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मजदूरों को मदद नहीं हक दीजिए

अजीत द्विवेदी, संपादकीय लेख, (संवाद परिक्रमा)

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देश के राजमार्गों पर 40 डिग्री सेल्सियस की गर्मी में, जेठ की भरी दोपहरी में पैदल चल रहे हजारों, लाखों लोग भिखारी नहीं मजदूर हैं, जिन्होंने यह दुनिया बनाई है। वे 130 करोड़ भारतीयों में संभवतः सबसे मजबूत, सॉलिड और सम्मान के हकदार लोग हैं, जिन्होंने सर्वाधिक विषम परिस्थितियों में जीवन बिताते हुए सिर्फ निर्माण किया है! कभी भी, किसी भी किस्म के विध्वंस में वे भागीदार नहीं रहे और कभी अपनी दुश्वारियों की शिकायत नहीं की। इस देश में जो कुछ भी अच्छा है वह उनका बनाया हुआ है। और हां, कोरोना वायरस भी उनका लाया हुआ नहीं है। वह तो हवाई जहाज में बड़े लोगों के साथ बैठ कर आया, जिसकी वे कीमत चुका रहे हैं।

जिन लोगों के जीवन को बेहतर और आसान बनाने के लिए वे अपनी जान खपाते रहे हैं, उनकी पहली बार उन्हें जरूरत पड़ी है। पहली बार वे हमारी ओर देख रहे हैं और उनकी कातर आंखें कह रही हैं, उन्होंने अभी हमारा कोई काम तो नहीं किया पर उन्हें मदद की जरूरत है। हालांकि असलियत में यह कोई मदद नहीं है, यह उनका हक है पर उन्हें तो आठ घंटे या 12 घंटे काम करने के बाद भी मजदूरी मांगने या वसूलने का तरीका नहीं आता है तो वे भला बिना काम किए, कैसे हक मांग सकते हैं! यह असल में हमारी जिम्मेदारी है कि हम उनकी मदद नहीं करें, उन्हें उनका हक दें, जिसकी वे संभवतः पहली बार हमसे उम्मीद कर रहे हैं। अफसोस की बात है कि हम कुछ भी उनका हक मान कर उनको नहीं दे रहे हैं और मदद भी ऐसे कर रहे हैं, जैसे यह बला जितनी जल्दी टले उतना बेहतर है।

थोड़े से लोग निश्चित रूप से हैं, जो इंसानियत की भावना से बाहर निकल रहे हैं और मजदूरों को, जितनी संभव हो रही है उतनी मदद दे रहे हैं। पर वृहत्तर समाज खामोश है, मीडिया में उनके दुख की तस्वीरें तो हैं पर उस तस्वीर के साथ लिखी गई बात सरकार से सवाल पूछने वाली नहीं है, बल्कि यह बताने वाली है कि उनकी नियति यहीं है। कई समझदार लोग तो उन्हीं की गलती निकाल रहे हैं और इस बात से हैरान हैं कि आखिर वे क्यों घरों से निकले हैं? बहुत लोगों को इस बात की हैरानी है कि सरकार ने जब ट्रेनों का बंदोबस्त कर दिया तब फिर वे पैदल क्यों चल रहे हैं? कुछ ज्यादा भोले लोगों का सवाल यह है कि सरकार ट्रेन का किराया भी दे रही है तो किस वजह से वे ट्रेन में नहीं जा रहे हैं? असल ये सब ऐसे लोग हैं, जो एक किस्म के अंधेपन के शिकार हैं, जिसमें उनको अपने हित की बातें तो समझ में आती हैं, पर बाकी बातों में वे सरकार और मीडिया पर विश्वास करते हैं।

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हकीकत यह है कि केंद्र सरकार ने मजदूरों के पलायन शुरू करने के एक महीने बाद आधे-अधूरे तरीके से उनको घर पहुंचाने के लिए ट्रेन सेवा शुरू की। उसमें भी मजदूरों की संख्या के अनुपात में ट्रेनों का बंदोबस्त नहीं किया गया। उनके किराए के बारे में स्पष्टता नहीं रखी गई, जिसका नतीजा यह है कि लगभग हर जगह मजदूरों से टिकट के पैसे लिए जा रहे हैं। अनेक जगहों पर तय किराए से ज्यादा पैसे वसूले जा रहे हैं। हकीकत यह है कि कोई भी राज्य सरकार नहीं चाहती है कि ज्यादा संख्या में मजदूर उसके यहां से जाएं तो यह भी हकीकत है कि मजदूर जिस राज्य को अपना गृह राज्य बता कर घर जाने को बेताब हैं वह राज्य भी उनके स्वागत के लिए तैयार नहीं है। यहीं वजह है कि राज्यों ने ज्यादा ट्रेनें चलाने के लिए अनुरोध नहीं किया है या नजदीक की जगहों से लोगों को लाने के लिए बसों का बंदोबस्त नहीं किया है।

किसी भी मजदूर के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेन से यात्रा करना आसान नहीं है। ट्रेनों की संख्या गिनती की है और लौटने वाले मजदूरों की संख्या लाखों में है। एक-एक शहर में पांच-पांच लाख मजदूरों ने पंजीयन कराया है। दिल्ली, मुंबई की बात छोड़ें अकेले पंजाब के लुधियाना में साढ़े छह लाख से ज्यादा मजदूरों ने पंजीयन कराया है। एक ट्रेन में अगर 17 सौ लोग भी यात्रा कर रहे हैं तो अकेले लुधियाना से चार सौ ट्रेनें चलानी होंगी, जबकि भारत सरकार ने एक मई से अभी तक पूरे देश में चार सौ ट्रेनें चलाई हैं। सो, अगर किसी में अनंतकाल तक इंतजार करने का भरोसा हो तो वह पंजीयन करा कर बैठा रहे। इसके बाद भी गारंटी नहीं है कि उसका नंबर आएगा तो वह ट्रेन में सवार हो पाएगा और उससे पैसा नहीं लिया जाएगा। मजदूरों की मजबूरी यह है कि उनके कमाए हुए पैसे खत्म हो गए हैं, मकान मालिक उनको घरों से जबरन निकाल रहे हैं, खाने-पीने की चीजों की कमी हो गई, दस बाई दस के कमरे में पांच लोगों के परिवार का दम घुट रहा है और हर समय कोरोना का खतरा सता रहा है। ऐसे में उनके पास इंतजार करने का विकल्प नहीं है। तभी वे जोखिम लेकर घर से पैदल निकलने का दुःसाहस कर रहे हैं।

असल में पहले उन्होंने ही यह दुःसाहस किया। वे सड़कों पर पैदल चलने लगे तब सरकारों को लगा कि उनके लिए कुछ उपाय करना चाहिए। तभी एक महीने के बाद आधे-अधूरे तरीके से, बेमन से ट्रेन चलाने की घोषणा हुई। बहुत लोग मजदूरों के पैदल चलने को यह लिख रहे हैं कि मजदूर सड़कों पर उतरे। असल में वे सड़क पर उतरे नहीं हैं। वे तो अपने घरों से निकल कर चुपचाप सड़कों पर चलने लगे। सोचें, अगर वे लाखों की संख्या में सड़क पर उतरते, उनकी बंधी हुई मुट्ठी हवा में तनी होती, उनके हाथों में अपने काम में इस्तेमाल होने वाले औजार होते और होठों पर अपना हक मांगने वाले नारे होते तो क्या सरकारें इसी तरह की प्रतिक्रिया देतीं?

पर वे अपने जीवन की मुश्किलों को अपनी नियति मान कर चुपचाप चलते जा रहे हैं और इसलिए वे दया के पात्र बने हैं, उनकी दशा भिखारियों जैसी है! वे किसी से कुछ मांग नहीं रहे हैं पर मदद के लिए कोई हाथ बढ़ता है तो वे उसके पैरों में झुक जाते हैं! सोचें, जो हाथ निर्माण करने वाले हैं, जिन हाथों से महानगरों की बहुमंजिला इमारतें बनीं हैं, जिन हाथों से चमकते राजमार्ग बन हैं और बलखाती रेलवे लाइनें बिछी हैं, जिनकी खून-पसीने से फैक्टरियां चलती हैं, देश के संसाधनों पर जिनका बराबर का हक है, उन्हें क्या अपना हक नहीं मिलना चाहिए? फैज ने लिखा है- हम मेहनतकश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे, इक खेत नहीं, इक देश नहीं हम सारी दुनिया मांगेंगे। पर वे सारी दुनिया नहीं मांग रहे हैं। वे सम्मान के साथ घर पहुंचना चाहते हैं। इन मजदूरों में से शायद ही किसी ने विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ पढ़ी होगी पर वे अपने दिल की अतल गहराई से इस बात को महसूस कर रहे हैं कि ‘घर जितना बाहर जाने के लिए होता है उससे ज्यादा लौटने के लिए होता है’। वे अपनी इन भावनाओं की वजह से अपने परिवार और बच्चों को लेकर लौटना चाहते हैं और 20 लाख करोड़ रुपए का पैकेज घोषित करने वाला देश अपने मजदूरों को सम्मान के साथ और सुरक्षित उनके घर नहीं पहुंचा पा रहा है। एक देश, सरकार और एक समाज के लिए भला इससे ज्यादा शर्मनाक क्या हो सकता है?

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