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पर्यटकों को आकर्षित करती है तिरु फॉल

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बुढ़मू – झारखंड की राजधानी रांची से मात्र 40 किलोमीटर दूर बुढ़मू प्रखंड के तिरू फॉल में ऊंचे-ऊंचे पहाड़ और उसमें बिकरे खुबसूरत छंटा,  हरियाली के मनोरम दृष्य, कल-कल करती नदियां, जो झरना के रूप में तिरू फॉल है। युवाओं को अपनी ओर आक्रशित करने वाली पिकनीक स्पोर्ट तिरू जल प्रपात है। यहां पर सुंदर पक्षियों और बंदरों का यहां पर जो दृश्य दिखता है। वह प्रयटकों को अपनी ओर प्रभावित करता है। इस स्थल में एक टेडी़ मेडी़ सिढ़ी का निर्माण लंबे-लंबे पेडो़ के बीच किया गया है। जो झरना के धरातल तक ले जाती है। जहां से सूर्य की किरणों से टक्करा कर झरना का पानी गिरता है। मानो मोतियों की बारीश हो रही हो। इसके साथ ही तिरु राजा से जुड़ी हुई कहानियां और देवी देवताओं के साथ शिव जी के नाग नागिन का रासलीला की कहानी प्रसिद्ध है।

क्या है तिरु फॉल की कहानी

कहा जाता है कि तिरु राजा और उनके गोपियों के संग इस स्थल में रासलीला करने के लिए आते थे। और महिनों इस जगह पर रहते थे। आस पास के आदिवासियों और उनके महिलाओं को इनाम में हीरे जेवरात व अन्य किमती वस्तूओं का उपहार राजा से मिलते थे। जिसके कारण राजा के गोपियों का यहां के लोग सेवा देते थे। इसी कारण इस गांव को तिरूपति राजा के नाम से तिरू गांव रखा। बाद में इस झरना को तिरूफॉल के नाम से कहा जाने लगा। यहां पर जब तिरू राजा आते थे, अपने गोपियों के संग तो पास के ही बीरबल महतो राजा के प्रमुख सेवक हुआ करते थे। जिनकी उम्र वर्तमान में लगभग 95 वर्ष हो चुकी है। और फिल्हाल इसी गांव में निवास करते हैं। जो राजा की सेवा में खाना बनाने से लेकर अन्य सुविधाओं की व्यवस्था करते थे।

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अर्ध निर्मीत मकान में बसे शिवलिंग को कई हिला नहीं सकता

स्थानीय ग्रामीणो के अनुसार इसके साथ ही इस स्थल में उस समय का अर्ध निर्मीत मकान में एक ऐसा शिव लिंग है जो अन्य कोई भी उसे हिला नहीं सकता। लेकिन एक ऐसा व्यक्ति है। जो इस शिव लिंग और शिव का अराधक है। जो असानी से शिव लिंग को हिलाने का ईश्वरीय शक्ति इस अराधक को प्राप्त है। यहां निर्माण हो रहे मंदिर में इनके द्वारा पूजा कराया जाता है। इसके अलावा यहां एक जल कूंड है। जिसे तिरूकुंड भी कहा जाता है। जिसे यहां के स्थानीय भाषा में तिरूकाडी़ के नाम से जाना जाता है। जिसमें सात खटीया का डोर डालने पर भी इसकी गहराई का अंत नहीं मिला है। एक शिव मंदिर का निर्माण हो रहा है जिसका 2020 में पूरा करने के लिए स्थानीय लोगों के द्वारा प्रयासरत किया जा रहा है। इस शिवमंदिर द्वार से नीचे जाने वाले रास्ता में नदी के किनारे भगवान बजरंगबली के नाम पर रामनवमी स्थल बनाया गया है। जहां पर रामनवमी के दूसरे दिन आसपास के युवाओं के द्वारा प्रतियोगिता कराया जाता है। प्रतिभागी इस स्थल पर अपना करतब दिखाते हैं। जिन्हें वहां के कमेटी के लोगों के द्वारा पुरस्कृत किया जाता है। जो वर्षो से चला आ रहा है।

यहां की एक रोचक कहानी यह भी है कि जब तिरु राजा यहां पर अपने गोपियों और सेवकों के साथ रासलीला करने के लिए आते थे। और महीनों तक यहां रहते थे। इस दौरान उनकी गोपियों के द्वारा यहां पर नहाने के दौरान जो बाल टूटते थे उस बाल से एक रस्सी बनाया गया था। उक्त रस्सी और बोधलर की सहायता से एक झूला का निर्माण किया गया था। और इस झूला में बैठकर राजा अपने गोपियों के संग रासलिला करते थे। और राशलीला में राजा और गोपीयां मंग्न स्थिति में थे। और झुला के नीचे वही जलकुंड था। जिसकी निश्चित गहराई आंकलन नहीं थी। इसी दौरान में राजा के दुश्मन रस्सी को काट दिये जिससे तिरूकुंड (जलकुंड) में राजा अपने गोपियां के साथ गिर गए। और वही समा गये। तिरु राजा के कारण ही इस स्थल का नाम तिरुफॉल के नाम से यह जल प्रपात प्रसिद्ध हुआ है। तिरू जल प्रपात के शिर्ष पर नाग-नागिन का गुफा है। जहां नाग नागिन वास करते हैं। यहां के पुराने लोगों के द्वारा यहां पर रह रहे नाग-नागिन को देखा गया है। जिसकी पूजा आज भी लोग करते हैं। साथ ही लोगों का मानना है। यहां काली मां का भी दैविय आस्था जुड़ा हुआ है। जिस कारण यहां के लोग यहां पर काली मां का पुजा अर्चना जल प्रपात के मुहाने पर करते हैं। अपनी मन्नत को मां काली से मांगते हैं। इस लिए यहां के ग्रामीण वर्षो से 14 जनवरी मकर संक्राति के अवसर पर भब्य मेला का आयोजन करते हैं। जहां आस पास के हजारों लोग जुटते हैं। मेला का आनंद लेते है। साथ ही नागपुरी सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन होता है।

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