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मजबूरी की बिक्री में नुकसान संभव

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केंद्र सरकार ने सेल लगा दी है। वित्त मंत्री ने पांच दिन तक प्रेस कांफ्रेंस करके जिस प्रोत्साहन पैकेज का ऐलान किया उसमें देश के हर नागरिक को कर्ज लेने के लिए प्रेरित करने और कर्ज के लिए ज्यादा पैसे का बंदोबस्त करने के अलावा जो दूसरी गौरतलब बात थी वह सरकारी कंपनियों को बेचने की थी। वित्त मंत्री ने विनिवेश का बिंगबैंग ऐलान किया। उन्होंने चौथे दिन की घोषणा में सारा जोर निजीकरण पर रखा। अलग अलग सेक्टर को निजी कंपनियों के लिए खोलने की वित्त मंत्री ने घोषणा की। इसके अलावा सरकार की ओर से एक बड़ा ऐलान यह किया गया कि रणनीतिक सेक्टर में एक क्षेत्र में चार से ज्यादा सरकारी कंपनियां नहीं रह सकती हैं। गैर रणनीतिक सेक्टर में तो एक भी सरकारी कंपनी न रहे तो कोई बात नहीं है। इसका अर्थ है कि रणनीतिक सेक्टर की कंपनियां भी बिकेंगी और गैर रणनीतिक सेक्टर की तो बिकेंगी ही।

सरकार इस बिक्री से बड़ी कमाई की उम्मीद कर रही है। एक अनुमान के मुताबिक सरकार उम्मीद कर रही है कि इस बिक्री से उसे एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा मिलेंगे। ध्यान रहे सरकार ने बजट में पहले ही दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा विनिवेश से हासिल करने का लक्ष्य रखा हुआ है। हालांकि पिछले वित्त वर्ष में सरकार ने एक लाख 10 हजार करोड़ रुपए के करीब विनिवेश से हासिल होने का लक्ष्य रखा था पर वह पूरा नहीं हो सका। सरकार की ओर से जोर देकर कहा गया था कि मार्च के अंत तक यानी वित्त वर्ष खत्म होतो होते तक एयर इंडिया की बिक्री हो जाएगी। पर वह नहीं हो सकी। सरकार इसे बेचने की कितने दिनों से कोशिश कर रही है पर कामयाबी नहीं मिली। सरकार को तय लक्ष्य से आधा ही पिछले वित्त वर्ष में हासिल हो सका। तभी सरकार ने नए वित्त वर्ष के लिए लक्ष्य दोगुना कर दिया है।

सरकार ने बजट में 2.1 लाख करोड़ रुपए का लक्ष्य रखा और अब रणनीतिक सेक्टर के सार्वजनिक उपक्रमों की बिक्री से 1.2 लाख करोड़ रुपए मिलने की उम्मीद कर रही है। इसका मतलब हुआ कि अगले दस महीने में सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को बेच कर तीन लाख 30 हजार करोड़ रुपए जुटाना चाह रही है। क्या कोरोना वायरस के संकट के इस समय में यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है? पिछले साल जब ऐसा कोई संकट नहीं था और दुनिया की अर्थव्यवस्था फल-फूल रही थी, भारत में तेजी से पांच हजार अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था का दम भरा जा रहा था तब भी विनिवेश का लक्ष्य आधा ही हासिल हुआ। इस समय जबकि देश और दुनिया की अर्थव्यवस्था की हालत खराब है और आने वाले दिनों में स्थिति और बिगड़ने वाली है तो सरकारी कंपनियों की बिक्री का लक्ष्य कैसे पूरा होगा, यह देखने वाली बात होगी।

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आर्थिकी के जो जानकार यह कहते रहे हैं कि बिजनेस करना सरकार का बिजनेस नहीं हो सकता है यानी कारोबार के क्षेत्र में सरकार की कोई जरूरत नहीं है और भारत सरकार को अपने सारे बिजनेस बेच कर इससे बाहर हो जाना चाहिए, वे भी बिक्री की इस सेल धमाका घोषणा की टाइमिंग गलत मान रहे हैं। उनका कहना है कि अभी सरकारी कंपनियों की इतने बड़े पैमाने पर बिक्री की घोषणा नहीं करनी चाहिए थी। इसका सरकार को नुकसान हो सकता है। उसकी कंपनियों की बोली उम्मीद से कम लग सकती है क्योंकि खरीदने वाले को पता चल गया है कि सरकार मुश्किल में है, उसके पास नकदी की कमी है और इसलिए वे डिस्ट्रेस सेल कर रही है यानी मजबूरी में अपने पूर्वजों की अर्जित संपत्ति को बेच रही है। आमतौर पर डिस्ट्रेस सेल में फायदा हमेशा खरीदने वाले का होता है।

इस रणनीतिक गलती के अलावा यह भी कहा जा रहा है कि इस समय बाजार में खरीदने वाले नहीं हैं। कम से कम भारत में घरेलू खरीददार तो नहीं दिख रहे हैं। किसी के पास इतना पैसा नहीं है कि वह सरकार की कंपनियों को खरीदने की बोली लगाए। हालांकि मुनाफा कमाने वाली कंपनियों के तो फिर भी कुछ खरीददार मिल सकते हैं, पर जो कंपनियां मुनाफा नहीं कमा रही हैं या ऐसे सेक्टर की हैं, जिनका बाजार आने वाले दिनों में गिरा रहने वाला है तो उस सेक्टर की कंपनियां नहीं बिकेंगी। सरकार को उम्मीद है कि वह भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन, बीपीसीएल या कंटेनर कॉरपोरेशन, एयर इंडिया आदि की बिक्री से एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा कमा लेगी। पर यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आने वाले दिनों में यानी कोरोना के बाद बाजार की स्थिति क्या रहने वाली है। भारत में तो खैर अभी कई महीने तक वायरस का संक्रमण ही चलते रहने वाला है और अगर यह सर्दियों तक गया तो विनिवेश की सारी योजना धरी रह जाएगी।

वैसे ज्यादातर जानकार मान रहे हैं कि पूरी दुनिया में बाजार में मंदी रहनी है। भारत में तो अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां पांच से नौ फीसदी तक माइनस में जीडीपी जाने की आशंका जता रही हैं। ऐसे में इन कंपनियों को खरीददार कहां से मिलेंगे? इस समय सरकारी कंपनियों की सेल लगाने से नुकसान होने के दो कारण साफ दिख रहे हैं। पहला तो यह कि खरीददारों में मैसेज गया कि सरकार नकदी के संकट में है और उसे पैसे की जरूरत है और दूसरा यह कि इस समय दुनिया में खरीददारों की कमी है। भारत में तो खैर गिने-चुने ही लोग हैं, जिनके पास पैसा है। और अगर बैंकों से लोन लेकर कोई कंपनी भारतीय कंपनियों को खरीदना चाहती है तो वह देश के बैंकों के लिए भी शायद ही अच्छा हो क्योंकि वे पहले से मुश्किल झेल रही हैं। बैंकों पर पहले से कर्ज का बहुत ज्यादा बोझ है।

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