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कुष्ठ रोग निवारक है “पुण्यार्क सूर्य मंदिर”

लोगों की मनोकामनायें होती है पूरी

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बाढ़/ अनिल कुमार ।राष्ट्रीय पटल पर राजनैतिक रूप से चर्चित बिहार का पटना जिला के प्राचीनकाल से ख्यातिलब्ध मंदिरों और घाटों का शहर ” बाढ़ ” अनुमंडल से महज दस किलोमीटर पर स्थित पंडारक प्रखंड में द्वापर-युगीन पुण्यार्क सूर्य मंदिर कला – शिल्प एवं श्रध्दा की दृष्टि से अतिमहत्वपूर्ण माना जाता है!शास्त्र और पुराण-प्रसिध्द इस सूर्य मंदिर की प्रसिध्दि सर्वत्र फैली हुई है। बाढ़ अनुमंडल के पंडारक प्रखंड का अतिप्राचीन नाम ” पुण्यार्क ” है तथा धर्मग्रन्थों के अनुसार इस स्थान पर भगवान सूर्य की मंदिर की स्थापना ‘द्वापर’ युग में किया गया है। इस ‘पुण्यार्क सूर्य मंदिर’ में काफी दूर – दराज से श्रध्दालु पूजा – अर्चना करने आया करते हैं! और विशेष कर प्रतिबर्ष छठ पूजा के समय यहां काफी संख्या में छठ व्रतियों एवं श्रध्दालुओं का भीड़ हुआ करता है।धर्म शास्त्रों के अनुसार मान्यता है कि पुण्यार्क सूर्य मंदिर में भगवान सूर्य का व्रत रखकर पूजा – अर्चना करने बाले श्रध्दालुओं को रोग से मुक्ति तथा संतान की प्राप्ति और मनोकामनायें पूरी होती है। धर्मग्रन्थों में वर्णित है कि भगवान श्रीकृष्ण की अष्ट महिषियों में श्रेष्ठ जांबवती के पुत्र ‘साम्ब’ ने अपने सौंदर्य के घमण्ड में ‘महर्षि नारद’ का हमेशा मजाक उड़ाया करते थे!तब महर्षि नारद ने कूपित होकर ‘साम्ब’ को दण्ड दिलाने की दृष्टि से श्रीकृष्ण को साम्ब के गोपियों के प्रति प्रेम संबंधी सूचना दी।इसके पश्चात रैवतक पर्वत पर गोपियों के बींच साम्ब को जल क्रीड़ारत दिखाकर नारद ने श्रीकृष्ण को उत्तेजित कर दिया!तब श्रीकृष्ण ने क्रोध में आकर ‘साम्ब’ को कुष्ठ रोग से पीड़ित होने का शाप दे दिया! और ‘साम्ब’ कुष्ठ रोग से ग्रसित हो गया।इसके बाद ‘साम्ब’ को अपने गलती का अहसास हुआ,तब ‘साम्ब’ ने महर्षि नारद से आग्रह करते हुये शाप से मुक्ति पाने का उपाय पूछा। महर्षि नारद के कहने पर पुनः श्रीकृष्ण ने ‘साम्ब’ को बारह बर्षों तक भगवान सूर्यदेव की आराधना करने को कहा !,और ‘साम्ब’ सूर्यदेव की आराधना पूरा कर शाप से मुक्त होकर ‘पुण्यार्क सूर्य मंदिर’ सहित कई ‘सूर्य मंदिरों’ की स्थापना करायी।वहीं ऐतिहासिक शोधों के अनुसार ‘पुण्यार्क सूर्य मंदिर’ की स्थापना प्रथम शताब्दी में आयी इरानी सूर्य उपासकों द्वारा की गई थी। इस मंदिर में इरानी वेश – भूषा में काले पत्थरों की एक सूर्य प्रतिमा आज भी विद्यमान है।पंडारक अथवा पुण्यार्क का यह प्राचीन सूर्य मंदिर पावन गंगा नदी के तट पर स्थापित है!जबकि अधिकांशतः सूर्य मंदिर तालाबों एवं समुद्रों के किनारे अवस्थित है।पुराणों के अनुसार सूर्य प्रतिमा का जो विधान वर्णित है!उसमें सात घोड़ों से युक्त रथ की चर्चा है !और पुण्यार्क सूर्य मंदिर में ऐसी ही सूर्य देव की मूर्ति है,तथा इनके हांथ कमर तक ही है, एवं सिर पर त्राण और गले में माला भी है। कमर में कटार एवं पैरों में मोजे तथा बूट जैसे परिधान है। दाहिने – वायें दंड – पिंगल तथा सारथी के अलावे देवियों,अनुचर – अनुचरियों एवं मूर्ति के ऊपर गंधर्व को दर्शाया गया है।भविष्य पुराण एवं साम्ब पुराण के अनुसार तथा प्रचलित लोक कथाओं के मुताबिक साम्ब ने तीन सूर्य मंदिरों की स्थापना के अलावे अन्य कई सूर्य मंदिरों का निर्माण कराया!जो देश के विभिन्न प्रदेशों में आज भी विराजमान है।’साम्ब’ द्वारा स्थापित उन्हीं तीन मंदिरों में पंडारक यानि ‘पुण्यार्क सूर्य मंदिर’ भी एक है।गर्भगृह को सूक्ष्म दृष्टि से देखने से स्पष्ट होता है कि लूटेरों द्वारा मंदिर विध्वंस करने की कोशिश की गई!जिसके कारण सूर्य प्रतिमा को क्षति पहुंची है। संकटों को झेलने बाले इस प्राचीनतम सूर्य मंदिर पुण्यार्क को विनाश का बड़ा झटका सन 1934 ई.के भूकंप में लगा !और तब यह पौराणिक मंदिर पूरी तरह ध्वस्त हो गया था। सन 1935 – 36 में पंडारक गांव के निवासियों एवं भक्तों ने इस मंदिर का जीर्णोध्दार किया।भूकंप के पूर्व में सूर्योदय की पहली ‘रश्मि’ मंदिर के गर्भगृह को स्पर्श करती थी।इस मंदिर के आगे एक काला पत्थर है,जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे रगड़कर लगाने से कुष्ठ रोग दूर हो जाता है।यहां बर्ष भर श्रध्दालु भगवान सूर्यदेव के प्रति अपनी श्रध्दा निवेदित करते हैं।सूर्य-पुराण में जिन सकलदीपि ब्राह्मणों को इस सूर्य मंदिर का पुजारी बताया गया है,उनके वंशज आज भी इस पावन सूर्य मंदिर के पुजारी हैं!तथा वे लोग मंदिर के आसपास बसे हैं।इस सूर्य मंदिर में पिछले बर्ष छठ व्रत के अवसर पर काफी संख्या श्रध्दालुओं ने भगवान दिवाकर को अर्घ्य प्रदान कर अपनी एवं अपने परिवार की सुख – समृध्दि तथा आरोग्य होने और संतान के लिये मंगलकामना भी किया।इस मंदिर में श्रध्दालु अपने मनोकामना के अनुसार हर – हमेशा बच्चों का मुंडन संस्कार भी कराते हैं। इस पुण्यार्क सूर्य मंदिर विकास समिति के सदस्यों द्वारा छठ पर्व को लेकर पहले से तैयारी करते हैं! और इस दौरान समिति के सदस्य के साथ ग्रामीणों द्वारा भजन – कीर्तन,धार्मिक नाटक एवं जागरण का आयोजन किया जाता है। सूर्य मंदिर के आसपास के इलाकों को काफी आकर्षक रूप से सजाया जाता है।मंदिर से लेकर गंगा नदी के घाट तक साफ – सफाई के साथ सजाया जाता है।छठ व्रत पर पंडारक गांव से बाहर अन्य जगहों पर रह रहे ग्रामीण भी भगवान सूर्य की पूजा – अर्चना करने पुनः अपने गांव पहुंचते हैं।

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