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वृन्दावन के गीता आश्रम की नारायण सेवा बेसहारों का बनी सहारा

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मथुरा 14 जून (सन्मार्ग लाइव) उत्तर प्रदेश में राधा की नगरी वृन्दावन में चल रही नर सेवा नारायण सेवा इस कोरोना काल में बेसहारा लोगों का बड़ा सहारा बने के सामने आयी है ।

इस आश्रम में चल रही नर सेवा नारायण सेवा की सबसे बड़ी विशेषता भावात्मक सेवा है । आश्रम के प्रमुख से लेकर भेाजन वितरित करनेवाले के चेहरे पर कृतज्ञता का भाव उस समय स्पष्ट दिखाई पड़ता है जब कोई संत या अन्य व्यक्ति आश्रम के इस प्रसाद को स्वीकार कर लेता है।

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गीता के परम विद्वान महान संत गीतानन्द जी महराज ने हरिद्वार, कुरूक्षेत्र, पानीपत, लुधियाना, बांसवाड़ा रूद्रप्रयाग, करनाल एवं कुल्लू मे स्वयं द्वारा स्थापित आश्रमों में अन्न क्षेत्र की स्थापना करने के बाद वृन्दावन में गीता आश्रम की स्थापना कर अन्नक्षेत्र का कार्य शुरू कराया था । तब किसी ने यह कल्पना नही की थी कि कोरोना वायरस के संक्रमण का ऐसा समय आएगा जिसमें सहारा देनेवाले कुछ लोग बेसहारा बन जाएंगे किंतु आज के संदर्भ में इस महान संत की परिकल्पना भूखे को भेाजन और प्यासे को पानी देने का सहारा बन चुकी है।

गीता आश्रम के प्रमुख महामंडलेश्वर अवशेषानन्द महराज ने कहा कि एक बार किसी पत्रकार ने गीतानन्द महराज से प्रश्न किया था कि वे अपने आश्रमों में संतों और गरीबों को नित्य भोजन कराकर उन्हें निठल्ले क्यों बना रहे है तथा उन्हें कोई रोजगार न करने की प्रेरणा क्यों दे रहे हैं तो उन्होंने कहा था कि सरकार भी गंभीर अपराधों में लिप्त अपराधियों को जेल में मुफ्त भोजन देती है।

वे चाहते हैं कि अपना घरबार छोड़कर जो संत भगवत भजन के लिए वृन्दावन समेत उक्त स्थानों में आए हैं उनके सामने भोजन की समस्या न हो क्योंकि तभी वे सही तरीके से भगवत भजन भी कर पाएंगे।इसीलिए उन्होंने अपने उक्त आश्रमों में शाम के वक्त का भोजन देने की व्यवस्था की है।भोजन के समय जो अन्य लोग भी आ जाते हैं उन्हे संतो के भोजन करने के बाद भोजन दिया जाता है क्योंकि वास्तव में यही ’’नारायण सेवा’’ है। उन्होंने यह भी कहा था कि इस व्यवस्था में उनका कोई विशेष योगदान नही है । दानदाता उन्हें धनराशि दे जाते हैं तथा वे पोस्टमैन की तरह इस राशि को भोजन देने के रूप में रूप में बदल देते हैं।

वर्तमान में संतो के अलावा ऐसे लोग भी आ जाते हैं जो अच्छे परिवार के होने के बावजूद लाकडाउन में फंस गए हैं तथा जिनके सामने भोजन की समस्या है। संतो समेत सामान्यत लगभग 500 लोगों को सत्कार के साथ भोजन दिया जा रहा है। श्रावण से शुरू होनेवाले चातुर्मास में यह संख्या कई गुना हो जाती है। सभी आश्रमों में इसी प्रकार की व्यवस्था है तथा संतो या भोजन के इच्छुक आनेवालों को कभी निराश नही किया जाता भले ही दुबारा भोजन क्यों न बनाना पड़े। भोजन में दाल, चावल, रोटी, सब्जी और मठा या छांछ नित्य दिया जाता है तथा भंडारा होने पर खीर और पूड़ी इसमें और शामिल हो जाती है।

सोशल डिस्टैंसिग का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। सामान्य दिनों में आश्रम के हाल में बैठाकर थाली में इन्हें भोजन ही नही कराया जाता बल्कि थालियों को साफ करने की व्यवस्था भी आश्रम द्वारा ही की जाती है।

अवशेषानन्द ने कहा कि संतो को एकत्र करना और उनके लिए रोटी बेलना दो प्रमुख समस्याएं इस अनुष्ठान में कभी कभी बाधक बनती हैं। संतों को एकत्र करने के लिए जहां संतों में ही एक ’’कोतवाल’’ होता है जो संतों को एकत्र करके लाता है वहीं रोटी बेलने का कार्य आश्रम में रहनेवाले संस्कृत के वेदपाठी करते हैं पर कभी कभी इन वेदपाठियों के घर से समय से न लौटने या अस्वस्थ हो जाने से इनकी संख्या कम हो जाती है तब आश्रम का हर व्यक्ति रोटी बेलने में लग जाता है।आश्रम में रहनेवाले वेदपाठियों के आवास, भोजन, शिक्षण, वस्त्र आदि की व्यवस्था आश्रम द्वारा ही की जाती है। संतों को और गरीबों को जाड़ा शुरू होने के पहले ऊनी मोजे, ऊनी पैजामें, पूरी आस्तीन की गर्म बनियाइन, टोपा, पूरे आस्तीन का स्वेटर, शाल, कम्बल, चप्पल आदि निःशुल्क रूप से हर साल वितरित किया जाता है।

सं विनोद

सन्मार्ग

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