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बिहार चुनाव: ओपनिंग में ही लड़खड़ाया विपक्ष

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बिहार विधानसभा चुनाव के तय समय पर होने की संभावना के बीच अब राज्य में कोरोना संकट के दौरान ही तमाम दलों के नेता सियासी पिच पर उतरने लगे हैं। बंद कमरों में सही, चुनाव से पहले समीकरण को अंतिम रूप दिया जाने लगा है। चुनाव आयोग राज्य में चुनाव के बारे में सभी दलों की राय जानने के लिए सर्वदलीय मीटिंग भी बुला रहा है। इसमें राजनीतिक दल भी तय समय पर चुनाव कराने पर सहमति दे सकते हैं। आयोग ने पहले ही कोरोना काल में चुनाव कराने के लिए एहतियाती कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। इसी क्रम में 65 साल से ऊपर के लोगों को पोस्टल बैलट से वोट करने की सुविधा दे दी गई है।
विरोधी दलों की कठिन है डगर : अगर तय समय पर चुनाव हुए तो तीन महीने के अंदर वहां इसकी प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। ऐसे में राजनीतिक दलों की तैयारी देखें तो चुनाव के 100 दिनों से भी कम रहने के बावजूद विपक्ष राज्य में न सिर्फ बिखरा हुआ है बल्कि अपने कुनबे को एक रखने के लिए भी उसे संघर्ष करना पड़ रहा है। पिछले दस दिनों के अंदर यूपीए की छोटी पार्टियों ने दो बार मीटिंग कर कांग्रेस और आरजेडी दोनों को अल्टीमेटम दिया है कि गठबंधन के स्वरूप को लेकर जल्द कोई फैसला करें नहीं तो वे कोई स्वतंत्र निर्णय ले सकते हैं। इन छोटे दलों में उपेंद्र कुशवाहा, जीतन मांझी और मुकेश सहनी की पार्टी है। तीन दिन पहले भी इन तीनों दलों के नेताओं ने आपस में मीटिंग कर कांग्रेस और आरजेडी पर दबाव बनाया है। जीतन मांझी नीतीश कुमार से भी संपर्क में हैं। वहीं कांग्रेस ने आरजेडी पर दबाव बनाते हुए कम से कम सौ सीट देने की मांग की है। लेकिन बात सिर्फ सीटों की नहीं है। आरजेडी राज्य में राजनीति के केंद्र में रहा है। पक्ष या विपक्ष में। लेकिन इस बार उसे यहां भी चुनौती मिल रही है। गैर आरजेडी विपक्षी गठबंधन के नेताओं का दबाव है कि तेजस्वी यादव गठबंधन के नेता न बनें। कांग्रेस के अंदर भी एक वर्ग इस बात को हवा दे रहा है। इन दलों का तर्क है कि तेजस्वी यादव के एनडीए के सामने रहने से मुकाबला कमजोर हो जाएगा। साथ ही आरजेडी के अंदर भी तेजस्वी यादव को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। सीनियर नेताओं में उनके प्रति असंतोष दिख रहा है। आरजेडी के कमजोर पड़ने से विपक्षी स्पेस में बड़ी हलचल दिखाई देने लगी है। कांग्रेस को भी लग रहा है कि यह राज्य में जनाधार बढ़ाने का मौका है। लेकिन पार्टी जिस हालत में है वहां, वह स्वतंत्र रूप से नहीं लड़ सकती। फिर भी पार्टी के नेता मानते हैं कि अगर कांग्रेस को खोया जनाधार पाना है तो बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ना होगा। उत्तर प्रदेश में पहले ही प्रियंका गांधी के नेतृत्व में पार्टी तैयारी शुरू कर चुकी है और नेताओं को लगता है कि बिहार में इस बार उनके सामने मौका है 2024 से पहले नई शुरुआत करने का। लेकिन सब कुछ तय होगा कांग्रेस के सर्वोच्च नेतृत्व के स्तर पर। सोनिया गांधी लालू प्रसाद के साथ गठबंधन की हमेशा हिमायती रही हैं। उधर तेजस्वी की अगुआई में आरजेडी को पता है कि इस बार सिर्फ चुनावी जीत-हार का नहीं बल्कि पार्टी के अस्तित्व का सवाल है। अगर पार्टी बेहतर प्रदर्शन करने में विफल रही तो फिर पार्टी की प्रदेश राजनीति में भी प्रासंगिकता गंभीर खतरे में पड़ जाएगी।
ड्राइविंग सीट पर फिलहाल नीतीश : विपक्ष के अंदर मची भगदड़ और अनिश्चितता को देखते हुए नीतीश कुमार की अगुआई में एनडीए ने इस बार 15 सालों की एंटी इनकंबेसी को टारगेट करने का फैसला किया है। इस फैसले के अनुरूप चुनाव प्रचार की थीम नीतीश नहीं तो कौन? का ही बना लिया गया है। नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू और बीजेपी दोनों लालू प्रसाद की पार्टी आरजेडी के 15 सालों के राज की याद दिलाकर वोट मांगने जा रही हैं। अगर नीतीश की अब तक की राजनीति को देखें तो हर बार वह नई थीम लेकर आते हैं। इस बार वह विकल्पहीनता पर अधिक फोकस कर रहे हैं। हालांकि एनडीए में सीटों का बंटवारा अभी होना है। बीजेपी ने नीतीश कुमार को चुनाव में गठबंधन का चेहरा घोषित कर दिया है लेकिन सीटों को लेकर उलझन बाकी है। बीजेपी संकेतों में कह रही है कि लोकसभा चुनाव में समझौता करते हुए पार्टी ने कुछ सीटें छोड़ीं और जेडीयू-बीजेपी दोनों 17-17 सीटों पर लड़ीं। उसी तर्जपर विधानसभा में वह समान सीटों पर समझौता चाहती है, कुछ सीटें चिराग पासवान की अगुआई वाली एलजेपी के लिए छोड़ कर। लेकिन जेडीयू सबसे बड़े दल के रूप में बीजेपी से सांकेतिक रूप में ही सही अधिक हिस्सा चाहती है। वहीं नीतीश कुमार दूसरे दलों के नेताओं को अपने दल के साथ जोड़ने के लिए आक्रामक रूप से पहल कर रहे हैं। आरजेडी के कई नेताओं के अलावा कांग्रेस के कुछ नेताओं के भी जेडीयू से जुड़ने की खबर है। जीतन राम मांझी भी नीतीश से संपर्क में हैं। इन सभी के आने से टिकट बंटवारे की मुश्किलें और बढ़ेंगी। इसके अलावा गवर्नेंस के स्तर पर कोरोना संकट के साथ प्रवासी मजदूरों और बाढ़ जैसी समस्या से भी सामना करना है। अगले तीन-चार महीने इस मोर्चे पर सरकार किस तरह काम करती है उससे भी चुनावी परिदृश्य तय होगा। जाहिर है, विपक्ष की एकजुटता का अभाव, उसमें नेतृत्व पर आम राय नहीं जैसे कारकों के बीच नीतीश कुमार राज्य में रेकॉर्ड चौथे टर्म के लिए अपना दावा पेश करते हुए अभी लाभ की स्थिति में दिख रहे हैं लेकिन अगले 100 दिनों में चीजों को बदलने की चुनौती भी झेल रहे हैं।

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