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बेरोजगारी का मोर्चा

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महामारी और लॉकडाउन ने हमारे सामने कठिनाइयों का पहाड़ खड़ा कर दिया है लेकिन अच्छी बात यह है कि दोनों मोर्चों पर हमारी लड़ाई अच्छे नतीजे लेकर आ रही है। खासकर लॉकडाउन के साइड इफेक्ट से तात्कालिक तौर पर उबरने के ठोस संकेत मिलने लगे हैं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) की ताजा रिपोर्ट बताती है कि देश में बेरोजगारी का स्तर अभी लॉकडाउन से ठीक पहले वाली स्थिति में पहुंच गया है। 21 जून को समाप्त हुए सप्ताह में यह 8.5 फीसदी पाया गया, जो मार्च में लॉकडाउन घोषित होने से पहले की 8.75 फीसदी बेरोजगारी से थोड़ा नीचे ही है। ध्यान रहे, लॉकडाउन घोषित होने के बाद जब दफ्तरों और कारखानों में कामकाज बंद हुआ और तमाम कंपनियों ने बिना कुछ कहे-सुने अपने शटर गिरा दिए, तो उनमें काम करने वाले मजदूर और कारीगर न केवल बेरोजगार हो गए बल्कि अचानक वे हर तरह की असुरक्षा से घिर गए। महामारी की दहशत, पैसों की तंगी और काम-धंधे की अनिश्चितता ने उन्हें सब छोड़-छाड़कर अपने गांवों की ओर कूच करने को मजबूर कर दिया। इसी का एक परिणाम यह हुआ कि मार्च के 8.7 फीसदी से बढ़ते-बढ़ते देश में बेरोजगारी का स्तर 3 मई को खत्म हुए सप्ताह में 27.1 फीसदी तक पहुंच गया। लेकिन इसके बाद हालात सुधरने शुरू हुए। खास तौर पर जून के इन तीन हफ्तों में बेरोजगारी गिरती हुई 17.5 फीसदी और 11.6 फीसदी के बाद 8.5 फीसदी पर आ गई। सीएमआईई की यह रिपोर्ट साफ तौर पर कहती है कि स्थिति में यह सुधार गांव लौटे प्रवासी मजदूरों को उनके गांव में या उसके आसपास ही काम उपलब्ध कराने के प्रयासों का नतीजा है। ये प्रयास ज्यादातर मनरेगा के ही तहत हुए हैं, जिसका एक मतलब यह भी है कि बेरोजगारी प्रतिशत में कमी के इन आंकड़ों को एक हद से ज्यादा अहमियत नहीं दी जा सकती। ये काम प्रवासी मजदूरों को तात्कालिक राहत तो दे सकते हैं, लेकिन उनके कौशल के साथ न्याय नहीं कर सकते। इन कुशल कामगारों का जो काम छूटा है, उससे उस काम की कोई तुलना नहीं हो सकती जो उन्हें उपलब्ध कराया गया है। इस तरह की मदद को रोजगार मानकर हम तात्कालिक तौर पर अपने आंकड़े भले दुरुस्त कर लें, लेकिन इन्हें वास्तविक रोजगार के रूप में देखना भविष्य के रिसर्चरों की राह कठिन बनाएगा। इकॉनमी के नजरिए से देखें तो खुश होने वाली खबर यह है कि लॉकडाउन के कारण अचानक बंद हो गई कंपनियों में जैसे-जैसे काम शुरू हो रहा है, वे गांव जा चुके अपने कर्मचारियों की भी सुध ले रही हैं। उनसे संपर्क स्थापित कर रही हैं, उन्हें सुरक्षा का भरोसा दे रही हैं और उनकी वापसी के लिए परिवहन की व्यवस्था भी कर रही हैं। गांव लौटे मजदूर भी बदले हालात में वापसी की इच्छा जता रहे हैं। इस प्रक्रिया में एंप्लॉयर और एंप्लॉयी के बीच विश्वास बहाल हो जाए तो अर्थव्यवस्था को पटरी पर लौटाने की दिशा में यह जरूर एक ठोस कदम होगा।

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