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भूख से जंग लड़ती आबादी किस बात पर करे गर्व

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घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है,
बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है।
सत्ता की ताकतवर कुर्सी के फरमानों को खारिज करते और देश में आम आदमी के हालात की हकीकत बयां करते अदम गोंडवी की शायरी के ये मिसरे आज भी मौजूं हैं। सत्ता की ताकतवर कुर्सियां, विकास, आत्मनिर्भर भारत, विश्वगुरु, महाशक्ति बनने और हिंदुस्तानी होने पर गर्व के नारे देती हैं। हिंदुस्तान के विश्वगुरु होने, हिंदुस्तानी होने आदि राष्टÑप्रेम के भाव को नारे की जरूरत नहीं। यह भाव तो हर हिंदुस्तानी के दिल में अमिट बसता है। लेकिन, जब यह भाव सत्ता की तरफ से नारे के रूप में सामने आता है, तब उसके सामने भूख से जंग लड़ती करोड़ों जुबान से निकला यक्ष प्रश्न खड़ा होता है। दो जून की रोटी के लिए जिंदगी की जंग लड़ रहे लोगों की समझ से परे है कि 73 साल पहले मिली आजादी और आजाद देश का नागरिक होने के अलावा किस बात पर गर्व करें? गर्व करें, आजादी के 73 सालों में रक्तबीज की तरह बढ़ती गरीबी पर? गर्व करें, जान से भी अधिक भूख की चिंता पर? गर्व करें, कोरोना संकट काल में अभूतपूर्व पलायन पर? गर्व करें, चंद महीनों के संकट में 80 करोड़ आबादी की दो जून की रोटी नहीं जुटा पाने की हैसियत पर? गर्व करें, उन 80 करोड़ गरीबों को मुफ्त अनाज मिलने पर? गर्व करें 365 दिन में 100 दिन 200 रुपये दिहाड़ी पाने पर? आजादी के 73 साल में विडंबना रही है कि सरकारों ने जिस समस्या को खत्म करने का वादा किया, वह रक्तबीज की तरह और फलता-फूलता गया। कोरोना संकट ने देश के गरीब और गरीबी की असली तस्वीर सामने रख दी है। कोरोना संकट के समय गरीबी की जो तस्वीर सामने आयी है, वह आज की ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि भारत में कोरोना वायरस की वजह से आर्थिक गतिविधियां बंद हुई हैं, तब लोग गरीब हुए हैं। वे पहले से गरीब थे और अब पूर्ण गरीबी की स्थिति तक चले गए हैं, जहां दो वक्त के खाने की व्यवस्था उनके पास नहीं है। दुनिया के शायद ही किसी विकसित देश में इस बात की चिंता की जा रही होगी कि अगर सरकार मुफ्त अनाज नहीं देगी, तो उसके नागरिकों का पेट कैसे भरेगा। अत्यंत पिछड़े अफ्रीकी देशों, उसमें भी उप सहारा के देशों और कुछ लैटिन अमेरिकी देशों को छोड़ दें तो शायद ही अब कहीं चिंता के केंद्र में भूख है। पर, भारत में भारी महामारी के बीच बड़ी चिंता भूख की, लोगों का पेट भरने की है। देश में गरीबी हटाने का अभियान इंदिरा गांधी ने 1970 -71 में छेड़ा था। गरीबी हटाओ का नारा दिया था। उस नारे के 50 साल हो गये हैं और हकीकत यह है कि उस समय पूरे देश की जितनी आबादी थी, उससे ज्यादा लोग अब गरीब हो गये हैं। यानी गरीबी हटने की बजाय बढ़ती गयी। इंदिरा गांधी ने तब गरीबी को चुनावी मुद्दा बनाते हुए कहा था कि वे गरीबी हटाना चाहती हैं और विपक्ष उनको हटाना चाहता है। यूं कहें, तब से ही गरीबी को सियासी चादर ओढ़ा दिया गया। नतीजा है, गरीबी अंतहीन सियासी मुद्दा बन गयी। देश में गरीबी और गरीबों की संख्या पर विरोधाभास रहा है। गरीबी रेखा से नीचे जीवन-यापन करनेवाले लोगों के आकलन के लिए गठित अलग-अलग समितियों की अलग-अलग राय रही है। तेंदुलकर फॉर्मूले में 22 फीसदी आबादी को गरीब बताया गया था, जबकि सी. रंगराजन फॉर्मूले ने 29.5 फीसदी आबादी को गरीबी रेखा से नीचे माना था। इस मुद्दे पर सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि गरीब कौन है और कितने हैं, यह स्पष्ट नहीं है। संयुक्त राष्टÑ की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2005-06 में भारत के करीब 64 करोड़ यानी पचपन फीसदी लोग गरीबी में जी रहे थे, साल 2015-16 में ये तादाद घटकर 37 करोड़ पर आ गयी। एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में साल 2006 से 2016 के बीच 27 करोड़ से भी ज्यादा लोग गरीबी से बाहर निकले हैं। ये तो रिपोर्टों की बात है। लेकिन, हकीकत आज सामने है। गरीबों के मानक आंकड़ों से भले ही यह संख्या मेल न खाती हो, पर इसे नकारा नहीं जा सकता कि देश में 80 करोड़ लोग हैंड टू माउथ हैं। यदि ऐसा नहीं होता, तो महीने-दो महीने में ही वे एब्सॉल्यूट पॉवर्टी में नहीं चले जाते। अमेरिका की कुल जनसंख्या से ढाई गुना अधिक लोगों को, ब्रिटेन की जनसंख्या से 12 गुना अधिक लोगों को और यूरोपियन यूनियन की आबादी से लगभग दोगुने से ज्यादा लोगों को सरकार ने मुफ्त अनाज दिया है। यानी देश की इतनी बड़ी आबादी भूख से जंग लड़ रही है। यदि सरकार मुफ्त राशन नहीं देती तो 130 करोड़ की आबादी में 80 करोड़ लोग भूखे रहते। देश की बड़ी आबादी की हकीकत पांच किलो गेहूं या चावल, एक किलो चना और मनरेगा या गरीब कल्याण अभियान से मिला अस्थाई रोजगार है। सवाल है भूख से जंग लड़ रही देश की 80 करोड़ की आबादी किस बात पर गर्व करे और किस बात पर शर्म? इसका जवाब सत्ता की ताकतवर कुर्सी के पास न कल था, न आज है। क्योंकि, सत्ता हर हाल में गर्व करने का अवसर निकाल ही लेती है। सत्ता जवाब दे, ना दे, सवालों का वजूद कायम रहेगा। आजादी के 73 साल के बाद भी भारत में 80 करोड़ लोगों की हैसियत दो वक्त का खाना जुटाने की भी नहीं है। जब तक इन 80 करोड़ लोगों की हैसियत नहीं बदलेगी, तब तक गोंडवी की ये पंक्तियां आम आदमी के सवाल के रूप में प्रासंगिक रहेंगी।
सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है,
दिल पे रख के हाथ कहिए देश क्या आजाद है।

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