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वायरस का असली रूप जून से

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जून का अर्थ है मॉनसून। और मॉनसून पर यदि मुंबई-पुणे की पट्टी के दायरे में सोचें तो 75-80 प्रतिशत आर्द्रता, ह्यूमिडिटी व25-30 डिग्री का तापमान। मतलब कोविड-19 के संक्रमण को फैलाने वाली आदर्श स्थिति। मई की भारी-सूखी गर्मी के मुकाबले यों भी मॉनसून का मौसमभारत में बीमारियों, मलेरिया, डेंगू, सर्दी-गर्मी, निमोनिया आदि के संक्रमणको ज्यादा फैलाता है। भारत में कई लोग इस गलतफहमी में रहे हैं कि 40-45 डिग्री की कड़क-सूखी गर्मी में कोरोना वायरस नहीं फैलेगा। लेकिन उसके बाद मॉनसून में? पूरे भारत में जून से सितंबर तक मॉनसून की आर्द्रता व 25-30-35 डिग्री के तापमान में भारत में कोविड-19 का संक्रमण कैसे-कितना फैलेगा, क्या इसकी कल्पना, अनुमान, वैज्ञानिक प्रोजेक्शन, मॉडल व बंदोबस्त, मेडिकल प्रबंधन भारत में बनता समझ आ रहा है?

सब भगवान भरोसे दिख रहा है। मैंने मार्च-अप्रैल में भी अनुमान लगाया था कि कोविड-19 का भारत में स्टार्टअप जून से असली शक्ल लेने लगेगा। मई अंत तक झांकी है और जून सेअसली रूप में महामारी देखने को मिलेगी। इस लॉजिक-तर्क के पीछे चीन और अमीर देशों के मध्य के सुपर एयर हाईवे से अमेरिका, यूरोप, जापान आदि में वायरस के पहले गुल खिलाने का सहज हिसाब था। जैसे भारत में है कि दूर के पिछड़े प्रदेश, जिले धीरे-घीरे कोरोना के चपेटे में आए हैं या आएंगे तो विश्व मानचित्र में भी पिछड़े-गरीब-विकासशील देशों का बाद में, धीरे-घीरे नंबर आना है। भारत ने जल्दबाजी में अमेरिका-न्यूयॉर्क से पहले दिन से ही अपनी तुलना शुरू कर डाली जबकि जून-जुलाई से तुलना शुरू होनी चाहिए थी। मतलब अभी हम जैसे हिमाचल की मुंबई से तुलना नहीं कर सकते हैं लेकिन छह महीने बाद हिमाचल के आंकड़े भी यह विचार बनाए हुए होंगे कि आबादी के अनुपात में हिमाचल कहां-कितना पीछे है?

दूसरी वजह मॉनसून की थी। ठंडे मुल्कों में वायरस मारेगा और गर्म-भूमध्यरेखा के करीबी देशों में निष्प्रभावी होगा, ऐसी चर्चाओं से मुझे भी लगा कि मॉनसून से पहले तक वायरस कुछ दबा रह सकता है। हालांकि वैज्ञानिक इस थ्योरी को सिरे से खारिज करते हैं। गर्मीं के मामले में तमिलनाडु का उदाहरण सटीक है। इसका आर्द्रता-गर्मी वाला चेन्नई हो या समुद्र से दूर मदुरै, तिरूपुर सब जगह वायरस का फैलना आबादी-टेस्ट अनुपात में एक सी प्रवृत्ति लिए है। मतलब वायरस के आगे गर्मी की दलील फेल है। मुंबई, चेन्नई, अहमदाबाद, दिल्ली के चारों महानगर मई में विषम गर्मी के बावजूद दस हजार से ऊपर (दिल्ली) और 25 हजार (मुंबई) संक्रमित मरीजों की झांकी लिए हुए हैं तो यह वायरस के चौतरफा पसरने का प्रमाण है। आंकड़े कम ज्यादा टेस्ट की संख्या और सरकार की नीयत के चलते हैं और सरकार टेस्टिंग में कितनी ही लापरवाही, गोलमाल करें यह वायरस तो सब तरफ गहरा पसरा गया है। इसे मॉनसून के अनुकूल मौसम में रफ्तार मिलेगी। आखिर सभी महानगर बारिश में गंदगी के बहाव वाला सैलाब-भराव लिए होते हैं। पसीना, सर्दी-जुकाम और खांसी-छींक याकि मॉनसून में एयरपोर्ट-बस-दफ्तर आदि को सेनिटाइज करना जहां मुश्किल है तो बिना एसी के काम भी बहुत मुश्किल है। सोचें, बारिश में मुंबई, दिल्ली की लोकल या मेट्रो में एसी या बिना एसी का सफर कैसा होगा और गिचपिच गर्मी वायरस को कैसा मौका दिए हुए होगी? ईश्वर करें मैं गलत साबित होऊं लेकिन भारत सरकार और प्रदेशों की सरकारों ने सब कुछ ‘नॉर्मल’ दिखलाने की कोशिश में यदि मॉनसून की बारिश में मेडिकल-टेस्टिंग लापरवाही बरती तो मुंबई-दिल्ली में और पूरे उत्तर भारत में क्या होगा, यह कल्पना दहला देने वाली है।

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सो, नोट रखें जून-सितंबर के चार महीने भारत में महामारी की पहली पीक अवस्था वाले होने हैं। अभी जो संक्रमित मरीजों का आंकड़ा है और उनके दोगुने होने की रफ्तार को 10 दिन या 12 या 14 दिन मानें, सभी पैमाने में भारत सितंबर तक दुनिया का नंबर एक संक्रमित याकि अमेरिका से भी अधिक मरीज लिए हुए देश हो सकता है।

हां, शुक्रवार सुबह संक्रमितों की संख्या 1,18,235 है, यह बारह दिन या चौदह (यदि टेस्ट ज्यादा कराएं तो कम दिनों और फर्जीवाड़े से दबाना बढ़ा दिया तो ज्यादा दिनों में) दिन में दोगुना हो लेकिन जून के आखिर में ही भारत विश्व में आज की 11 वीं स्थिति से दूसरी-तीसरी याकि रूस, ब्राजील जितने बीमार लिए हुए होने में कंपीट करता मिलेगा। अगस्त में भारत तेजी से अमेरिका को पछाड़ता हुआ होगा। उसके बाद फिर भारत का भगवान ही मालिक है। तब भारत में हम लोगों को समझ आएगा कि अमेरिका और न्यूयॉर्क में कोविड-19 ने क्या कहर बरपाया था और उसके आगे भारत में सड़क पर दम तोड़ते मरीजों की इमेज में हम अब किससे अपनी तुलना करें!

ईश्वर करें मैं बुरी तरह, सिरे से गलत, झूठा साबित हो जाऊं। लेकिन फिलहाल बहुत गिड़गिड़ाते, विनम्रता से पाठक-माईबाप से अनुरोध है कि वे संकट को समझें। सरकार की तरह लापरवाही-मुगालता-मूर्खता न पालें। जून से ज्योंहि मानसून शुरू हो अपने आपको घर के कमरे में समेटे। क्योंकि मॉनसून के वक्त की आर्द्रता, पसीने मे एसी का उपयोग कार में भी अनिवार्य बनाता है तो ऑफिस में भी। जुकाम, फ्लू या कि किसी से भी संक्रमण पलक झपकते शरीर से घुसता है। मतलब एक जून याकि मॉनसून की बारिश शुरू हुई नहीं कि हम लोगों को अपने को ‘एबनॉर्मल’ असामान्य जीवन जीना है। अच्छा होगा यदि केंद्र सरकार, सभी सरकारें मॉनसून से पहले घर के लिए तड़पते लोगों, पैदल यात्रियों को 15 जून से पहले उनके घर पहुंचा दे। गर्मी से ज्यादा बारिश का वक्त बीमारी के नाते खतरनाक है तो इसे समझते हुए मुंबई, दिल्ली सभी महानगरों में फड़फड़ाते लोग यदि उससे पहले अपने घर पहुंचें तो उनको भी खतरा कम होगा और महानगरों का प्रशासन भी बाकी आबादी को कुछ संभाल सकेगा।

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