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लाउडस्पीकर से पढ़ रहा पूरा गांव, औंकार आवामी की सरकार से अपील झारखंड में भी हो ऐसी पढ़ाई

The whole village studying with loudspeakers, the appeal of Aunkar Awami to the government should also be done in Jharkhand

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ये है छत्तीसगढ़ का बस्तर ब्लॉक का भाटपाल गांव जहां सुबह और शाम डेढ़ घंटे तक लाउडस्पीकर से पढ़ाई होती है. यहां के कलेक्टर साहब ने कहा- ये व्यवस्था पूरे जिले में लागू करेंगे. अब तक गांव में लाउडस्पीकर के जरिए भक्ति गाने या अजान की आवाज ही पूरे गांव में सुनाई देती रही है लेकिन प्रशासन ने अब इसी लाउडस्पीकर को लोगों को शिक्षित करने का माध्यम बना लिया है। इसके जरिए छात्र-छात्राएं तो पढ़ाई तो कर ही रहे हैं, उनके परिजन और ग्रामीणों को भी शिक्षित किया जा रहा है। कोरोना काल में पढ़ाई के नुकसान की भरपाई करने के कई प्रयास किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में पढ़ाई आपके द्वार के तहत बस्तर ब्लॉक के भाटपाल में एक अभिनव प्रयोग शुरू किया गया है।यहां बच्चे सोशल डिस्टेंसिंग अपनाते हुए पढ़ाई करते हैं. शिक्षक भी पढ़ाई के दौरान गाइड करते हैं और मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग के अहमियत को बताते भी हैं.

कम्युनिटी रेडियो की तर्ज पर दी जा रही शिक्षा

आजकल तो सभी लोग कक्षा शुरू होने का इंतजार करते हैं. इस नई व्यवस्था से गांव के सारे लोग जुड़ रहे हैं। शुरुआत में लोगों को समझ में नहीं आया लेकिन अब वे लाउडस्पीकर पर कक्षा शुरू होने का इंतजार करने लगे हैं। गांव के सचिव रूपसिंह बघेल और शिक्षक लखन कश्यप भी इससे जुड़े हुए हैं और अपनी ओर से बच्चों के लिए पेन कॉपी लाकर दे रहे हैं। साथ ही शाम की कक्षा में मच्छर से बचने के उपाय भी कर रहे हैं। कलेक्टर रजत बंसल ने बताया कि कम्युनिटी रेडियो की तर्ज पर भाटपाल में प्रायोगिक रूप से लोगों को मनोरंजन के साथ शिक्षा से जोड़ा जा रहा है। यहां कुपोषण दूर करने और शासन की अन्य योजनाओं की जानकारी भी दी जा रही है। इसका रिस्पांस अच्छा मिला है, जल्दी ही इसे शासन की अन्य योजनाओं से भी जोड़ा जाएगा और जिले भर में लागू किया जाएगा।

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स्थानीय बोली में कहानी से अंग्रेजी सिखाने की कोशिश

इसमें पंचतंत्र की कहानियां, अमर चित्र कथा, महापुरुषों की जीवनी का प्रसारण किया जाएगा। इसके अलावा कुपोषण दूर करने के संबंध में जानकारी दी जाएगी। लोगों में जागरूक करने के प्रयास होंगे। इसके साथ ही स्थानीय बोली हल्बी में कहानी के माध्यम से अंग्रेजी सिखाने की कोशिश की जा रही है। इसमें तीन पात्र लच्छू दादा, दसरी और कालिया हैं, जो आपस में संवाद करते हैं। उन्होंने बताया कि गणित और विज्ञान की पढ़ाई भले ही इस माध्यम से न हो लेकिन अन्य विषयों को आसानी से पढ़ाया जा सकता है। फिलहाल पढ़ाई का समय सुबह डेढ़ और शाम को डेढ़ घंटा रखा गया है। यह अभी प्रयोग के तौर पर यहां किया जा रहा है।

झारखंड में भी शुरु हो ऐसी व्यवस्था

झारखंड में भी कोरोना काल के बढ़ते संक्रमण को लेकर यहां भी शिक्षण संस्थाएं बंद हैं. शहर में तो बच्चे ऑनलाइन पढ़ाई कर ले रहे हैं लेकिन गांवों के बच्चों की पढ़ाई ऑनलाइन नहीं हो पा रही है. बच्चों के माता-पिता के पास एंड्रॉयड मोबाइल नहीं होते हैं. बच्चों की पढ़ाई बिल्कुल भी नहीं हो पा रही है. औंकार आवामी राज्य सरकार से आग्रह करती है कि इस तरह से दिये जाने वाले शिक्षा से यहां के बच्चे भी ऑफलाइन पढ़ाई करेंगे. और भविष्य गढ़ेंगे. लॉउडीस्पीकर से दिये जाने वाली शिक्षा से कोरोना को हराकर शिक्षा का अलख हम झारखंड में भी जगा सकते हैं.

डीजे वालों से लिए जा रहे सहयोग

छत्तीसगढ़ के इस मॉडल में पंचायत द्वारा बच्चों की पढ़ाई के लिए ग्रामों में उपलब्ध या डीजे वालों से सहयोग लेकर लाउड स्पीकर उपलब्ध करवाया जाता है। लाउड स्पीकर से शिक्षक बच्चों को पढ़ाना शुरू करते हैं। बच्चे अपने अपने घर या छोटे-छोटे समूहों में बैठकर ध्यान से पाठों को सुनते हैं। ऐसी कक्षाएं प्रतिदिन राज्यगीत के साथ प्रारंभ होती हैं।

बच्चों को देते हैं होमवर्क भी

भाटपाल गांव में लाउडस्पीकर के माध्यम से बच्चों को विभिन्न कार्य भी प्रदत्त किए जाते हैं और जोड़ी में शिक्षक पाठ के दौरान गांव में घूमकर बच्चों को कार्य करते हुए भी देख सकते हैं। गांव में भी बच्चों की कक्षाएं नियमित लग रही हैं अथवा नहीं, पूरे गांव को पता चल जाता है। स्कूल शिक्षामंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम बस्तर के शिक्षकों के इस नये प्रयोग  से अभिभूत हैं। वहीं उन्होंने सभी जिलों से अपील की है कि वे अपने-अपने जिले की प्रत्येक पंचायत में कम से कम एक स्कूल में इस योजना को उपलब्ध संसाधनों के माध्यम से आगामी एक सप्ताह के भीतर प्रारंभ करें और इसमें पढ़ाने हेतु इच्छुक शिक्षकों और ग्राम से सहयोगियों की व्यवस्था करें। उन्होंने पालकों से भी अपील की है कि सुरक्षा संबंधी सभी मानकों का उपयोग करते हुए बच्चों को घर में रहते हुए लाउड स्पीकर स्कूल से सीखना जारी रखने में सहयोग करें। छत्तीसगढ़ में किया गया यह प्रयोग आज पूरे देश में सराहा जा रहा है.

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