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बाल स्वास्थ्य स्क्रीनिंग, प्रबंधन और प्रारंभिक प्रयास या राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम : बच्चों से जुड़ने की एक अनूठी अवधारणा

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डॉ अरुण कुमार सिंह
यह कई शिशुओं की कहानी है: परनेवा की मीर आसिफा, खानसाहिब, जिला बुडगा; पट्टन का इरफान, जिला बारामूला; बनिहाल का खान मुस्किल, जिला रामबन; गांव कलसोट की सरस्वती, पंचराई, जिला उधमपुर; ब्लॉक बशोली की हाफिया; उधयनपुर का मुराद, जिला डोडा; सोपोर का भट हुकूमत, जिला बारामूला। इन सभी बच्चों के पास बताने के लिए एक साझा कहानी है। वे सभी अपने माता-पिता के लिए खुशियों के रूप में पहुंचे जब वे महीनों तक धैर्यपूर्वक इंतजार के बाद पैदा हुए थे। हालांकि, धरती पर आने के कुछ ही समय बाद, खुशी दर्द में बदल गयी, मुस्कुराते हुए चेहरों में बीमारी की झलक दिखने लगी, उनके माता-पिता तनावग्रस्त और चिंतित हो गए। शिशुओं को तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता थी, जिसका बोझ माता-पिता नहीं उठा सकते थे या इस बात से अनभिज्ञ थे कि कहां जाना है और सेवाओं तक कैसे पहुंचना है। समय, जीवन और मृत्यु एवं आजीवन विकलांगता को स्वीकार करने के लिए मजबूर एक वयस्क तथा स्वस्थ हंसमुख, बुद्धिमान युवा बनने के बीच एक महत्वपूर्ण आयाम है। क्या हम माता-पिता को सिखाते हैं कि इसे एक पहले से तय घटना के रूप में स्वीकार करें या क्या हम बच्चे के साथ खड़े हैं और उन्हें अपने सपनों को प्राप्त करने में उनकी मदद करते हैं? हालांकि, वक्त ने रहम दिखाया और सभी बच्चों को प्रतिष्ठित संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण उपचार मिला, उन्हें आधुनिक चिकित्सा का लाभ मिला और वे अपनी भूमि की सुंदरता का आनंद लेने में सक्षम हो गए। अब वे किसी भी अन्य बच्चे की तरह सामान्य जीवन का आनंद ले रहे हैं। माता-पिता ने राहत की सांस ली है। अन्यथा वे रंगों की विविधता को देखने, बारिश का संगीत सुनने, दूर बादलों के गरजने और पक्षियों के चहकने को सुनने की खुशी से वंचित रह जाते। वे देख सकते हैं, वे सुन सकते हैं और वे सपने भी देख सकते हैं। ये जम्मू और कश्मीर के 258 बच्चों में से कुछ की सच्ची कहानियां हैं, जिन्हें पिछले एक साल में तृतीयक विशेषज्ञ (सुपर स्पेशलिस्ट) सेवाओं के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत जल्दी पहचाना गया और प्रबंधित किया गया। ( केवल बच्चों के नाम बदल दिए गए हैं)। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यकम (आरबीएसके) एक अनोखा कार्यक्रम है, जिसे पूरे देश में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत लागू किया जा रहा है। इसका उद्देश्य आर्थिक स्थिति, जाति, पंथ या धर्म का कोई भेदभाव नहीं करते हुए बच्चों के जीवन की समग्र गुणवत्ता में सुधार लाना और व्यापक देखभाल करना है। समतामूलक और सुलभ तरीके से तथा शून्य लागत पर बच्चों के चिकित्सा प्रबंधन को प्राथमिक, द्वितीयक या तृतीयक केंद्र से जोड़ा जाता है। व्यापक उद्देश्य यह है कि बच्चे को उसकी आनुवांशिक क्षमता तक पहुंचने में सहायता प्रदान की जाये और एक बच्चे के मस्तिष्क के विकास के महत्वपूर्ण समय के दौरान जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप किया जाये। इस कार्यक्रम की विशिष्टता यह है कि इसमें समुदाय और सुविधा दोनों घटक जुड़े हुए हैं, लोगों के लिए सरल है तथा विज्ञान को ध्यान में रखते हुए आधुनिक और पारंपरिक दवाओं को एक साथ लाया गया है। फार्मासिस्ट और नर्स के साथ आयुष डॉक्टरों की टीम के नेतृत्व में सामान्य चिकित्सक द्वारा सिर से पैर तक की व्यापक स्क्रीनिंग की जाती है, लेकिन प्रबंधन विशेषज्ञ द्वारा ही किये जाते है। आपको (माता-पिता) सिखाया जाता कि बच्चे की समग्र रूप से जांच करें और आपको किसी विशेष अंग पर केंद्रित विशेषज्ञ (सुपर स्पेशलिस्ट) की तरह जांच नहीं करनी है। आप गुणवत्ता प्रबंधन हेतु एक विशेषज्ञ (सुपर स्पेशलिस्ट) को शामिल करने के लिए स्वतंत्र है, भले ही विशेषज्ञ निजी क्षेत्र में उपलब्ध हों या दूसरे राज्य के हों; इस स्थितियों में भी माता-पिता को लागत वहन नहीं करना पड़ता है। इस कार्यक्रम में बच्चों के अन्य कार्यक्रमों को एकीकृत करने की क्षमता है। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यकम (आरबीएसके) एक पहल है, जिसके अंतर्गत जन्म से लेकर 18 वर्ष तक के बच्चों के रोगों की जल्दी पहचान करने व इसका निदान करने पर जोर दिया जाता है। इसके लिए 4 डी पर विशेष ध्यान दिया जाता है – रोग, कमियां, जन्म के समय दोष, विकलांगता सहित विभिन्न स्वास्थ्य स्थितियों से विकास में देरी। जन्म दोष और विकासात्मक देरी पर पहली बार ध्यान केंद्रित किया गया है। एक छोटे बच्चे की बुद्धि की रचना के लिए जन्म के बाद 700,000 कनेक्शन प्रति सेकंड की उच्च गति से न्यूरॉन्स या तारें जुड़ती हैं। 2 वर्ष की आयु में मस्तिष्क का आकार, वयस्क के लगभग 90% आकार को प्राप्त कर लेता है। यह अवधि बच्चे के लिए महत्वपूर्ण होती है। इस अवधि के दौरान मौजूदा डॉक्टरों / नर्सों द्वारा सभी स्वास्थ्य सुविधाओं के तहत दिखाई पड़ने वाले और कार्यात्मक संबंधी दोषों के लिए सभी नवजात शिशुओं की स्क्रीनिंग पर विशेष जोर दिया जाता है और घर पर नवजात देखभाल (होम बेस्ड बॉर्न केयर, एचबीएनसी) के एक हिस्से के रूप में जन्म के 6 सप्ताह के भीतर, आशा कार्यकतार्ओं द्वारा घर जाकर स्क्रीनिंग की जाती है। विशिष्ट देखभाल का दूसरा भाग शरीर और मस्तिष्क दोनों के इष्टतम विकास पर केंद्रित है। नवजात में किसी भी विकास संबंधी देरी की पहचान करने तथा बच्चे के संज्ञानात्मक विकास में सुधार के लिए हर गर्भवती मां को एक एमसीपी (मदर एंड चाइल्ड प्रोटेक्शन कार्ड) दिया जाता है। बच्चे को मिलने वाला तात्कालिक वातावरण, बच्चे के मस्तिष्क के विकास में निर्णायक भूमिका निभाता है। बच्चे की देखभाल की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय ने प्रारंभिक बाल विकास या ईसीडी को एक नए कार्यक्रम के रूप में पेश किया है। यह कम लागत के निदान / हस्तक्षेप से संबंधित है। इसमें बच्चे के शुरूआती 1000 दिनों (270 दिन माता के गर्भ में और जन्म के बाद पहले वर्ष के 365 दिन और दूसरे वर्ष के 365 दिन) के दौरान कम लागत के निदान के साथ बच्चे की देखभाल की जाती है तथा इसमें आधुनिक और पारंपरिक-दोनों सर्वोत्तम प्रथाओं को शामिल किया गया है। यह घर में बच्चों के देखभाल कार्यक्रम (एचबीवाईसी) से भी जुड़ा हुआ है और इसमें आशा कार्यकर्ताओं द्वारा दी जाने वाली प्रारंभिक बाल विकास सेवाएं भी शामिल हैं। इसके तहत 6 महीने के नियमित अंतराल पर प्रत्येक ब्लॉक में मौजूद मोबाइल स्वास्थ्य टीमों द्वारा व्यापक स्क्रीनिंग की जाती है। आयुष डॉक्टरों के नेतृत्व में 6 सप्ताह से 6 वर्ष तक के बच्चों के लिए स्थानीय आंगनवाड़ियों केंद्रों पर स्क्रीनिंग की जाती है। इसके अलावा, सभी सरकारी स्कूलों में 6-18 साल के बच्चों की वार्षिक स्क्रीनिंग की जाती है। जन्म से 6 वर्ष तक के बच्चों में विकासात्मक देरी समेत किसी भी स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे की पहचान के बाद, बच्चे को इलाज के लिए जिला प्रारंभिक हस्तक्षेप केंद्र (डीईआईसी) भेजा जाता है। यहां बच्चे को बाल रोग विशेषज्ञ, दंत चिकित्सक, फिजियोथेरेपिस्ट, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, आॅडियोलॉजिस्ट सह वाक शक्ति रोगविज्ञानी, बाल रोग विशेषज्ञ, नेत्र रोग विशेषज्ञ (आंशिक समय), प्रारंभिक हस्तक्षेपवादी, पोषण विशेषज्ञ सभी की सेवाएं मिलती हैं। 6-18 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों में, उनके स्वास्थ्य की स्थिति को मौजूदा सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के माध्यम से प्रबंधित किया जा सकता है। डीईआईसी दोनों आयु समूहों के लिए रेफरल लिंकेज के रूप में कार्य करेगा। यह कार्यक्रम राज्यों को निजी अस्पतालों की सेवाओं का उपयोग करने की सुविधा देता है, जिन्होंने जन्मजात हृदय रोग, स्पष्ट तालु आदि जैसी स्थितियों के उपचार के लिए राज्य सरकारों के साथ समझौता किया है। यह उपचार नि:शुल्क है और इससे इलाज के लिए होने वाले कुल खर्च में कमी आती है। आंगनबाड़ी केंद्र में 6 साल तक के बच्चों की स्क्रीनिंग की सुविधा के लिए महिला और बाल विकास मंत्रालय के साथ नेटवर्किंग की गयी है और इसमें बच्चे के नामांकन को जरूरी नहीं माना जाता है। इसी तरह स्कूलों में बच्चों की स्क्रीनिंग के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय के साथ नेटवर्किंग की गयी है। जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 230 समर्पित आरबीएसके मोबाइल हेल्थ टीम (एमएचटी) हैं, जिनमें से 210 टीमें जम्मू और कश्मीर में एवं 20 टीमें लद्दाख में मौजूद हैं। इसके अलावा इन दोनों संघ शासित प्रदेशों में 15 डीईआईसी कार्य कर रहे हैं। दोनों संघ शासित प्रदेशों में सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में कुल 14.39 लाख बच्चे नामांकित हैं। स्क्रीन किए गए सभी बच्चों के पास आरबीएसके स्क्रीनिंग कार्ड होते है, जिसमें उनकी व्यक्तिगत स्वास्थ्य जानकारी एमएचटी द्वारा दर्ज की जाती है। इन कार्डों को संबंधित स्कूलों में सुरक्षित रखा जाता है, ताकि अगले वर्ष आने वाली वाली टीम को आसानी हो। वर्ष 2019-20 के दौरान, स्कूल के बाधित सत्र और कोविड -19 महामारी के बावजूद, जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख में एमएचटी द्वारा स्कूलों में 11.61 लाख बच्चों की स्क्रीनिंग की गई थी। इनमें से 10% (1.08 लाख) की पहचान 4 डी के साथ की गई और लगभग 68 हजार बच्चों को उच्च स्तर की देखभाल के लिए भेजा गया।
इनमें से 38% ने सेवाओं का लाभ उठाया। यह पिछले वर्ष की तुलना में अधिक है जब केवल 33% ने इन रेफरल सेवाओं का लाभ उठाया था। सेवा प्रावधान की गुणवत्ता में भी सुधार हुआ है। इससे पता चलता है कि रेफरल की गुणवत्ता में सुधार हुआ है क्योंकि टीमों द्वारा अनुवर्ती प्रयास किए गए हैं। इससे यह भी पता चलता है कि जम्मू और कश्मीर एवं लद्दाख के पहाड़ी इलाकों तथा खराब मौसम के बावजूद, समर्पित मोबाइल हेल्थ टीमों द्वारा स्कूलों में बच्चों की जांच की गई। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2019-20 में एमएचटी द्वारा आंगनवाड़ी केंद्रों में 0-6 वर्ष की आयु के 8.8 लाख बच्चों की जांच की गई। जम्मू और कश्मीर की बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं में प्राथमिक, माध्यमिक और तृतीयक स्तर के संस्थानों पर विशेष ध्यान देने से सुधार हुआ है। संस्थानों के समग्र विकास को सुनिश्चित करने के लिए निधियों का विवेकपूर्ण उपयोग किया गया है ताकि आधारभूत संरचना, उपकरण, श्रमशक्ति इत्यादि के संदर्भ में रोगी की देखभाल में सुधार हो सके। इससे आरबीएसके लाभार्थियों द्वारा रेफरल सेवाओं का उपयोग करना बेहतर हुआ है और कार्यक्रम की सफलता भी सुनिश्चित हुई है। इन सुविधाओं से केंद्र शासित प्रदेश स्वस्थ, खुश और बुद्धिमान लोगों की भूमि के रूप में परिवर्तित हो रहे हैं।
(लेखक एम्स, जोधपुर के नियोनेटोलॉजी विभाग प्रमुख और राष्ट्रीय सलाहकार राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय हैं)

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