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सरसों के फूल खिले पर फसलों की बर्वादी से किसानों की जेब ढ़ीले

मौसम के बदलते मिजाज से इस वर्ष बसंती बयार से पहले कैमूर जिले के कई क्षेत्रों में सरसों के फूल खिलने लगे हैं। मगर कुदरत की मार से फसलों की बर्वादी हो जाने से किसानों की पॉकिट ढ़ीले दिख रहे हैं । जो किसानों के अर्थव्यवस्था पर संकट का संकेत दे रहा है।

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मनुं कुमार सिंह, संवाददाता

कैमूर:- जिले में मौसम के बदलते मिजाज से इस वर्ष बसंती बयार से पहले कैमूर जिले के कई क्षेत्रों में सरसों के फूल खिलने लगे हैं। मगर कुदरत की मार से फसलों की बर्वादी हो जाने से किसानों की पॉकिट ढ़ीले दिख रहे हैं । जो किसानों के अर्थव्यवस्था पर संकट का संकेत दे रहा है। जिससे किसान इनदिनों चिंतित दिख रहे हैं। मौसम के बिगड़े मिजाज से किसानों की धान की फसल की फसल पहले ही बर्वाद हो गया है और मौसम का रंग देख रवी की फसलों की बर्बादी की आसार नजर आ रहा है।

ग्रामीण किसान कन्हैया सिंह, पप्पू यादव, हरेंद्र कुशवाहा,ने बताया कि किसानों की फसलों की बर्बादी का लाभ नहीं मिलने से किसानों की बोझ बढ़ गई हैं।हालांकि बसंती बयार से पहले सरसों के फूल खिलने से क्षेत्र के मैदानों में गुलशन का गुलज़ार छाया हुआ है। जबकि लोगों का मानना है कि बसंती बयार जब बहता है तो सरसों व विभिन्न पौधें का फूल खिलने लगते हैं लेकिन वैज्ञानिक युग में सारी कहावतें बस मुँहबरा बन कर दिख रही हैं। बताते चलें कि क्षेत्र के अधिकतर किसानों द्वारा अक्टूबर माह में ही सरसों की फसल बुआई कर दिया गया है जो कि इस समय पुष की मास में खिल उठे हैं।

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बहुत किसानों द्वारा रबी की फसल के समय सरसों की बुआई किया जाता है जो कि बसंत ऋतु में खिलने लगते हैं और फागुन के महीने में खिले सरसों को अहम रोल मना जाता हैं साथ साथ बहुत से लोग सरसों की खिलने पर फागुन का आसार मानते हुए संगीत भी गाते हैं जो कि आज भी गूंजता हैं, बसंती बयार बहे सरसों फुलाइल एहो पिया कहा बाड़ तू भुलाईल। लेकिन ए कहावत वैज्ञानिक युग में चरितार्थ होते नहीं दिख रहा है। इस संम्बंध में किसान जिला परिकोष्ठ के अध्यक्ष धीरज कुमार सिंह ने बताया कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बहुत सारे पौधे व फसल बारहों महीने खिलने लगें हैं।

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