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अपने देश की फिल्में नहीं देख रहे पाकिस्तानी, कर रहे हिंदी फिल्मों की मांग

Pakistanis are not watching the films of their country, demand for Hindi films

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अगस्त 2019 में जब भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 और 35 A को निष्प्रभावी किया था तब खिसियाई पाकिस्तानी सरकार ने अपने देश में हिंदी सिनेमा पर रोक लगा दी थी. ऐसा पाकिस्तान में पहले भी कई बार किया जा चुका है. लेकिन पाकिस्तानी दर्शकों में भारतीय सिनेमा की मांग बढ़ रही है. ये कोई ढकी-छिपी बात नहीं है कि पाकिस्तान में हिंदी सिनेमा की बड़ी दीवानगी रही है. हिंदी फिल्मों पर बैन लगा दिए जाने के बाद से देश का सिनेमा बाजार भी मुश्किलों का सामना कर रहा है. अभी हाल ही में पाकिस्तानी विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री फवाद चौधरी ने नेटफ्लिक्स और अमेजन से फिल्मों में पैसा लगाने की अपील की है.

सिनेमाघरों की हालत खराब
अगर साल 2019 की बात की जाए तो पाकिस्तान में सिर्फ 22 उर्दू फिल्में बनीं. अगर सभी फिल्मों के कारोबार की बात की जाए तो यह महज 150 करोड़ रुपये के आंकड़े को छूता है. कुछ फिल्मों ने अच्छा किया जैसे माहिरा खान की सुपरस्टार और मिकाल जुल्फिकार की शेरदिल, लेकिन ये फिल्में भी लंबे समय तक सिनेमाघरों में टिकी नहीं रह सकीं. हालत ये हो गई है सिनेमाघर टिकट पर 50 प्रतिशत का डिस्काउंट तक दे रहे हैं, जिससे हॉल भरा रहे. इसके बावजूद पाकिस्तानी दर्शक फिल्मों को नकार रहे हैं.

देश की फिल्में पसंद नहीं कर रहे दर्शक
हिंदी फिल्मों पर पाकिस्तान में बैन जरूर है लेकिन पायरेटेड सिनेमा उन तक पहुंच ही जाता है. पायरेटेड डीवीडी में हिंदी फिल्में देखने के बाद पाकिस्तानी सिनेमाप्रेमियों को अपने देश की फिल्में नहीं पसंद आ रही हैं. यहां तक कि बेहद राष्ट्रवादी फिल्में जैसे काफ कंगना ने बॉक्स ऑफिस पर पानी तक नहीं मांगा. इस फिल्म में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई का पैसा लगा था. फिल्मों की हालत देखकर डिस्ट्रीब्यूटर्स का कहना है कि आखिरकार इमरान सरकार को हिंदी फिल्मों पर से बैन हटाना ही पड़ेगा. द प्रिंट में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक डिस्ट्रीब्यूटर्स ने अंग्रेजी फिल्में भी लगाईं लेकिन दर्शकों के बीच सबसे ज्यादा मांग हिंदी सिनेमा की है. डिस्ट्रीब्यूटर्स चाहते हैं कि इमरान सरकार जल्द से जल्द हिंदी फिल्मों पर से बैन हटा ले.

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पाकिस्तानी इंटरटेनमेंट का ईंधन भारतीय फिल्मेंपाकिस्तानी इंटरटेनमेंट और फिल्म इंडस्ट्री के लिए भारतीय फिल्में ईंधन का काम करती हैं. 1947 में भारत पाकिस्तान का बंटवारा भले हो गया हो लेकिन हिंदी फिल्मों की डिमांड पाकिस्तान में हमेशा बनी रही. 1950 के दशक में दोनों देशों में ठीक-ठाक फिल्में बन रही थीं. लेकिन वक्त के साथ हिंदी फिल्म इंडस्ट्री पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री से मीलों आगे निकल गई. पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों की लोकप्रियता इस वजह से भी है क्योंकि वहां की फिल्में बॉलीवुड का मुकाबला नहीं कर पातीं. पाकिस्तान में भारतीय फिल्मों पर प्रतिबंध का एक लंबा दौर 1965 से 2005 तक चला था. ये ही वो साल थे जब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री बढ़ती चली गई और पाकिस्तान कंगाली की हालत में पहुंच गया. एक आंकड़े के मुताबिक बैन लगने से पहले तक पाकिस्तान में सिनेमा के कुल रेवेन्यू का 70 फीसदी हिस्सा भारतीय फिल्मों से आया था.

 

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