युद्ध के दौरान उनके नेतृत्व के लिए काफी सराहना की थ्ाी। उनके पास सैन्य रणनीति की उत्कृष्ट समझ थी। बाबू जगजीवन राम ने एक सक्षम प्रशासक होने के नाते यह सुनिश्चित किया कि जनशक्ति, हथियार, उपकरण और अवसंरचनात्मक सुविधाओं के संदर्भ में तीनों सेवाओं की आवश्यकताएं, जहां तक संभव हो प्रदान की जाएं।’
आज पड़ोसी राष्ट्रों के साथ जारी सीमा विवादों के दौर में बाबू जगजीवन राम अप्रतिम उदाहरण हैं कि देश्ाहित में किसी राजनयिक को किस प्रकार अपनी रणनीति तैयार करनी चाहिए। आज उनकी पुण्यतिथि देशवासियों को उनके दर्शाए मार्ग पर आगे बढ़ते रहने को प्रेरित करती है।

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