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तीन दिवसीय बकरी पालन प्रशिक्षण कार्यशाला का किया गया आयोजन

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सुपौल जिला मुख्यालय स्थित कृषि विभाग के कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंध अधिकरण “आत्मा” द्वारा गुरुवार को संयुक्त कृषि भवन में तीन दिवसीय बकरी पालन प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया कार्यशाला को संबोधित करते हुए जिला कृषि पदाधिकारी प्रवीण कुमार झा ने कहा कि वैज्ञानिक तरीके अपनाकर बकरी पालन व्यवसाय से किसानों की आय दुगुनी से तिगुनी हो सकती है! बकरी पालन में उच्च नस्ल का चयन आवश्यक है! सही समय पर बकरियों को गाभिन कराने से नवजात मेमनों की मृत्युदर कम होती हैं! उन्होने कहा कि स्वरोजगार के लिए बकरी पालन बेहतर विकल्प है! कम लागत में बेहतर आमदनी पाने का सुगम जरिया है! अब खेती के साथ-साथ किसानों को मत्स्य, पशुपालन, बकरी पालन व मुर्गी पालन जैसे व्यवसाय करने की आवश्यकता है! वृक्ष की पत्तियां, टहनियाँ, खरपतवार, घास, हराचारा एवं रसोईघर के बेकार खाने की चीजों का उपयोग कर बकरी के आहार का प्रबंध किया जा सकता है!इस मौके पर परियोजना निदेशक डॉ. राजन बालन ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि बकरी एक छोटा जानवर है जिसे सरलतापूर्वक पाला जा सकता है! कृषि को लाभदायक बनाने के लिए कई सहायक व्यवसाय अपनाए जा सकते हैं! इनमें से बकरी पालन एक ऐसा व्यवसाय है जिसे कम लागत, कम पूंजी व अपेक्षाकृत कम जगह में किया जा सकता है! यह किसानों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ व शारीरिक रूप से स्वस्थ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है! कृषि विज्ञान केन्द्र राघोपुर के प्रधान कृषि वैज्ञानिक डॉ. विपुल मंडल ने कहा कि बकरी पालन समाज के भूमिहीन व बेरोजगार युवाओं के लिए बेहतर आमदनी का साधन है! बकरी पलकों को भेड़-बकरियों के उचित रख-रखाव, समय पर टीकाकरण, क्रीमीनाशक दवा पिलाने आदि पर विस्तारपूर्वक जानकारी रखने की आवश्यकता है! पशुपालन चिकित्सा पदाधिकारी डॉ अरुण कुमार ने कहा कि दुनियाँ भर में 103 बकरी के प्रजाति पाए जाते हैं! वहीं भारत में 25 प्रजाति पाए जाते हैं! बकरी का दूध खासकर बच्चे और बूढ़े के लिए अमृत के समान है! प्रशिक्षक संतोष कुमार झा ने बकरी के विभिन्न नस्ल का विस्तारपुर्वक जिक्र करते हुए कहा कि ब्लैक बंगाल नस्ल की बकरियाँ पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, उड़ीसा एवं बंगला देश में पाई जाती है! इसके शारीर पर काला, भूरा तथा सफ़ेद रंग का छोटा रुआं पाया जाता है! नस्ल की प्रजनन क्षमता काफी अच्छी होती है! ये औसतन 2 वर्ष में तीन बार प्रजनन करती है! एक बियान में दो से चार बच्चे को जन्म देती है! इस नस्ल की मेमना 8-10 माह में वयस्कता प्राप्त कर लेती है तथा 15 से 26 माह की उम्र में प्रथम बार बच्चे पैदा करती हैं! इस जाति के नर बच्चों का मांस काफी स्वादिष्ट होता है एवं खाल भी उत्तम कोटी के होते हैं! आम, पीपल, बरगद, शीसम, नीम, जामुन, गुल्लर आदि वृक्ष के पत्ते बकरियों के बेहतर आहार है! कार्यशाला में स्वच्छता पर प्रकाश डालते हुए किसान सलाहकार संघ के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अमन कुमार ने कहा कि किसी भी व्यवसाय या बेहतर जीवन के लिए स्वच्छता आवश्यक है! बकरी पालन में भी स्वच्छता का ध्यान रखने पर बकरी और मेमना स्वस्थ रहेगी! जिसके कारण मेमना में वृद्धि, चिकित्सकीय खर्च में कमी, स्वच्छ माहौल और मुनाफा अधिक होगी!कार्यशाला में बड़ी संख्यां में लोग मौजूद थे .

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