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मानव तस्करी : लील रही जिंदगियां

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पिछले सप्ताह अमेरिकी विदेश मंत्रालय की ओर से जारी ट्रैफिकिंग इन पर्संस रिपोर्ट-2020 भारत में मानव तस्करी को लेकर कुछ अहम तथ्यों की ओर ध्यान खींचती है। रेटिंग के हिसाब से देखा जाए तो भारत को पीछले साल की तरह इस बार भी टियर-2 श्रेणी में ही रखा गया है। आधार यह कि सरकार ने 2019 में इस बुराई को मिटाने की अ΄ानी तरफ से कोशिश जरूर की लेकिन मानव तस्करी रोकने से जुड़े न्यूनतम मानक फिर भी हासिल नहीं किए जा सके। ध्यान रहे, सरकारी कोशिशों के इसी पाईमाने पर रिपोर्ट ने पाकिस्तान को पहले से एक दर्जा नीचे लाते हुए टियर-2 वॉच लिस्ट में रखा है, जबकि चीन को और भी नीचे टियर-3 में। रि΄ोर्ट के मुताबिक चीन की सरकार अपनी तरफ से इस समस्या को खत्म करने की कोशिश भी नहीं कर रही। बहरहाल,भारत के बारे में रिपोर्ट कहती है कि यह आज भी वर्ल्ड ह्यूमन ट्रैफिकिंग के नक्शे ΄ार एक अहम ठिकाना बना हुआ है। इसके उलट अगर हम नेशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों ΄ार नजर डालें तो स्थिति लगातार बेहतर होती दिख रही है। एनसीआरबी के मुताबिक साल 2016 में भारत में आई΄ाीसी के तहत ह्यूमन ट्रैफिकिंग के 5217 मामले दर्ज किए गए थे। 2017 में यह संख्या घट कर 2,854 हो गई और इसके अगले साल यानी 2018 में और कम हो कर 1830 ΄ा

पर आ गई। दिक्कत यह है कि इन आंकड़ों से इस बात का पता नहीं चलता कि यह बेहतरी आखिर कैसे हासिल की जा रही है। यहीं हमारा सामना इस संदेह से होता है कि कहीं इसके पीछे यह कड़वी हकीकत तो नहीं कि किन्हीं कारणों से मानव तस्करी के मामले दर्ज ही कम हो पा रहे हैं। परिस्थितिजन्य साक्ष्य इस संदेह को मजबूती देते हैं। देश-विदेश के लोगों की मानसिकता नहीं बदली है। श्रम शोषण और यौन शोषण की स्थितियां ज्यों की त्यों हैं। बेशक, एक राज्य सरकार ने पीछले साल मुजफ्फरपुर शेल्टर हाउस कांड जैसे चर्चित मामले में चुस्ती दिखाई, लेकिन मामला उजागर करने में उसकी कोई भूमिका नहीं थी। भारत में कमजोर तबकों के शोषण को लेकर यहां की कानून-व्यवस्था की सक्रियता का अंदाजा इस बात से मिलता है कि 1976 से अब तक सरकारी तौर पर करीब 3 लाख 13 हजार बंधुआ मजदूरों की ही पहचान हो पाई है जबकि इस काम में लगे स्वयंसेवी संगठनों के मुताबिक देश में ह्यूमन ट्रैफिकिंग के पीड़ितों की संख्या कम से कम 80 लाख है, जिनका बड़ा हिस्सा बंधुआ मजदूरों का है।रिपोर्ट में मामले का एक और ΄ाहलू यह उभर कर आया है कि पुलिस अक्सर पीड़ितों के खिलाफ उन कार्यों में भी मुकदमा दर्ज कर कार्रवाई शुरू कर देती है, जो ट्रैफिकर उनसे जबरन करवाते हैं। इससे एक तरफ पीड़ितों के कानून-व्यवस्था की शरण में आने की संभावना कम होती है, दूसरी तरफ ट्रैफिकर्स का शिकंजा उन पर और कस जाता है।

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