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विदेशी शिक्षा का तिलिस्म

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हम कैसे भारत को फिर से दुनिया का ज्ञान-गुरु बना सकते हैं, इसे लेकर बीते अरसे से काफी बातें हुई हैं। लेकिन इस उद्देश्य को लेकर कई स्तरों पर उलझनें इतनी हैं कि खुद भारतीयों में अपने देश की शिक्षा को लेकर भरोसा नहीं बन पाया। ऐसे में जिस परिवार के पास शिक्षा के लिए थोड़े ज्यादा पैसे खर्च करने की हैसियत हुई, उसने अपने बच्चों का दाखिला विदेशी विश्वविद्यालयों में करवा कर ही दम लिया है।
नतीजा यह है कि वर्ष 2014 में जहां 1.8 लाख भारतीय छात्र विदेशी विश्व विद्यालयों में थे, तो 2018 में यह संख्या बढ़कर साढ़े सात लाख जा पहुंची। हम नहीं जानते कि हमारे देश में सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों में अपने ही छात्रों को लुभाने लायक माहौल कब और कैसे बन पाएगा, लेकिन कोरोना काल में इधर एक मौका पैदा हुआ, जब देश के योजनाकारों और शिक्षाविदों को इस मसले पर चिंतन करना चाहिए और वे सारे प्रयास करने चाहिए, जिससे कि हम अपने युवाओं को देश में ही रहकर बेहतर शिक्षा पाने के लिए प्रेरित कर सकें।
फिलहाल स्थिति यह है कि अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया समेत कई विकसित देशों के कैंपसों में या तो ताला लग चुका है या फिर उनके छात्रों को किसी तरह ऑनलाइन पाठ्यक्रम मुहैया कराए जा रहे हैं। कुछ अमेरिकी विश्वविद्यालयों की सजीव कक्षाओं को अगले साल जनवरी तक के लिए ऑनलाइन मोड में डाल दिया गया है।
इन हालात में फंसकर भारतीय छात्र जहां स्वदेश वापसी की राह ताक रहे हैं, वहीं स्थानीय छात्र तो ऑनलाइन शिक्षा मुहैया कराने पर नाराजगी दिखाते हुए महंगी फीस की वापसी की मांग तक उठा चुके हैं। भारतीय छात्रों के संदर्भ में देखें, तो उच्च शिक्षा के लिए उनका विदेशी जमीनों का रुख करना सिर्फ प्रतिभा पलायन का मामला नहीं बनता, बल्कि इसके कई आर्थिक पहलू भी हैं।
विदेशी यूनिवर्सिटी की ट्यूशन फीस के अलावा वहां छात्रों के रहन-सहन पर भी भारी खर्च आता है। इस संबंध में भारतीय रिजर्व बैंक (लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम) का आंकड़ा है कि विदेशी शिक्षा और छात्रों के मेंटेनेंस के लिए देश से बाहर जाने वाली रकम में पिछले तीन वित्तीय वर्षों में ही दोगुने से ज्यादा बढ़ोतरी हो गई है।
इसमें संदेह नहीं है कि चाहे देसी हो या विदेशी, अच्छी शिक्षा लगातार महंगी हो रही है। विदेशी डिग्री का मोह क्यों है, इसकी एक पड़ताल वर्ष 2014 में एक गैरलाभकारी आर्थिक संगठन – एसोचैम ने टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के साथ मिलकर की थी। दोनों संगठनों ने विदेशी डिग्री के मोह पर किए सर्वेक्षण के आधार पर ‘रीअलाइनिंग स्किलिंग टुवर्ड्स मेक इन इंडिया’ नामक रिपोर्ट तैयार की थी। रिपोर्ट में बताया गया था कि विदेशी कॉलेजों-विश्वविद्यालयों की कथित ऊंची रैंकिंग में फंसकर भारतीय अभिभावक हर साल अपने बच्चों को शिक्षा के लिए विदेश भेजने पर न्यूनतम छह से सात अरब डॉलर की भारी-भरकम रकम खर्च करते हैं। इसके लिए वे बैंकों से कर्ज लेने में भी पीछे नहीं रहते। जबकि इसकी सच्चाई यह है कि अधिकांश छात्रों को नामी- प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में दाखिला नहीं मिलता।
इसकी जगह वे ऐसे वैकल्पिक संस्थानों में जाकर पढ़ाई करते हैं, जिनका दर्जा भारतीय यूनिवर्सिटीज से भी काफी नीचे है। हमारे देश में विदेशी शिक्षा के आकर्षण की एक वाजिब वजह यह भी है कि उच्च शिक्षा की रैंकिंग के पैमाने पर अभी हमारा देश दुनिया में कहीं नहीं ठहरता। कोरोना संकट के समय कई समीकरण बदल रहे हैं।
इधर जिस तरह से चीन ने कोरोना की उत्पत्ति के केंद्र की स्वतंत्र जांच की मांग उठाने वाले ऑस्ट्रेलिया से मांस और जौ के निर्यात पर फौरी पाबंदी लगाई है और चीनी छात्रों के ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालयों में जाने को लेकर वहां रोक लगाने की मांग उठी है, भारत को भी कम से कम विदेशी शिक्षा के आकर्षण को थामने के लिए कुछ प्रयास करने होंगे। यह मौका है, जब भारत को नॉलेज पावर बनने का हर नुस्खा आजमाना होगा और यह साबित करना होगा कि उच्च शिक्षा में भी उसका दखल दुनिया के नामी शिक्षण संस्थानों को चुनौती दे सकता है।

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