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रामलीला : न कलाकार रहे, न कद्रदान

अब नहीं आता ‘रामलीला’ का मौसम

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आशुतोष अनत
पटना। ‘रामलीला’ अब गुजरे जमाने की बात रह गयी। अब रामलीला के न कलाकार रह गये, न कलाकारों के कद्रदान। शहरों में तो दुर्गापूजा व दशहरा के मौके पर कहीं-कहीं रामलीला का आयोजन होता भी है। लेकिन, गांवों से रामलीला अब लगभग लुप्त हो चुकी है। रामलीला के कलाकार अब दूसरे पेशे से जुड़ कर अपनी दाल-रोटी चला रहे हैं। हास्य पात्रों का अभिनय करनेवाले पकौड़ी लाल आजकल पान की दुकान चलाते हैं। रावण की भूमिका निभानेवाले रामसेवक पांडेय कर्मकांडी ब्राह्मण बन गये। जीविकोपार्जन के लिए कुछ न कुछ तो करना ही था।
जब दशहरा नजदीक आता है, तब रामलीला की याद अनायास ही आ जाती है। मेरे गांव में भी हर साल रामलीला होती थी। दनियावां में रामलीला की एक मंडली थी, ‘मनोग रामलीला मंडली’। मंडली के महंत थे मनोग महतो। हर साल उनकी ही मंडली रामलीला करने आती। शाम होते ही, बच्चों की टोली टाट और चटाई लेकर रामलीला के मंच के आगे जमा हो जाती। चटाई और टाट बिछाकर अपने घरवालों के लिए सीटें रिजर्व कर ली जातीं। सीटों को लेकर बच्चों के बीच कभी-कभी धींगामुश्ती भी हो जाती। लेकिन, जैसे ही मंच पर भगवान राम का मंगलाचरण शुरू होता, श्री रामचंद्र कृपालु भजमन हरण भव व भय दारुणम। नव कंज लोचन कंज मुख…’ श्रद्धा से सिर झुक जाते। भक्ति रस सभी को एक सूत्र में जोड़ देती।
रामलीला के कलाकारों के प्रति गांव वालों का विशेष श्रद्धा भाव होता। राम, लक्ष्मण और सीता की भूमिका निभानेवाले कलाकारों से जब दिन में भेंट हो जाती, तो गांव वाले समझते कि उनका भाग्योदय हो गया। दंडवत कर उनका आशीर्वाद लेते। गांव के लोग रामलीला मंडली के सदस्यों के खानेपीने से लेकर उनकी सुरक्षा का भी प्रबंध करते। दान के लिए सक्षम लोगों की एक सूची बनाकर यह तय किया जाता कि किस दिन किस व्यक्ति को खाने-पीने का प्रबंध करना है। जिनकी बारी होती वे सुबह में ही चावल-दाल से लेकर खाने-पीने की पूरी सामग्री मंडली तक पहुंचा देते।
लेकिन, ये बस अब सिर्फ स्मृति तक ही सिमट कर रह गयी। जब से टेलीविजन ने घर-घर अपनी जगह बना ली। रामलीला गुजरे जमाने की बात हो गयी।

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