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प्रधानमंत्री को नकारने की सियासत

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सुरक्षा और समय से पहले किए गए राहत के पर्याप्त बंदोबस्तों के कारण ‘फेनी’ चक्रवाती तूफान ओड़िशा में उतनी बर्बादी और तबाही नहीं मचा सका, जितनी अपेक्षित थी। प्रधानमंत्री मोदी ने उसके लिए मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और सरकारी अधिकारियों के प्रयासों की सराहना की है, लेकिन आपदा में लोगों की मौत भी हुई है और नुकसान भी हुआ है। प्रधानमंत्री ने ओड़िशा के मुख्यमंत्री के साथ तूफान से प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण किया। ओड़िशा की मदद को 1000 करोड़ रुपए का ऐलान भी प्रधानमंत्री ने किया। चूंकि ओड़िशा के बाद चक्रवाती तूफान को पश्चिम बंगाल के तटों से टकराना था, लिहाजा आपात बैठक और हालात की समीक्षा के मद्देनजर प्रधानमंत्री मोदी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को फोन किया। मुख्यमंत्री ने फोन रिसीव नहीं किया। बाद में सफाई दी कि वह खड़गपुर में थीं, लिहाजा फोन पर बात नहीं हो सकी। ममता बनर्जी ने यहां तक बयान दिया ‘मोदी एक्सपायरी बाबू हैं। मैं उन्हें प्रधानमंत्री नहीं मानती। एक्सपायरी पीएम से क्या बात करूं’। यह कोई सामान्य या सियासी बयान नहीं है। यह देश के संविधान का सरासर उल्लंघन है और ममता बनर्जी का ‘राजनीतिक अहंकार’ भी है। यह भारत में ही संभव है। यदि किसी अन्य लोकतांत्रिक और संघीय ढांचे वाले राष्ट्र में एक मुख्यमंत्री ने इतना अतिक्रमण किया होता, तो उसकी सरकार को बर्खास्त तक किया जा चुका होता! चूंकि हमारे देश में आम चुनाव चल रहे हैं, लिहाजा बंगाल सरकार पर केंद्र सरकार कोई संवैधानिक कार्रवाई नहीं कर सकेगी, लेकिन ममता बनर्जी का प्रधानमंत्री को इस तरह नकारना हमारी समूची व्यवस्था को चुनौती देना है। बेशक आम चुनाव से पहले ममता समेत विपक्ष के प्रमुख नेताओं ने नारा दिया था ‘मोदी भगाओ, देश बचाओ।’ इस राजनीतिक नारे की आड़ में या उससे प्रभावित होकर ममता बनर्जी ने संवैधानिक संबंधों की गरिमा पर कालिख पोतने का काम किया है। इससे केंद्र-राज्य संबंध भी बेमानी लगते हैं। यदि ओड़िशा के मुख्यमंत्री, विपक्षी नेता होने के बावजूद प्रधानमंत्री के साथ हवाई सर्वेक्षण कर अपने आपदाग्रस्त इलाकों का जायजा ले सकते हैं और शुरूआती तौर पर अपने राज्य के लोगों की राहत तथा उनके पुनर्वास के लिए 1000 करोड़ रुपए की मदद प्राप्त कर सकते हैं, तो क्या ममता बनर्जी को बंगाल एवं उसके नागरिकों की चिंता नहीं है? क्या ममता दी, अपने संवैधानिक दायित्वों से विमुख हो रही हैं? क्या चुनाव और संवैधानिक हैसियत में कोई अंतर नहीं किया जाना चाहिए? आखिर बंगाल के लोगों ने उन्हें मुख्यमंत्री किसलिए चुना है? दरअसल इस नफरती भाव वाले बयान के गर्भ में राजनीति है। भाजपा ने अपने काडर को लामबंद और सक्रिय कर उस मुकाम तक पहुंचा दिया है, जहां वह ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस को स्पष्ट चुनौती दे रहा है। भाजपा ने इन चुनावों में ‘मिशन 23’ का लक्ष्य रखा है। यानी बंगाल की कुल 42 लोकसभा सीटों में से 23 पर जीत हासिल करने का लक्ष्य! उसका नतीजा यह है कि बंगाल के पांचों चरणों के मतदान बेहद हिंसक रहे हैं। बूथ लूटने की शिकायतें सामने आई हैं। आपसी मारपीट, हाथापाई की नौबत आई है। कुछ मौतों की भी खबर है। यह माहौल इसलिए भी है, क्योंकि दोनों पक्षों में धु्रवीकरण अत्यंत तीव्र है। मसलन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सड़क से गुजरते हुए ‘जय श्रीराम’ के नारे सुने, तो अपना काफिला रोक दिया और कार से उतर कर नारेबाजों पर गुस्सा उतारा। कई ऐसे नारेबाजों को जेल तक में ठूंस दिया गया है। प्रधानमंत्री मोदी ने जनसभाओं में यह मुद्दा उठाकर ममता दी, को चुनौती दी कि वह उन्हें जेल में डालें। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को ध्यान रहना चाहिए कि पश्चिम बंगाल भारत गणराज्य का ही एक हिस्सा है और नरेंद्र मोदी फिलहाल उसके प्रधानमंत्री हैं। पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत चंद्रशेखर कहा करते थे कि प्रधानमंत्री कभी भी कार्यवाहक नहीं होता। वह प्रधानमंत्री तब तक रहता है, जब तक नया प्रधानमंत्री कार्यभार न संभाल ले। ऐसे में ममता के ‘एक्सपायरी पीएम’ की परिभाषा क्या माननी चाहिए? यह कुछ और नहीं, राजनीतिक अराजकता है और ममता की अपनी चुनावी कुंठा है। यदि भाजपा बंगाल में 5-7 सीटें भी जीत जाती है, तो अंतत: वह नुकसान तृणमूल कांग्रेस का ही होगा, क्योंकि कांग्रेस और वाममोर्चा की चुनौतियां बेहद सीमित हैं।

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