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सत्ता के लालच में सियासी कोहराम

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विनम्र और तामझाम से दूर रहने वाले मुख्यमंत्री अशोक गहलोत गाहे-बगाहे ही उग्र तेवर अपनाते हैं। लेकिन 24 जुलाई को यह नौबत तब आई जब विधानसभा का सत्र बुलाने को लेकर राज्यपाल से टकराव के हालात पैदा हो गए। राज्यपाल कलराज मिश्र द्वारा सत्र बुलाने में अनुमति नहीं देने पर गहलोत समर्थक विधायक सवा पांच घंटे तक राजभवन के लॉन में अघोषित धरने पर बैठे रहे। असहमति को संभालने का गहलोत का तरीका आदर्शवादी था कि हमें गांधीवादी तरीके से पेश आना है। राज्यपाल संविधान के मुखिया हैं। हम उनसे टकराव नहीं चाहते। लेकिन सयाने किस्म के महत्वाकांक्षी राजनेता भी हल्के-फुल्के नारे तो लगा ही बैठे। क्या इस स्थिति ने राज्यपाल को आहत किया? जब राज्यपाल सत्र बुलाने की इजाजत नहीं दे रहे थे तो गहलोत अपने आवेश पर काबू नहीं रख पाए और कह बैठे कि जनता राजभवन का घेराव करेगी तो हमारी जिम्मेदारी नहीं होगी। गहलोत का कहना था कि संवैधानिक बाध्यता है कि राज्यपाल कैबिनेट की सलाह से चलते हैं। दूसरे शब्दों में समझें तो राज्यपाल बाध्य है। संसदीय परम्परा को समझें तो कैबिनेट की सूचना पर राज्यपाल सत्र बुलाने का वारंट जारी करते हैं। राज्यपाल का तर्क था कि अल्प सूचना पर सत्र बुलाने का ना तो कोई औचित्य बताया गया और ना ही एजेंडा भेजा गया। सरकार के पास बहुमत है, तो विश्वास मत प्राप्त करने के लिए सत्र आहूत करने का क्या औचित्य है? सरकार अब नया प्रस्ताव तैयार करके राज्यपाल के पास भेजेगी। कलहप्रिय पायलट से जूझते हुए गहलोत एक लाचार राजनेता की अपेक्षा और कद्दावर नेता के रूप में उभरे। हालांकि सियासत को लेकर आस्तीनें चढ़ा लेना कोई नई बात नहीं है। नतीजतन प्रतिपक्ष नेता गुलाब चंद कटारिया गुस्से से फट पड़ने से नहीं चूकेे कि राजभवन की सुरक्षा के लिए अब केन्द्रीय पुलिस बल को लगाया जाना चाहिए। कटारिया यह क्यों भूल गए कि 1993 में पूर्व मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत भी ऐसे ही राजभवन में धरने पर बैठे थे, तब क्या केन्द्रीय पुलिस बल लगाने की बात उठी थी? सदन में दलगत गणित समझें तो, 102 विधायकों के समर्थन का दावा कर चुके गहलोत बहुमत साबित कर लेंगे। सूत्रों का कहना है कि भाजपा की उंगलियां सरकार गिराओ प्रत्यंचा पर हैं। ऐसे में भाजपा क्यों चाहेगी कि सरकार सत्र बुलाकर पायलट गुट पर कार्रवाई करे। दूसरी तस्वीर भी देखिए। राज्य सरकार द्वारा सत्र बुलाने का दूसरा प्रस्ताव भेजने पर नियमानुसार राज्यपाल मना तो नहीं कर सकते। किन्तु तुरंत सत्र बुलाने की अनुमति दे देंगे? इसमें संदेह है। सरकार की मंशा सत्र बुलाकर विधेयक लाने के लिए व्हिप जारी करने की हो सकती है। नतीजतन सदस्यता गंवाने के मामले में बागी विधायक सीधे निशाने पर आ जाएंगे। मामला तब सुलगा जब राज्यसभा चुनावों में केवल एक सीट ही जीतने की स्थिति वाली भाजपा ने दो प्रत्याशी खड़े कर दिए। राहुल गांधी के अभिन्न सखा भंवर जितेन्द्र सिंह ने उन्हें बताया कि इस कारस्तानी के पीछे सचिन पायलट अदृश्य रूप से खड़े हुए हैं ताकि कांग्रेस प्रत्याशी हारे और मुख्यमंत्री गहलोत की किरकिरी हो जाए। राहुल ने कांग्रेस प्रत्याशी वेणुगोपाल को बुलाकर पूछा तो बात सच निकली। इस पर बहस छिड़ी तो पायलट के तेवरों ने आग में घी का काम किया। मुख्यमंत्री के कहने पर एसओजी ने विधायकों की खरीद फरोख्त कर कांग्रेस सरकार गिराने की साजिश का खुलासा कर दिया। तीन ऑडियो वायरल हुए। इनमें 30 विधायकों की संख्या पूरी होने पर सरकार के घुटने पर आने की बात की जा रही थी। यहां सचिन पायलट ही खलनायक नजर आ रहे थे। ऑडियो में संवाद की एक धुरी कथित रूप से केन्द्रीय जलशक्ति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत भी थे। नतीजतन एसओजी ने शेखावत को भी नोटिस भेज दिया। लेकिन शेखावत ने कह दिया कि पहले इसकी सच्चाई की परख तो करो? उधर, पायलट जब बगावती तेवरों से पीछे नहीं हटे तो आलाकमान ने उन्हें एक के बाद एक चार बड़े झटके दिए। डिप्टी चीफ मिनिस्टर का पद छीनते हुए उन्हें प्रदेश अध्यक्ष पद से बर्खास्त कर दिया गया। पायलट के दो बड़े समर्थक रमेश मीणा और विश्वेन्द्र सिंह से मंत्री पद छीन लिया। साथ ही जाट नेता गोविन्द सिंह डोटासरा को नया प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया। बर्खास्तगी से बोखलाए पायलट ने गहलोत के खिलाफ खुलकर सियासी तलवारबाजी की शुरूआत कर दी कि गहलोत जनता से किए वादे पूरे करने की बजाय पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की मदद कर रहे हैं। उन्होंने अटकलों पर विराम लगा दिया कि मैं कट्टर कांग्रेसी हूं, भाजपा में नहीं जाऊंगा। मैंने यह कदम आत्मसम्मान और सत्य की लड़ाई के लिए उठाया है। उधर गहलोत ने पायलट पर तंज कसते हुए कहा कि सोने की छुरी खाने के लिए नहीं होती। अब भी समझ जाओ… चालीस साल के हो गए हो? इस बीच पायलट समर्थक 19 विधायकों की गैर मौजूदगी ने नए अंदेशों को जन्म दिया। नतीजतन विधानसभा अध्यक्ष सी.पी. जोशी ने मुख्य सचेतक महेश जोशी की शिकायत पर इन विधायकों को जवाबतलबी के नोटिस थमा दिए कि जवाब दें पार्टी में हैं या नहीं? राजस्थान में कांग्रेस की सबसे बड़ी सियासी कलह के बीच पायलट समेत 19 विधायकों को गया अयोग्यता नोटिस अदालती कार्रवाई में फंस गया। इस सियासी घमासान में भाजपा विधायक कैलाश मेघवाल ने कहा कि प्रदेश में गहलोत सरकार गिराने की साजिश हो रही है। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। सूत्र बताते हैं कि राजस्थान में ‘आपरेशन कमल’ किसी भी वक्त सक्रिय किया जा सकता है। सूत्रों का कहना था कि शेखावत को दिल्ली बुलाकर राज्य की ताजा स्थिति पर नजर रखने को कहा गया है। उन्हें कहा गया है कि स्थिति अनुकूल हेाते ही रणनीति सक्रिय कर दें। उधर, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया का कहना है कि ड्रामे में नायक, खलनायक दोनों कांग्रेस हैं, फिर भाजपा पर तोहमत क्यों? विश्लेषकों का सवाल है कि तो गहलोत के निकटस्थों पर छापेमारी क्यों? हरियाणा की खट्टर सरकार पायलट गुट को संरक्षण क्यों दे रही है? उधर गहलोत ने पायलट को निकम्मा, नाकारा और धोखेबाज बताया। कहा, ‘मैं यहां बैंगन बेचने नहीं, सीएम बनने आया हूं।’ राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच अदावत नई नहीं है। वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद पायलट को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया जबकि गहलोत केंद्र की सियासत में चले गए। गहलोत के प्रभार वाले कुछ राज्यों में कांग्रेस ने अच्छा प्रदर्शन किया। वह कांग्रेस में संगठन महासचिव भी बन गए। वर्ष 2018 के चुनाव में कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का चेहरा किसी को नहीं बनाया। ऐसे में चुनाव जीतने के बाद मुख्यमंत्री बनने के लिए गहलोत और पायलट में विवाद बढ़ गया।
गहलोत खेमा बदलना चाहता था प्रदेशाध्यक्ष राहुल के दखल के बाद सचिन पायलट उप मुख्यमंत्री बनने के लिए राजी हुए लेकिन राज्य में पार्टी की सरकार बनने के बाद भी सब कुछ ठीक-ठाक नहीं रहा। पायलट को अध्यक्ष बने छह साल से अधिक समय हो गया। अगले कुछ माह में पंचायत व नगर निकायों के चुनाव भी होने हैं। इनमें टिकट वितरण के लिए गहलोत खेमा चुनाव से पहले हर हाल में प्रदेश अध्यक्ष बदलवाने की कोशिश में लगा था। पिछले दिनों संगठन महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने कई नेताओं से इसे लेकर चर्चा भी की। पायलट इन चुनावों तक अध्यक्ष बने रहना चाहते थे। इस बीच विधायकों की खरीद-फरोख्त का शोर मचा और एसओजी ने उप मुख्यमंत्री को बयान के लिए नोटिस देने से मामला बिगड़ गया। पायलट बगावत पर उतर आए। उधर पायलट का कहना है कि मैं कांग्रेस में रहकर ही अपनी लड़ाई लड़ूंगा। मेरी लड़ाई अशोक गहलोत के खिलाफ है। इसलिए कांग्रेस में रहकर ही लड़ाई लडूंगा। जिन विधायकों ने बयानों के जरिए मेरी छवि खराब की है, वे सभी कानूनी कार्रवाई के लिए तैयार रहें। पायलट शनिवार 11 जुलाई के घटनाक्रम पर क्या कहेंगे? उस दिन वे ज्योतिरादित्य सिंधिया और सिंधिया को भाजपा में ले जाने वाले भाजपा प्रवक्ता जफर इस्लाम से क्यों मिले थे? सिंधिया का यह बयान क्या मायने रखता है कि अपने पुराने साथी सचिन पायलट की स्थिति देखकर बहुत दुखी हूं।

मुख्यमंत्री गहलोत ने उन्हें दरकिनार किया। उसी दिन पायलट के बयान का क्या अर्थ लगाया जाए कि मेरे साथ 30 विधायक हैं और गहलोत सरकार अल्पमत में है? सूत्रों की मानें तो सचिन पायलट की मंशा से तो गहलोत सिंधिया की बगावत के दौरान ही वाक़िफ़ हो गए थे। सूत्रों ने पायलट की कमजोर नस का भी हवाला दे दिया था कि भाजपा को गहलोत सरकार को हिलाने के लिए 40 विधायकों की जरूरत होगी। पायलट इतने विधायक नहीं जुटा पाएंगे। फिर भाजपा क्यों कर पायलट को मुख्यमंत्री बनाने का तोहफा देती? पायलट को अचानक लगा कि मैं मुख्यमंत्री क्यों नहीं? डिप्टी चीफ मिनिस्टर का पद अपमान का घूंट लग रहा था। वरिष्ठ पत्रकार गुलाब कोठारी कहते हैं कि सारे राजकुमार कांग्रेस की नाव में छेद कर रहे हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी कीमत वसूल ली। सचिन कांग्रेस को धूल चटाने उठ खड़े हुए हैं?
गहलोत का दावा है कि उनके पास 105 विधायकों का समर्थन है। पायलट ने बड़ी जल्दबाजी में अपना गुणाभाग किया अथवा वे गहलोत के बिछाए जाल में फंस गए।
कोर्ट अगर विधानसभा अध्यक्ष के खिलाफ फैसला देता है, तो कांग्रेस सदन में बहुमत साबित करने का जोखिम उठा सकती है। कांग्रेस के शीर्ष नेता चाहते हैं कि मध्यप्रदेश आदि राज्यों की तरह कोर्ट से बहुमत साबित करने के निर्देश आए, इससे पहले मुख्यमंत्री बहुमत साबित कर लें। बहुमत साबित होने पर पार्टी का मनोबल बढ़ेगा और पायलट खेमे को सबक मिलेगा। सूत्रों की मानें तो राजस्थान में कांग्रेस के नेता अब सरकार बचाने और पार्टी को मजबूत करने मे जुटे हैं।

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