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मंदिर का सोना ऐसे वक्त काम में आए

विवेक सक्सेना (संवाद परिक्रमा)

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बहुत पहले एक हिंदी फिल्म देखी थी। इसमें एक दृश्य में शहर में बाढ़ आने पर वहां का संबंधित मंत्री उसे देखने के लिए जाता है। यह पता चलते ही एक विपक्ष का नेता प्रेस कान्फ्रेंस बुलाता है। जब पत्रकार उससे इस बारे में उसकी प्रतिक्रिया जानना चाहते हैं तो वह कहता है कि अगर मंत्री हैलीकाप्टर से गया हो तो मेरी तरफ से लिखना लोग बाढ़ में डूब कर व भूख से मारे जा रहे हैं और उन्हें इस हालत में भी हैलीकाप्टर से दौरा करने की सूझी है। अगर मंत्री नाव से गया हो तो लिखना कि लोगों को राहत देने के लिए इसके पास पैसा नहीं है मगर यह आराम से तेल का पैसा बचाने के नाम पर वहां तुरंत हैलीकाप्टर से जाने की बजाय नाव की सैर कर रहा है। उसे आपात स्थिति से कुछ लेना देना नहीं है।

हाल ही में जब महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेसी नेता पृथ्वीराज चव्हाण के इस बयान पर चैनलों को बहस करते देखा कि सरकार को मंदिर में जमा टनों सोने को बहुत कम ब्याज दर पर कर्ज के रुप में देकर अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना चाहिए तो भाजपा उनकी आलोचना करने लगी। उसके नेता संबित पात्रा ने अंग्रेजी भाषा का विशेषज्ञ बनकर अंग्रेजी के एप्रीप्रिएट शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि कांग्रेस तो पैसा जब्त कर लेने की बात कह रही है। इसके साथ ही उन्होंने पूरे विवाद को राजनीतिक मोड़ देते हुए कहा कि चव्हाण यह बात मुस्लिम वर्ग की मस्जिदों, सिखों के गुरुद्वारों व ईसाइयों के गिरिजाघरों के बारे में भी कहना चाहिए। हालांकि इसके साथ ही वे यह भी कह रहे है कि लोग मंदिर में तो सोना चढ़ाते है। बाकी धार्मिक स्थलों के पास तो अपनी जमीन ही होती है।

मुझे यह सारा विवाद देखकर उस फिल्म का दृश्य याद आ गया। जिसमें महज विरोध के लिए विरोध किया जा रहा था। मैं पूरी तरह से श्री चव्हाण के विचार से सहमत हूं। मैं कांग्रेसी नहीं हूं न हिंदू या मंदिर विरोधी हूं। मेरा मानना है कि इससे अच्छा कोई और सुझाव हो नहीं सकता। अपना मानना है कि मंदिरों में अरबों रुपए का सोना बेकार उसी तरह से पड़ा हुआ है जैसे कि हम फूड कारपोरेशन आफ इंडिया के गोदामों में भरे सड़ते हुए अन्न के बारे में पढ़ते हैं। जो सड़ कर बरबाद हो जाता है और किसी के पेट में जाकर उसकी भूख समाप्त नहीं करता है।

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अतः मैं यह जानते हुए भी कि आजकल अन्न के वितरण में कितनी गड़बड़ी हो रही होगी। इसके पक्ष में हूं। अगर 50 फीसदी अन्न भी आम भूखे लोगों तक पहुंच गया तो बहुत बड़ी बात होगी। आखिर मंदिर के गोदामों में रखे इस सोने का क्या मतलब। इससे अच्छा तो यह होगा कि वहीं के काम आ जाए जैसे कि युद्ध के अवसर पर होता आया है। देश में वैसे तो सैकड़ों ऐसे मंदिर है जिनमें करोड़ों रुपए मूल्य का सोना जमा हुआ है। मगर देश में 10 सबसे अमीर मंदिरों का विवरण इस प्रकार है। केरल का पद्मनाभ स्वामी मंदिर और मुंबई के निकट शिरडी के सांई बाबा, जम्मू के वैष्णों देवी मंदिर, मुंबई का सिद्धि विनायक मंदिर, वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर, अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर, केरल का गुरुवायुर मंदिर व कोल्हपुर महाराष्ट्र का महालक्ष्मी मंदिर।

इनमें तिरुवनंतपरुम का पदमनाभन स्वामी मंदिर तो दुनिया के सबसे अमीर मंदिरों में गिना जाता है। यह मंदिर तब चर्चा में आया जब कि उसके अंदर बने बंद कमरे से एक लाख करोड़ रुपए मूल्य का खजाना पाया गया और उसकी दौलात के हिसाब से तिरुपति बालाजी मंदिर को भी काफी पीछे छोड़ दिया। ब्रम्हपुराण, मत्स्य पुराण, वराह पुराण, स्कंध पुराण, पदम पुराण, वायु पुराण व भागवत पुराण से लेकर महाभारत तक में इस मंदिर की चर्चा की गई है। बताया जाता है कि इस मंदिर के कुछ गुप्त दीवारें तो ठोस सोने की बनी हुई है।

इसके महाविष्णु के मूर्ति में लगे सोने की कीमत ही करीब 9000 करोड़ रुपए मानी जाती है। इसके अलावा सोने की अनेक मूर्तियां, आभूषण व अस्त्र शस्त्र हैं। वहां करीब एक टन भर के भक्तों के चढ़ाए गए सोने के जेवर है। 18 फुट लंबा ढाई किलो ग्रामी भारी सोने का नैकलेस है। इसके अलावा अरबों रुपए मूल्य के हीरे जवाहरात भगवान के उपयेाग में आने वाले बर्तन भी सोने के हैं। इसके छह सोने से भरे गोदाम भी बंद पड़े हुए हैं। भगवान विष्णु के अवतार वेंकटेश्वर भगवान का आंध्रप्रदेश के तिरुपति में बना हुआ मंदिर भी बहुत पैसे वाला माना जाता है। जहां भगवान के निकट से दर्शन करने तक के लिए टिकट खरीदना पड़ता हो व जिसका प्रसाद विशेष दुकान के जरिए देश भर में बेचा जा सकता हो उसकी अमीरी का अंदाज लगाया जा सकता है। ज्यादातर नेता व उद्योगपति इस मंदिर के भक्त है।

हमारे देश के मंदिरों के धन के बारे में जितना कम कहा जाए उतना ही अच्छा है। उनकी देखा देखी तमाम धर्म की आड़ में एनजीओ चलाने वालों का धंधा पनप रहा है। मुझे यह देखकर दुख होता है कि किसी भी धनवान मंदिर के प्रबंधन ने इस दुख की घड़ी में गरीबों के लिए खाने पीने से लेकर सरकार की आर्थिक मंदद करने का ऐलान नहीं किया। कुछ एनजीओ अपवाद स्वरुप जरुर आगे आये। सच कहा जाए तो मिट्टी हो रहे सोने को इस दुख की घड़ी में मैं देश के लिए इस्तेमाल में लाए जाने का पूरी तरह से पक्षधर हूं। हालांकि मुझे सरकार पर जरा भी विश्वास नहीं है।

आखिर जो सरकारें महामारी मेंभी पैसे कमाने की बात सोचती हो उनसे इस अकूत पैसे के प्रति ईमानदारी बरतने की कल्पना भी कैसे की जा सकती है। यह वजह है कि मैं पहले सोमवार को मंदिर में शिवजी पर दूध चढ़ाता था जो कि नाली में बहकर बरबाद हो जाता व गंदगी फैलाता था पर अब मैं उसकी जगह मदर डेरी की थैली वाला काफी ठंडा दूध चढ़ाता हूं जिसे पंडितजी अपने साथ ले जा उपयोग में ले आते है। मैं पूरी तरह से मंदिरा में जमा पैसा संकट की इस घड़ी में खर्च किए जाने के पक्ष में हूं। बस इतना ही डर है कि कहीं राहत की तरह इसकी भी लूट न हो जाए।

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